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सोयाबीन की नई किस्म से किसानों की चांदी
Date: 25-04-2016 02:57 AM

लखनऊ। हर वर्ष मोजेक वायरस की वजह से सैकड़ों हेक्टेयर फसल खराब हो जाती है, लेकिन हाल ही में खोजी गई नई किस्मों में इस वायरस का कोई असर नहीं हो सकेगा। इन पर ज्यादा पानी और सूखे का भी प्रभाव नहीं पड़ेगा।
भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान इंदौर, कृषि विश्वविद्यालय सिहोर और कृषि कालेज जबलपुर के वैज्ञानिकों ने सोयाबीन की चार नई किस्में इजाद की है, जिसकी रोग और कीट प्रतिरोधक क्षमता दूसरी फसलों से कहीं ज्यादा है।
मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान देश में सोयबीन के सबसे बड़े उत्पादक राज्य है। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में सोयबीन की खेती बड़ी मात्रा में की जाती है।
केंद्रीय कृषि मंत्रालय की सेंट्रल सीड रिलीज कमेटी ने भी इस बीज को अधिसूचित कर दिया है।
वैज्ञानिकों का दावा है कि इससे प्रति हेक्टेयर छह कुंतल ज्यादा उत्पादन होगा। आने वाले खरीफ सीजन में यह किस्म प्रयोग किसानों के लिए उपलब्ध होगी।
भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. बीयू दुपारे इन नयी किस्मों के बारे में बताते हैं, "हर वर्ष मोजेक वायरस की वजह से सोयाबीन की फसल बर्बाद हो जाती है, ऐसे में हमने सोचा कि ऐसा बीज इजाद की जाए जिसमें मोजेक वायरस से लड़ने की क्षमता ज्यादा हो, जिससे इसको कोई नुकसान नहीं पहुंच पाए।"
जेएस-2034, आरवीएस-2001-4, जेएस-2034 और एनआरसी 86 बीज की नयी किस्में इजाद की हैं। आरवीएस 2001-4 में पीला व जड़ सड़न रोग का प्रभाव कम होगा और पौधे जल्दी नहीं सूखेंगे। जेएस-2034 में पीला बीषाणू रोग, चारकाट राट, पत्ती धब्बा रोग नहीं लगेगा। जेएस-2029 यह किसम पीला मोजेक रोग, चारकोल राट, नहीं लगेगा।
एनआरसी-86 में गडल बीडल और तना-मक्खी के लिए प्रतिरोधी होता है।
वो आगे बताते हैं, "इस शोध में हमारे साथ कृषि विश्वविद्यालय सिहोर, कृषि कालेज जबलपुर और जापान के कृषि वैज्ञानिकों का सहयोग मिला था। नयी किस्मों से 15 प्रतिशत ज्यादा उत्पादन मिलेगा। इन पर ज्यादा पानी और सूखे का भी असर नहीं पड़ेगा। डीएनए मार्कर की सहायता से सोयाबीन की नयी प्रजाति विकसित की है।"

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