जलभराव वाले खेतों में भी गन्ने की सफल खेती संभव, बस अपनाएं सही तकनीक
भारत में गन्ना एक प्रमुख नकदी फसल है, लेकिन कई क्षेत्रों में अधिक बारिश और बाढ़ के कारण खेतों में पानी भर जाता है, जिससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। जलभराव की स्थिति में गन्ने की जड़ें ठीक से सांस नहीं ले पातीं, जिससे पौधों की वृद्धि रुक जाती है और कई बार पूरी फसल खराब हो जाती है। हालांकि कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि किसान कुछ खास तकनीकों और सही किस्मों का चयन करें, तो जलभराव वाले क्षेत्रों में भी गन्ने से अच्छी पैदावार और बेहतर मुनाफा प्राप्त किया जा सकता है।
जब खेत में लंबे समय तक पानी जमा रहता है, तो मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। इससे गन्ने की जड़ों को पर्याप्त हवा नहीं मिलती और पौधा कमजोर होने लगता है। इसके कारण पौधों की पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और उनका विकास धीमा हो जाता है।
इसके अलावा, जलभराव के कारण गन्ने में कई खतरनाक बीमारियां जैसे लाल सड़न और अन्य फफूंद जनित रोगों का खतरा बढ़ जाता है। इससे न केवल उत्पादन कम होता है, बल्कि गन्ने की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।
जलभराव वाले क्षेत्रों में गन्ने की खेती के लिए ट्रेंच विधि सबसे प्रभावी तकनीक मानी जाती है। इस विधि में खेत में गहरी नालियां बनाकर गन्ने की बुवाई की जाती है और मेड़ों को ऊंचा रखा जाता है।
इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि अतिरिक्त पानी आसानी से बाहर निकल जाता है और पौधों की जड़ें सुरक्षित रहती हैं। इससे गन्ने का अंकुरण अच्छा होता है और पौधों की वृद्धि भी तेज होती है।
इस विधि से बुवाई करने पर पौधों को पर्याप्त पोषण मिलता है और जलभराव का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।
गन्ने की अच्छी पैदावार के लिए सही किस्म का चयन करना बहुत जरूरी है। कुछ गन्ना किस्में ऐसी होती हैं जो अधिक पानी और नमी को सहन करने की क्षमता रखती हैं।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार CoS 13231, CoP 9301, Co 98014 और CoLk 94184 जैसी किस्में जलभराव वाले क्षेत्रों के लिए बेहतर मानी जाती हैं। ये किस्में कठिन परिस्थितियों में भी अच्छी वृद्धि करती हैं और किसानों को अच्छा उत्पादन देती हैं।
सही किस्मों के उपयोग से गन्ने की गुणवत्ता और चीनी की मात्रा दोनों बेहतर होती हैं, जिससे किसानों को अधिक लाभ मिलता है।
गन्ने की खेती में संतुलित पोषण बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। खेत की तैयारी के समय अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या जैविक खाद का उपयोग करने से मिट्टी की गुणवत्ता सुधरती है।
इसके साथ ही आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे जिंक और अन्य पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग पौधों को मजबूत बनाता है और उन्हें जलभराव की स्थिति में भी जीवित रहने में मदद करता है।
स्वस्थ मिट्टी में उगाया गया गन्ना अधिक मजबूत होता है और उसका उत्पादन भी बेहतर होता है।
गन्ने की खेती के साथ किसान अतिरिक्त आमदनी भी प्राप्त कर सकते हैं। गन्ने की कतारों के बीच खाली जगह में मूंग, उड़द या अन्य दलहनी फसलें उगाना फायदेमंद होता है।
इससे किसानों को अतिरिक्त आय मिलती है और मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ती है। दलहनी फसलें मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाती हैं, जिससे गन्ने की फसल को भी लाभ मिलता है।
यह तरीका किसानों के लिए जोखिम कम करने और आय बढ़ाने का अच्छा विकल्प है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान सही तकनीक, उचित किस्म और संतुलित पोषण का उपयोग करें, तो जलभराव वाले क्षेत्रों में भी गन्ने की पैदावार में 20 से 25 प्रतिशत तक वृद्धि संभव है।
इससे गन्ना अधिक मोटा और लंबा होता है और उसकी गुणवत्ता भी बेहतर होती है। बेहतर गुणवत्ता के कारण किसानों को बाजार में अच्छा मूल्य मिलता है और उनकी आय में वृद्धि होती है।
जलभराव वाले क्षेत्रों में ट्रेंच विधि से बुवाई करें
जलभराव सहन करने वाली उन्नत किस्मों का चयन करें
संतुलित खाद और पोषक तत्वों का उपयोग करें
खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था रखें
सहफसली खेती अपनाकर अतिरिक्त आमदनी प्राप्त करें
जलभराव गन्ने की खेती के लिए एक बड़ी चुनौती है, लेकिन सही तकनीक और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर किसान इस समस्या को अवसर में बदल सकते हैं। ट्रेंच विधि, उन्नत किस्मों और संतुलित पोषण के उपयोग से न केवल फसल सुरक्षित रहती है, बल्कि पैदावार और आमदनी दोनों में वृद्धि होती है।
यदि किसान इन आधुनिक तरीकों को अपनाएं, तो जलभराव वाले क्षेत्रों में भी गन्ने की खेती एक लाभदायक और सफल विकल्प बन सकती है।
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