फरवरी का महीना अरहर की खेती करने वाले किसानों के लिए बहुत अहम होता है। इस समय फसल फूल और फलियों की अवस्था में होती है, लेकिन बढ़ते तापमान और मौसम में बदलाव के कारण कई खतरनाक कीट सक्रिय हो जाते हैं। यदि किसान समय रहते इन कीटों की पहचान कर सही उपाय नहीं अपनाते, तो अरहर की पैदावार और दानों की गुणवत्ता दोनों पर बुरा असर पड़ सकता है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि फरवरी के दौरान विशेष रूप से फल मक्खी, फली बेधक और पत्ती लपेटक जैसे कीट अरहर की फसल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं।
यह कीट सीधे फलियों और पत्तियों को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे दाने कमजोर हो जाते हैं और कई बार पूरी फसल खराब होने की स्थिति तक पहुंच जाती है। इसलिए जरूरी है कि किसान इन कीटों के लक्षण पहचानें और सही समय पर नियंत्रण के उपाय करें।
फल मक्खी अरहर की फसल के लिए बेहद खतरनाक कीट मानी जाती है। इसका असर सबसे पहले फलियों पर दिखाई देता है। प्रभावित फलियों पर छोटे-छोटे छेद और काले या भूरे धब्बे नजर आते हैं। यह कीट अपने अंडे फलियों के अंदर देता है, जिससे निकलने वाले लार्वा दानों को अंदर से खा जाते हैं।
इसका परिणाम यह होता है कि दाने सिकुड़ जाते हैं और उनकी गुणवत्ता खराब हो जाती है। कई बार संक्रमित फलियां समय से पहले सूखकर गिर जाती हैं, जिससे किसानों को सीधा आर्थिक नुकसान होता है।
बचाव के आसान उपाय
फल मक्खी से बचाव के लिए खेत में कीट दिखाई देते ही दवा का छिड़काव करना जरूरी है। किसान डायमेथोएट 30% EC का छिड़काव 2 मिली प्रति लीटर पानी की दर से कर सकते हैं। इसके अलावा इमिडाक्लोप्रिड का उपयोग भी प्रभावी माना जाता है। जैविक खेती करने वाले किसान नीम के तेल का छिड़काव करके भी इस कीट को नियंत्रित कर सकते हैं।
फली-बेधक कीट अरहर के सबसे नुकसानदायक कीटों में से एक है। यह कीट फलियों में छेद करके अंदर घुस जाता है और दानों को पूरी तरह खा जाता है। कई बार इसका पिछला हिस्सा बाहर दिखाई देता है, जिससे इसकी पहचान आसानी से हो जाती है।
यह कीट सिर्फ फलियों को ही नहीं, बल्कि फूलों और कलियों को भी नुकसान पहुंचाता है। इससे फलियां बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है और पैदावार में भारी गिरावट आ सकती है।
बचाव के उपाय
जब फसल में फूल आने लगें, तब क्लोरएन्ट्रानिलिप्रोल या इमामेक्टिन बेंजोएट जैसी दवाओं का छिड़काव करना लाभकारी होता है। इसके साथ ही खेत में फेरोमोन ट्रैप लगाना भी बहुत उपयोगी है। इससे कीटों की संख्या पर नियंत्रण रखा जा सकता है और समय रहते उनका पता चल जाता है।
इसके अलावा ज्वार या सूरजमुखी की इंटरक्रॉपिंग करने से भी कीटों का प्रकोप कम होता है।
पत्ती लपेटक कीट अरहर की पत्तियों को जाले से लपेट देता है और उन्हें खाकर नुकसान पहुंचाता है। प्रभावित पत्तियां सूखने लगती हैं और पौधे की वृद्धि रुक जाती है। अगर समय पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह कीट पूरी फसल को कमजोर कर सकता है।
बचाव के उपाय
इस कीट से बचाव के लिए इमामेक्टिन बेंजोएट या क्लोरोपायरीफॉस दवा का छिड़काव किया जा सकता है। इसके साथ ही संक्रमित पत्तियों को तोड़कर नष्ट करना भी जरूरी है, ताकि कीट आगे न फैल सके। शुरुआती अवस्था में नीम के तेल का छिड़काव करना भी बहुत प्रभावी और सुरक्षित उपाय है।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अरहर की फसल की नियमित निगरानी करना बहुत जरूरी है। खेत का समय-समय पर निरीक्षण करने से कीटों की पहचान शुरुआती अवस्था में ही हो जाती है और नुकसान को रोका जा सकता है। साथ ही, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और साफ-सफाई रखने से भी कीटों का खतरा कम हो जाता है।
फरवरी का समय अरहर की फसल के लिए संवेदनशील होता है, इसलिए किसान सावधानी और सही जानकारी के साथ फसल की देखभाल करें। समय पर सही उपाय अपनाकर किसान अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं और बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
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