पहले पेट्रोल-डीजल ने जेब ढीली की, अब खाने का तेल लोगों की चिंता बढ़ाने लगा है। खासकर सरसों तेल की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी ने गांव से लेकर शहर तक हर घर का बजट बिगाड़ना शुरू कर दिया है।
कई मंडियों में सरसों के भाव लगातार ऊपर जा रहे हैं। किसान जहां बढ़ते दाम देखकर खुश नजर आ रहे हैं, वहीं आम उपभोक्ता और छोटे किसान इस तेजी को लेकर परेशान हैं। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ मौसम या मांग ही नहीं, बल्कि जमाखोरी और अंतरराष्ट्रीय हालात भी इस महंगाई को बढ़ा रहे हैं।
MSP से बहुत ऊपर पहुंचा सरसों का भाव
इस बार सरसों के दामों ने नया रिकॉर्ड बना दिया है। राजस्थान समेत कई बड़े बाजारों में कीमतें करीब 8000 रुपये
प्रति क्विंटल तक पहुंच गई हैं। जबकि सरकार ने सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 6200 रुपये
प्रति क्विंटल तय किया है।
पहली नजर में यह किसानों के लिए अच्छी खबर लगती है, लेकिन असली फायदा हर किसान तक नहीं पहुंच पा रहा।
छोटे किसान नहीं उठा पा रहे तेजी का फायदा
गांवों में ज्यादातर छोटे किसान फसल कटते ही अपनी उपज बेच देते हैं। उन्हें तुरंत पैसों की जरूरत होती है, इसलिए वे लंबे समय तक माल रोक नहीं पाते।
दूसरी तरफ बड़े व्यापारी और बड़े किसान बड़ी मात्रा में सरसों स्टॉक करके रखते हैं। जब बाजार में सप्लाई कम दिखाई देती है, तब ऊंचे दामों पर माल बेचकर ज्यादा मुनाफा कमाया जाता है।
यही वजह है कि बाजार में तेजी होने के बावजूद छोटे किसानों को पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा।
राजस्थान में जमाखोरी की चर्चा तेज
खाद्य तेल कारोबार से जुड़े जानकारों का कहना है कि इस समय बड़ी मात्रा में सरसों का स्टॉक बाजार से बाहर रोका गया है।
बताया जा रहा है कि देश की कुल सरसों का बड़ा हिस्सा अभी भी गोदामों में रखा हुआ है। इससे बाजार में कृत्रिम कमी दिखाई दे रही है और कीमतें तेजी से ऊपर जा रही हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि बाजार में रुका हुआ स्टॉक बाहर आ जाए, तो कीमतों में कुछ राहत मिल सकती है।
विदेशों में तनाव का असर भारतीय रसोई तक
सरसों तेल की बढ़ती कीमतों के पीछे वैश्विक हालात भी बड़ी वजह बन रहे हैं।
ईरान-अमेरिका तनाव और समुद्री रास्तों पर बढ़ती अनिश्चितता के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाम ऑयल, सोयाबीन तेल और सूरजमुखी तेल महंगे हो गए हैं।
भारत खाने के तेल के मामले में काफी हद तक आयात पर निर्भर है। ऐसे में जब बाहर से आने वाला तेल महंगा होता है, तो उसका असर घरेलू बाजार पर भी दिखाई देता है।
पाम ऑयल महंगा तो सरसों तेल भी महंगा
बहुत से लोग यह नहीं जानते कि बाजार में बिकने वाले कई सरसों तेलों में पाम ऑयल की ब्लेंडिंग भी की जाती है।
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाम तेल महंगा होता है, तो सरसों तेल की लागत भी बढ़ जाती है। यही कारण है कि घरेलू उत्पादन अच्छा होने के बावजूद सरसों तेल सस्ता नहीं हो पा रहा।
आने वाले महीनों में और बढ़ सकती है चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक तनाव लंबे समय तक जारी रहा, तो खाद्य तेलों की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है।
इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देश अब पाम ऑयल का इस्तेमाल बायोडीजल में बढ़ा रहे हैं। वहीं अर्जेंटीना भी सोयाबीन तेल के उपयोग की नई रणनीति बना रहा है।
यदि ऐसा होता है, तो दुनिया में खाने के तेल की उपलब्धता घट सकती है और भारत जैसे देशों पर दबाव बढ़ सकता है।
किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए चुनौती
सरसों के बढ़ते दाम एक तरफ कुछ किसानों के लिए राहत लेकर आए हैं, लेकिन दूसरी तरफ आम परिवारों की रसोई का खर्च भी बढ़ा रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को जमाखोरी रोकने, बाजार में सप्लाई बढ़ाने और तेल की कीमतों को संतुलित रखने के लिए जल्दी कदम उठाने होंगे।
यदि समय रहते स्थिति नहीं संभाली गई, तो आने वाले दिनों में खाने का तेल आम लोगों की पहुंच से और महंगा हो सकता है।
किसानों के लिए जरूरी सलाह
कृषि विशेषज्ञ किसानों को सलाह दे रहे हैं कि वे बाजार की तेजी देखकर जल्दबाजी में फैसले न लें।
जहां संभव हो, वहां फसल का सही भंडारण करें और मंडी भाव पर नजर बनाए रखें। साथ ही नई फसल की योजना बनाते समय लागत और बाजार दोनों का संतुलन समझना जरूरी होगा।
क्योंकि आने वाले समय में खाद्य तेल का बाजार सिर्फ खेती नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और व्यापार से भी प्रभावित होता दिखाई दे रहा है।
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