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Urad (उड़द)

Look at our Crops productivity, reports and much more.

Over 2500 years ago, Indian farmers had discovered and begun farming many spices and sugarcane. It was in India, between the sixth and fourth centuries BC, that the Persians, followed by the Greeks, discovered the famous “reeds that produce honey without bees? being grown.
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Urad (उड़द)

उरद या उड़द एक मुख्य दलहनी फसल है। उड़द की खेती प्राचीन समय से होती आ रही है। उड़द की फसल कम समयावधि मे पककर तैयार हो जाती है। इसकी फसल खरीफ, रबी एवं ग्रीष्म मौसमो के लिये उपयुक्त फसल है। हमारे देश मे उड़द का उपयोग प्रमुख रूप से दाल के रूप मे किया जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश के सिंचित क्षेत्र में अल्पावधि (60-65 दिन) वाली दलहनी फसल उरद की खेती करके किसानों की वार्षिक आय में आशातीत वृद्धि संभव है। साथ ही मृदा संरक्षण/उर्वरता को भी बढ़ावा दिया जा सकता है।

Urad or urad is a main pulley crop. Urad cultivation has been happening since ancient times. Urad harvest is ready in a short period of time. Its crop is suitable for Kharif, Rabi and Summer Season. In our country, urad is used mainly in the form of pulses. In the irrigated area of ​​Uttar Pradesh, Bihar, Rajasthan, Haryana and Madhya Pradesh, the expected increase in the annual income of farmers by cultivating short-term (60-65 days) pulse crop of Urad is possible. As well as soil conservation / fertility can also be promoted.

भूमि की तैयारी:- उड़द सभी प्रकार की भूमि में (अधिक रेतीली भूमि को छोड़कर) सफलता पूर्वक पैदा की जा सकती है। परन्तु हल्की रेतीली, दोमट या मध्यम प्रकार की भूमि में जिसमें पानी का निकास अच्छा हो, उड़द के लिये अधिक उपयुक्त होती है।

बीज की दर :- बोआई के लिए उड़द के बीज की सही दर 12-15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। खेत में अगर किसी वजह से नमी कम हो, तो 2-3 किलोग्राम बीज की मात्रा प्रति हेक्टेयर बढ़ाई जा सकती है। 

बोआई का समय :- खरीफ मौसम में उड़द की बोआई का सही समय जुलाई के पहले हफ्ते से ले कर 15-20 अगस्त तक है। हालांकि अगस्त महीने के अंत तक भी इस की बोआई की जा सकती है।

बीज शोधन :- बुबाई के पूर्व बीज को 3 ग्राम थायरम या 2.5 ग्राम डायथेन एम-45 प्रति किलो बीज के मान से उपचारित करे। जैविक बीजोपचार के लिये ट्राइकोडर्मा फफूँद नाशक 5 से 6 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपयोग किया जाता है।

उन्नतशील प्रजातियॉं :- मुख्य रूप से दो प्रकार की प्रजातियाँ पायी जाती है, पहला खरीफ में उत्पादन हेतु जैसे कि – शेखर-3, आजाद उर्द-3, पन्त उर्द-31, डव्लू.वी.-108, पन्त यू.-30, आई.पी.यू.-94 एवं पी.डी.यू.-1 मुख्य रूप से है, जायद में उत्पादन हेतु पन्त यू.-19,पन्त यू.-35, टाईप-9, नरेन्द्र उर्द-1, आजाद उर्द-1, उत्तरा, आजाद उर्द-2 एवं शेखर-2 प्रजातियाँ हैI कुछ ऐसे भी प्रजातियाँ है, जो खरीफ एवं जायद दोनों में उत्पादन देती है,  जैसे कि टाईप-9, नरेन्द्र उर्द-1, आजाद उर्द-2, शेखर उर्द-2ये प्रजातियाँ दोनों ही फसलो में उगाई  जा सकती है |

Moderate Species :- Two types of species are found mainly, first to produce in Kharif such as - Shekhar-3, Azad Uddh-3, Pant UD-31, DW-108, Pant U.-30, IPU-94 and PDU-1 are mainly for production in UP, U-19, Pt U-35, Type-9, Narendra UD-1, Azad Uddh- 1, Uttara, Azad, UD-2 and Shekhar-2 species. There are some species which produce both kharif and zayed, Ase that type 9, Narendra he heads 1, Azad he heads 2, Shaker he heads -2 These species can be grown in both crops

बोआई का तरीका :- हल के पीछे कूंड़ में बोआई करनी चाहिए. कूंड़ से कूंड़ की दूरी 35 से 45 सेंटीमीटर के बीच रखनी चाहिए. पौधे से पौधे के बीच की दूरी 10 सेंटीमीटर होनी चाहिए. बोआई के बाद तीसरे हफ्ते में पासपास लगे पौधों को निकाल कर सही दूरी बना लें.

