सालों से कर रहे सोयाबीन की खेती, फिर भी नहीं बढ़ रही पैदावार? कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये बड़ी गलतियां!

सालों से कर रहे सोयाबीन की खेती, फिर भी नहीं बढ़ रही पैदावार? कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये बड़ी गलतियां!
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Kisaan Helpline

Agriculture
May 27, 2026

हर साल किसान उम्मीद के साथ सोयाबीन की बुवाई करते हैं। बारिश अच्छी हो जाए तो लगता है इस बार खेत सोना उगलेगा। लेकिन जब कटाई का समय आता है, तो कई किसानों की मेहनत उम्मीद से आधी रह जाती है। खेत में पौधे तो अच्छे दिखते हैं, लेकिन फलियां कम लगती हैं और उत्पादन 8–10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के आसपास ही अटक जाता है।

 

अब सवाल यही उठ रहा है कि आखिर गलती कहां हो रही है? क्या सिर्फ मौसम जिम्मेदार है, या खेती के तरीके भी धीरे-धीरे उत्पादन कम कर रहे हैं?

 

इसी को लेकर राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान ने किसानों के लिए नई वैज्ञानिक सलाह जारी की है। विशेषज्ञों का कहना है कि कई छोटी-छोटी गलतियां सोयाबीन की पूरी पैदावार बिगाड़ रही हैं।

 

ज्यादा यूरिया डालना बन रहा सबसे बड़ी समस्या

 

कई किसान मानते हैं कि ज्यादा यूरिया डालने से फसल तेजी से बढ़ती है और पौधे मजबूत बनते हैं। शुरुआत में पौधे हरे-भरे जरूर दिखते हैं, लेकिन बाद में यही नुकसान का कारण बन जाते हैं।

 

सोयाबीन एक दलहनी फसल है, जो हवा से नाइट्रोजन लेने की क्षमता रखती है। इसलिए इसमें जरूरत से ज्यादा यूरिया डालना फायदेमंद नहीं होता। वैज्ञानिकों के अनुसार एक हेक्टेयर में करीब 56 किलो यूरिया काफी माना जाता है।

 

लेकिन कई किसान 2 से 3 बोरी तक यूरिया डाल देते हैं। इसका असर यह होता है कि पौधे केवल पत्तेदार बनते हैं, फलियां कम लगती हैं और फसल गिरने लगती है। साथ ही कीट और रोग का खतरा भी तेजी से बढ़ जाता है।

 

विशेषज्ञों का कहना है कि सोयाबीन में फॉस्फोरस, पोटाश और सल्फर का संतुलन ज्यादा जरूरी है। सल्फर की कमी से दाने छोटे रह जाते हैं और तेल की मात्रा घट जाती है।

 

संतुलित खाद से बढ़ सकती है उपज

 

वैज्ञानिकों ने किसानों को संतुलित पोषण अपनाने की सलाह दी है। खेत में केवल यूरिया डालने के बजाय सही मात्रा में एसएसपी, पोटाश और सल्फर का उपयोग करने से दानों की गुणवत्ता और तेल प्रतिशत बेहतर पाया गया है।

 

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार मिट्टी परीक्षण करवाकर खाद डालना सबसे सुरक्षित तरीका माना जाता है। इससे लागत भी कम होती है और उत्पादन भी बढ़ता है।

 

बिना बीजोपचार बोवनी करना पड़ सकता है भारी

 

आज भी कई किसान बिना बीजोपचार सीधे बोवनी कर देते हैं। यही गलती शुरुआती नुकसान का बड़ा कारण बनती है।

 

ऐसे बीज जल्दी जड़ सड़न, फफूंद, दीमक और तना मक्खी जैसी समस्याओं का शिकार हो जाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बोवनी से पहले बीजोपचार करने से अंकुरण अच्छा होता है और पौधों की शुरुआती सुरक्षा मजबूत रहती है।

 

कम खर्च में किया गया बीजोपचार कई बार पूरी फसल बचा सकता है।

 

नरवाई जलाने से कमजोर हो रही मिट्टी

 

