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गर्मियों में गहरी जुताई का कृषि मे क्या महत्व है


किसान भाई खेत की जुताई का काम अक्सर बुवाई के समय करते हैं। जबकि फसल के अच्छे उत्पादन के लिए रबी फसल की कटाई के तुरंत बाद मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई कर ग्रीष्म ऋतू में खेत को खाली रखना बहुत ही ज्यादा लाभदायक हो सकता हैं।

क्योंकि फसलों में लगने वाले कीट जैसे सफेद लट, कटवा इल्ली, लाल भृंग की इल्ली तथा व्याधियों जैसे उखटा, जड़गलन की रोकथाम की दृष्टि से गर्मियों में गहरी जुताई करके खेत खाली छोड़ने से भूमि का तापमान बढ़ जाता हैं जिससे भूमि में मौजूद कीटों के अंडे, प्यूपा, लार्वा और लट ख़त्म हो जाते हैं।

जिसके परिणाम स्वरूप रबी एवं खरीफ में बोई जाने वाली तिलहनी, दलहनी खाद्दान्न फसलों और सब्जियों में लगने वाले कीटों- रोगों का प्रकोप कम हो जाता हैं। क्योंकि जुताई के समय भूमि में रहने वाले कीट उनकी अपरिपक्व अवस्था जैसे प्यूपा, लार्वा भूमि की सतह पर आ जाते हैं, जिन पर प्रतिकूल वातावरण एवं उनके प्राकृतिक शत्रुओ विशेषकर पर भक्षी पक्षियों का आक्रमण सहज हो जाता हैं।

अतः गर्मी में गहरी जुताई करने से एक सीमा तक कीड़े एवं बिमारियों से छुटकारा पाया जा सकता हैं। कीड़े, बीमारी व खरपतवारों से फसल को काफी नुकसान होता हैं। कभी- कभी तो ये तीनो महामारी का रूप ले लेते हैं, जिससे उत्पादन का गंभीर संकट पैदा हो जाता हैं। राजस्थान के कई गावों में सफेद लट के प्रकोप से मूँगफली की खेती करना कम हो गया हैं। इनकी रोकथाम के लिए रासायनिक दवा का उपयोग खर्चीला तो हैं ही परन्तु बहुत सी दवाओं का असर इन पर कम होता हैं। ऐसी स्थिति में गर्मियों की जुताई काफी लाभकारी हैं।

जुताई कब करें?
गर्मियों की जुताई का उपयुक्त समय यथा संभव रबी की फसल कटते ही आरंभ कर देनी चाहिए क्योंकि फसल कटने के बाद मिट्टी में थोड़ी नमी रहने से जुताई में आसानी रहती हैं तथा मिट्टी के बड़े- बड़े ढेले बनते हैं। जिसे भूमि में वायु संचार बढ़ता हैं। जुताई के लिए प्रातः काल का समय सबसे अच्छा रहता हैं, क्योंकि कीटों के प्राकृतिक शत्रु पर भक्षी पक्षियों की सक्रियता इस समय अधिक रहती हैं अतः प्रातः काल के समय में जुताई करना सबसे ज्यादा लाभदायक होता हैं।

गर्मियों की जुताई कैसे करें?
गर्मी की जुताई 15 सेमी. गहराई तक किसी भी मिट्टी पलटने वाले हल से ढलान के विपरीत करनी चाहिए। लेकिन बरनी क्षेत्रों में किसान ज्यादातर ढलान के साथ- साथ ही जुताई करते हैं जिससे वर्षा जल के साथ मृदा कणों के बहने की क्रिया बढ़ जाती हैं। अतः खेतों में हल चलाते समय इस बात का ख्याल रखना चाहियें की यदि खेत का ढलान पूर्व से पश्चिम दिशा की तरफ होतो जुताई उतर से दक्षिण की और यानी ढलान के विपरीत ढलान को काटते हुए करनी चाहियें। ऐसा करने से बहुत सारा वर्षा का जल मृदा सोख लेती हैं, और पानी जमीन की निचली स्थान तक पहुंच जाता हैं जिससे न केवल मृदा कटाव रुकता हैं बल्कि पोषक तत्व भी बहकर नहीं जा पाएंगे।

गर्मियों की गहरी जुताई के लाभ:-

1. गर्मी की जुताई से सूर्य की तेज किरणे भूमि के अंदर प्रवेश कर जाती हैं, जिससे भूमिगत कीटों के अंडे, प्यूपा, लार्वा, लटें व व्यस्क नष्ट हो जाते हैं।
2. फसलों में लगने वाले भूमिगत रोग जैसे उखटा, जड़गलन के रोगाणु व सब्जियों की जड़ों में गांठ बनाने वाले सूत्रकर्मी भी नष्ट हो जाते हैं।
3. गहरी जुताई से दुब, कांस, मोथा, वायासुरी आदि खरतवारों से भी मुक्ति मिलती हैं।
4. गर्मी की गहरी जुताई से गोबर की खाद व खेत में उपलब्ध अन्य कार्बनिक पदार्थ भूमि में भली भांति मिल जाते हैं, जिससे अगली फसल को पोषक तत्व आसानी से शीघ्र उपलब्ध हो जाते हैं।
5. खेत की मिट्टी में ढेले बन जाने से वर्षाजल सोखने की क्षमता बढ़ जाती हैं जिससे खेत में ज्यादा समय तक नमी बनी रहती हैं।

ग्रीष्मकालीन जुताई से खेत का पानी खेत में ही रह जाता हैं, जो बहकर बेकार नहीं होता तथा वर्षाजल के बहाव के द्वारा होने वाले भूमि कटाव में भारी कमी होती हैं।
6. जुताई करने से खेत की भूमि में उपलब्ध पोषक तत्वों का वायु द्वारा होने वाला नुकसान व मृदा अपरदन कम होता हैं।

गहरी जुताई में सावधानियां:-
गर्मी की जुताई करते समय निम्न सावधानियां ध्यान में रखे:-

1. मिट्टी के ढेले बड़े- बड़े रहे तथा मिट्टी भुरभुरी न होने पाए अन्यथा गर्मियों में तेज हवा द्वारा मृदा अपरदन की समस्या बढ़ जाएगी।
2. ज्यादा रेतीले इलाकों में गर्मी की जुताई न करें।
3. बारानी क्षेत्रों में जुताई करते समय इस बात का ख्याल रखना भी जरूरी हैं की ज्यादा से ज्यादा 

फसलों के अवशेषों को जमीन पर आवरण की तरह ही पड़ा रहने दे। इससे मृदा को वर्षाजल द्वारा होने वाले मृदा अपरदन के नुकसान से बचाया जा सकता हैं और वर्षा के पानी के साथ बह रही मृदा को भी रोका जा सकता हैं।