खाद एवं उर्वरक की मात्रा :- नत्रजन 8-12 किलोग्राम व स्फुर 20-24 किलोग्राम पोटाश 10 किलोग्राम प्रति एकड़ के हिसाब से दे। सम्पूर्ण खाद की मात्रा बुबाई की समय कतारो मे बीज के ठीक नीचे डालना चाहिये। दलहनी फसलो मे गंधक युक्त उर्वरक जैसे सिंगल सुपर फास्फेट, अमोनियम सल्फेट, जिप्सम आदि का उपयोग करना चाहिये। विशेषतः गंधक की कमी वाले क्षेत्र मे 8 किलो ग्राम गंधक प्रति एकड़ गंधक युक्त उर्वरको के माध्यम से दे।

सिंचाई :- क्रांतिक फूल एवं दाना भरने के समय खेत मे नमी न हो तो एक सिंचाई देना चाहिये।

निदाई-गुड़ाई :- खरपतवार फसलो की अनुमान से कही अधिक क्षति पहुँचाते है। अतः विपुल उत्पादन के लिये समय पर निदाई-गुड़ाई कुल्पा व डोरा आदि चलाते हुये अन्य आधुनिक नींदानाशक का समुचित उपयोग करना चाहिये। नींदानाशक वासालिन 800 मिली. से 1000 मिली. प्रति एकड़ 250 लीटर पानी मे घोल बनाकर जमीन बखरने के पूर्व नमी युक्त खेत मे छिड़कने से अच्छे परिणाम मिलते है।

रासायनिक प्रबंधन :-

1. पीला चित्तेरी रोग में सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु मेटासिस्टाक्स (आक्सीडेमाटान मेथाइल) 0.1 प्रतिषत या डाइमेथोएट 0.2 प्रतिशत प्रति हेक्टयर (210मिली/लीटर पानी) तथा सल्फेक्स 3ग्रा./ली. का छिड़काव 500-600 लीटर पानी में घोलकर 3-4 छिड़काव 15 दिन के अंतर पर करके रोग का प्रकोप कम किया जा सकता है।

2. झुर्रीदार पत्ती रोग, मौजेक मोटल, पर्ण कुंचन आदि रोगों के नियंत्रण हेतु इमिडाक्लोपिरिड 5 ग्रा./कि.ग्रा. की दर से बीजोपचार तथा बुबाई के 15 दिन के उपरांत 0.25 मि.मी./ली. से इन रोगों के रोग वाहक कीटों पर नियंत्रण किया जा सकता है।

3. सरकोस्पोरा पत्र बुंदकी रोग, रूक्ष रोग, मेक्रोफोमिना ब्लाइट या चारकोल विगलन आदि के नियंत्रण हेतु कार्बेन्डाजिम या बेनलेट कवकनाशी (2 मि.ली./लीटर पानी) अथवा मेन्कोजेब 0.30 प्रतिशत का छिड़काव रोगों के लक्षण दिखते ही 15 दिन के अंतराल पर करें।

4. चूर्णी कवक रोग के लिये गंधक 3 कि.ग्रा. (पाउडर)/हेक्ट. की दर से भुरकाव करें।

5. बीज को ट्राइकोडर्मा विरिडी, 5 ग्राम/कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करें।

6. जीवाणु पर्ण बुंदकी रोग के बचाव हेेतु 500 पी.पी.एम. स्ट्रेप्टोमाइसीन सल्फेट से बीज का उपचार करना चाहिये। स्ट्रेप्टोमाइसीन 100 पी.पी.एम. का छिड़काव रोग नियंत्रण के लिये प्रभावी रहता है।

कटाई एवं मड़ाई :- जब 70-80 प्रतिशत फलियॉं पक जाएं, हंसिया से कटाई आरम्भ कर देना चाहिए। तत्पश्चात वण्डल बनाकर फसल को खलिहान में ले आते हैं। 3-4 दिन सुखाने के पश्चात बैलों की दायें चलाकर या थ्रेसर द्वारा भूसा से दाना अलग कर लेते हैं।

 उपज :- 10- 15 क्विंटल /हे. उपज प्राप्त की जा सकती हैं।

Urad (उड़द) Crop Types

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