गेहूं कटाई के बाद खेत में बची नरवाई को जलाना अब किसानों के लिए नुकसानदायक साबित हो रहा है। इससे मिट्टी के अच्छे जीवाणु खत्म हो जाते हैं और खेत की जैविक ताकत धीरे-धीरे कम होने लगती है।

 

विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि नरवाई जलाने के बजाय रोटावेटर और वेस्ट डीकंपोजर का उपयोग करें। इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है और जैविक कार्बन भी बढ़ता है।

 

हर साल गहरी जुताई जरूरी नहीं

 

कुछ किसान हर सीजन में गहरी जुताई करवा देते हैं, जबकि वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसा करना खर्च बढ़ाने के साथ मिट्टी की संरचना को भी प्रभावित कर सकता है।

 

विशेषज्ञों के अनुसार तीन साल में एक बार गर्मी के मौसम में गहरी जुताई पर्याप्त होती है। इससे मिट्टी की कठोर परत टूटती है और बारिश का पानी नीचे तक पहुंचता है।

 

एक ही किस्म पर भरोसा करना बढ़ा रहा जोखिम

 

बदलते मौसम में केवल एक ही किस्म की खेती करना किसानों के लिए खतरे का कारण बन सकता है। अगर उस किस्म पर रोग या मौसम का असर हुआ, तो पूरी फसल प्रभावित हो सकती है।

 

इसीलिए वैज्ञानिक किसानों को 2–3 अलग-अलग सोयाबीन किस्में लगाने की सलाह दे रहे हैं।

 

मध्य भारत के लिए NRC 150, JS 21-72, JS 23-03, JS 22-12, JS 22-16 और NRC 165 जैसी किस्में बेहतर मानी जा रही हैं।

 

ज्यादा बीज डालना भी कर सकता है नुकसान

 

कई किसान सोचते हैं कि ज्यादा बीज डालने से उत्पादन बढ़ जाएगा, लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता।

 

जब पौधे बहुत पास-पास होते हैं तो उनमें पोषण, पानी और धूप के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती है। इसका असर सीधे फलियों और दानों पर पड़ता है।

 

विशेषज्ञों के अनुसार कतार से कतार की दूरी और पौधे से पौधे की दूरी सही रखना बेहद जरूरी है। इससे पौधों का विकास बेहतर होता है और रोग भी कम लगते हैं।

 

खरपतवार नियंत्रण में देरी मतलब सीधा नुकसान

 

सोयाबीन की शुरुआती 40 दिन की अवस्था सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसी समय खरपतवार तेजी से बढ़ते हैं और फसल का पोषण खींच लेते हैं। यदि समय पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो उत्पादन में भारी गिरावट सकती है।

 

विशेषज्ञों का कहना है कि खरपतवारनाशी दवाओं का उपयोग सही समय और सही मात्रा में करना जरूरी है। गलत समय पर दवा डालने से फायदा कम और नुकसान ज्यादा हो सकता है।

 

जैविक खाद की अनदेखी पड़ रही भारी

 

लगातार रासायनिक खेती के कारण मिट्टी की ताकत कम होती जा रही है। यही वजह है कि कई खेतों में उत्पादन बढ़ नहीं पा रहा।

 

विशेषज्ञ किसानों को गोबर की सड़ी खाद, पोल्ट्री खाद और हरी खाद का उपयोग बढ़ाने की सलाह दे रहे हैं। इससे मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ता है और खेत लंबे समय तक उपजाऊ बने रहते हैं।

 

अब पुराने तरीके छोड़ने होंगे

 

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि अब केवलजैसे-तैसे खेतीसे काम नहीं चलेगा। सोयाबीन की खेती में वैज्ञानिक तरीके अपनाना जरूरी हो गया है।

 

यदि किसान संतुलित खाद, बीजोपचार, सही दूरी, खरपतवार नियंत्रण और बेहतर किस्मों को अपनाते हैं, तो लागत कम करने के साथ उत्पादन भी बढ़ा सकते हैं।

 

यानी समस्या सिर्फ मौसम की नहीं है, बल्कि खेती की उन छोटी गलतियों की भी है जिन्हें किसान सालों से दोहराते रहे हैं। सही समय पर सही बदलाव ही अब बेहतर पैदावार की कुंजी बन सकता है।

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