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खेती की बढ़ती लागत और रसायनिक खाद की महँगाई के बीच किसानों के लिए गौ-आधारित उत्पाद आय का मजबूत जरिया बनकर उभर रहे हैं। अब गाय केवल दूध तक सीमित नहीं रही, बल्कि गोबर और गौमूत्र से भी किसान अच्छी कमाई कर रहे हैं। जैविक खेती की बढ़ती मांग और लोगों की सेहत को लेकर जागरूकता ने इन उत्पादों का बाजार तेज़ी से बढ़ाया है।
किसान गोबर से केंचुआ खाद (वर्मी कम्पोस्ट) बनाकर ₹8 से ₹15 प्रति किलो तक बेच सकते हैं, जिसकी मांग जैविक किसानों, नर्सरी और शहरी बागवानों में लगातार बढ़ रही है। इसके अलावा मशीन से बने गोबर के उपले और लॉग पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों में लोकप्रिय हो रहे हैं। वहीं, खादी ग्रामोद्योग की तकनीक से गोबर से प्राकृतिक पेंट और टाइल्स भी तैयार किए जा रहे हैं, जो सस्ते, इको-फ्रेंडली और एंटी-बैक्टीरियल होने के कारण शहरों में भी पसंद किए जा रहे हैं।
गौमूत्र से जीवामृत और पंचगव्य जैसे जैविक घोल बनाकर किसान प्राकृतिक खेती करने वालों को बेच सकते हैं। गौमूत्र, नीम और लहसुन से बना जैविक कीटनाशक भी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। इसके अलावा, गौमूत्र का आसवन करके आयुर्वेदिक कंपनियों को सप्लाई कर अतिरिक्त आय अर्जित की जा सकती है।
केंद्र और राज्य सरकारें गौशालाओं, वर्मी कम्पोस्ट यूनिट और जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएँ चला रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, सही पैकेजिंग, जूट बैग का उपयोग और गांव या गौशाला के नाम से ब्रांड बनाकर किसान अपने उत्पादों को सीधे बाजार, नर्सरी और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक पहुँचा सकते हैं।
गौ-आधारित उत्पाद किसानों को केवल आर्थिक लाभ ही नहीं दे रहे, बल्कि स्वस्थ मिट्टी, बेहतर पर्यावरण और देसी गौवंश के संरक्षण में भी योगदान दे रहे हैं। आज जरूरत है कि किसान दूध के साथ-साथ गोबर और गौमूत्र को भी अपनी आमदनी का मजबूत आधार बनाएं।
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