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आलू की फसल पर मंडरा रहा रोगों का खतरा, समय रहते न संभले तो हो सकता है भारी नुकसान
आलू देश की प्रमुख नकदी फसलों में से एक है और लाखों किसान इसकी खेती से अपनी आजीविका चलाते हैं। लेकिन मौसम में बदलाव, अधिक नमी और थोड़ी सी लापरवाही आलू की फसल को गंभीर रोगों की चपेट में ला सकती है। इन दिनों कई इलाकों में आलू की फसल में झुलसा, स्कर्फ और विषाणु रोग का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। अगर समय पर इनकी पहचान और सही उपाय नहीं किए गए, तो पूरी फसल बर्बाद होने की आशंका रहती है।
झुलसा
रोग: सबसे
बड़ा खतरा
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार आलू की खेती में अगेती झुलसा और पछेती झुलसा सबसे खतरनाक रोग माने जाते हैं। इस रोग के शुरुआती लक्षण पत्तियों पर छोटे भूरे या काले धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं। धीरे-धीरे ये धब्बे फैलकर पूरी पत्ती को जला देते हैं। पछेती झुलसा की स्थिति में पत्तियों की निचली सतह पर रुई जैसी सफेद फफूंद भी दिखती है। तनों पर भी धब्बे पड़ जाते हैं और कंद छोटे रह जाते हैं या सड़ने लगते हैं।
बचाव के
उपाय:
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हमेशा रोग-मुक्त और प्रमाणित बीज का ही उपयोग करें।
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खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था रखें, पानी जमा न होने दें।
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आवश्यकता से अधिक सिंचाई से बचें।
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10 दिन के अंतराल पर मैंकोजेब या हेक्साकोनाजोल का छिड़काव करें।
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पछेती झुलसा के प्रकोप में मेटालैक्सिल + मैंकोजेब या बोर्डो मिश्रण का छिड़काव लाभकारी होता है।
स्कर्फ
रोग से
घटती है
कंद की
गुणवत्ता
आलू में स्कर्फ (Scurf) भी
एक गंभीर फंगल रोग है। यह मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है – ब्लैक स्कर्फ और सिल्वर स्कर्फ। इस रोग में आलू के कंदों पर काले या सिल्वर रंग के मिट्टी जैसे धब्बे बन जाते हैं, जिससे आलू की गुणवत्ता और बाजार भाव दोनों कम हो जाते हैं।
बचाव के
उपाय:
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खेत की गहरी जुताई करें ताकि रोगाणु नष्ट हो सकें।
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रोग-प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें।
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बुवाई से पहले बीज कंदों को कार्बेंडाजिम से उपचारित करें।
विषाणु
रोग से
गिरती है
पैदावार
आलू की खेती में विषाणु रोग भी किसानों के लिए बड़ी चिंता का कारण हैं। इसमें पत्तियां छोटी, मुड़ी हुई और पीली हो जाती हैं। पौधे का विकास रुक जाता है और पैदावार में भारी गिरावट आती है।
बचाव के
उपाय:
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केवल प्रमाणित और स्वस्थ बीज का ही उपयोग करें।
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एफिड और जैसिड जैसे रस चूसने वाले कीट वायरस फैलाते हैं, इसलिए इनके नियंत्रण के लिए मिथाइल डेमेटॉन का छिड़काव करें।
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संक्रमित पौधों को तुरंत खेत से निकालकर नष्ट कर दें।
पोटाश
का सही
उपयोग बढ़ाएगा
उत्पादन
आलू की फसल में पोटाश की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। पोटाश से कंद सुडौल बनते हैं और उनकी गुणवत्ता बढ़ती है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार कम से कम दो बार पोटाश का प्रयोग जरूरी है।
1 किलोग्राम पोटाश को 100 लीटर
पानी में घोलकर छिड़काव करने से अच्छे परिणाम मिलते हैं।
किसानों के लिए कृषि सलाह
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खेत का नियमित निरीक्षण करें और रोग के शुरुआती लक्षण दिखते ही उपाय अपनाएं।
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संतुलित खाद और उर्वरक का प्रयोग करें।
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मौसम की जानकारी के अनुसार सिंचाई और दवा का छिड़काव करें।
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स्थानीय कृषि विशेषज्ञ या कृषि विभाग से समय-समय पर सलाह लेते रहें।
अगर किसान समय रहते सावधानी बरतें और सही तकनीक अपनाएं, तो आलू की फसल को रोगों से बचाकर अच्छी पैदावार और बेहतर कमाई की जा सकती है।
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