सूखे और अनियमित बारिश से परेशान किसानों को मिली राहत, रिज एंड फरो तकनीक से खेतों में बनी रहती है नमी और बढ़ता है उत्पादन
मौसम की अनिश्चितता के बीच किसानों के लिए कारगर समाधान
कृषि क्षेत्र में मौसम की अनिश्चितता किसानों के लिए लगातार चुनौती बनती जा रही है। कभी अत्यधिक बारिश फसलों को नुकसान पहुंचाती है तो कभी लंबे समय तक बारिश न होने से खेत सूखने लगते हैं। ऐसे हालात में सोयाबीन की खेती करने वाले किसानों की चिंता सबसे ज्यादा बढ़ जाती है, क्योंकि यह फसल नमी पर काफी हद तक निर्भर रहती है।
लेकिन अब कृषि वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक को बढ़ावा दिया है, जो कम बारिश वाले क्षेत्रों में भी सोयाबीन की अच्छी पैदावार देने में मदद कर रही है। इस तकनीक का नाम है रिज एंड फरो (मेढ़ और नाली) पद्धति। कई राज्यों में किसान इस तकनीक को अपनाकर बेहतर परिणाम प्राप्त कर रहे हैं।
क्या है रिज एंड फरो तकनीक?
पारंपरिक खेती में किसान पूरे खेत को समतल रखकर बुवाई करते हैं, लेकिन रिज एंड फरो तकनीक में खेत में ऊंची मेढ़ें और उनके बीच नालियां बनाई जाती हैं। सोयाबीन के बीज मेढ़ों के ऊपर बोए जाते हैं जबकि नालियां पानी के प्रबंधन का काम करती हैं।
इस पद्धति में पौधों को ढीली और हवादार मिट्टी मिलती है, जिससे उनकी जड़ें अधिक गहराई तक फैलती हैं और पौधे मजबूत बनते हैं। मजबूत जड़ प्रणाली होने से पौधे मिट्टी से अधिक पोषक तत्व और नमी प्राप्त कर पाते हैं।
कम बारिश में कैसे करता है फायदा?
जब बारिश सामान्य से कम होती है, तब खेतों में नमी बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है। रिज एंड फरो तकनीक में बनी नालियां बारिश की हर बूंद को रोककर धीरे-धीरे मिट्टी में पहुंचाती हैं।
इससे मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है और पौधों को पानी की कमी का सामना कम करना पड़ता है। गर्मी और सूखे की स्थिति में भी फसल अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रहती है।
ज्यादा बारिश होने पर भी नहीं होता नुकसान
जहां कम बारिश में यह तकनीक नमी बचाती है, वहीं अधिक बारिश के दौरान भी किसानों को फायदा पहुंचाती है। यदि अचानक भारी वर्षा हो जाए तो अतिरिक्त पानी नालियों के माध्यम से बाहर निकल जाता है।
इस कारण खेत में जलभराव नहीं होता और सोयाबीन की जड़ों में सड़न या अन्य रोग लगने की संभावना कम हो जाती है। यही वजह है कि मौसम चाहे जैसा भी हो, फसल अपेक्षाकृत सुरक्षित रहती है।
उत्पादन बढ़ाने में भी मददगार
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि सही तरीके से अपनाई गई रिज एंड फरो तकनीक से सोयाबीन की उपज में भी सुधार देखा गया है। पौधों को पर्याप्त हवा, नमी और पोषक तत्व मिलने के कारण उनकी वृद्धि बेहतर होती है।
कई किसानों का अनुभव है कि इस तकनीक से फसल की गुणवत्ता सुधरती है और उत्पादन में भी बढ़ोतरी होती है, जिससे उनकी आय बढ़ाने में मदद मिलती है।
किन किसानों के लिए सबसे उपयोगी?
● कम बारिश वाले क्षेत्रों के किसान
● सूखे की समस्या वाले इलाके
● हल्की और मध्यम भूमि वाले खेत
● सोयाबीन की व्यावसायिक खेती करने वाले किसान
● मौसम के जोखिम को कम करना चाहने वाले किसान
किसानों के लिए सलाह
खरीफ सीजन में सोयाबीन की बुवाई करने से पहले खेत की तैयारी वैज्ञानिक तरीके से करें। यदि आपके क्षेत्र में बारिश अनिश्चित रहती है तो रिज एंड फरो तकनीक अपनाना फायदेमंद साबित हो सकता है। यह तकनीक न केवल नमी संरक्षण में मदद करती है बल्कि बदलते मौसम के दौर में फसल को सुरक्षित रखने का भी एक प्रभावी उपाय बन रही है।
बदलते मौसम के इस दौर में खेती के पारंपरिक तरीकों के साथ नई तकनीकों को अपनाना समय की जरूरत बन गया है। रिज एंड फरो तकनीक सोयाबीन किसानों के लिए एक ऐसा समाधान बनकर उभर रही है, जो कम बारिश, सूखा और जलभराव जैसी समस्याओं से फसल को बचाने में मदद करती है। सही प्रबंधन के साथ यह तकनीक किसानों को बेहतर उत्पादन और अधिक मुनाफा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
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