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मूंगफली की फसल में सफेद लट को नियंत्रण करने का तरीका, साथ ही जानिए ध्यान रखने वाली बातों को
मूंगफली की फसल में सफेद लट को नियंत्रण करने का तरीका, साथ ही जानिए ध्यान रखने वाली बातों को

Groundnut Farming: सफेद लट भूमि में रहकर जीवित पौधों की जड़ों को खाती है। लटें जब छोटी होती है तब पौधों की सूक्ष्म जड़ों को काटती है। बड़ी अवस्था में मुख्य जड़ों को काटती है। लट द्वारा जड़ों को काट देने से पौधा पीला पड़कर सूखने लगता है। ऐसे लट ग्रसित पौधा खींचने पर आसानी से मिट्टी से बाहर आ जाता है। खेतों में सूखे पौधे दिखाई देने पर ही लट के प्रकोप का आभास होता है। जड़ों के पास की मिट्टी खोदने पर लट दिखाई देती है। सफेद लट के नियंत्रण हेतु इसके जीवन चक्र के बारे में जानकारी होना अति आवश्यक है।

जीवन चक्र: मानसून अथवा मानसून पूर्व की पहली अच्छी वर्षा के बाद इस कीट के प्रौढ़/भृंग सांयकाल भूमि से बाहर निकलते है। आसपास के पोषी वृक्षों जैसे नीम, बेर, सेजना, खेजड़ी रोहिड़ा आदि पर बैठते है। मादा भृंग अपने शरीर से एक विशेष प्रकार का रसायन वायु में विसर्जित करती है। नर भृंग इस रसायन से आकर्षित होकर से मादा श्रृंगों की तरफ मिलन के लिए आते है। मादा भृंग मिलन के 3-4 दिन बाद जमीन में लगभग 10 सेमी गहराई पर अण्डे देना प्रारंम्भ करती है। एक मादा औसतन 15-20 अण्डे अलग-अलग समय पर देती है। अण्डों में से 7-13 दिन के बाद छोटी लटें निकलती है। जिन्हें प्रथम अवस्था लट कहा जाता है। यह करीब 15 मिमी. लम्बी होती है जो पौधों की सूक्ष्म जड़ों को खाती है। लटों की यह प्रथम अवस्था लगभग दो सप्ताह तक रहती है। तत्पश्चात् यह द्वितीय अवस्था में आ जाती है। जिसकी औसतन लम्बाई 35 मिली मीटर होती है। करीब 4-5 सप्ताह तक द्वितीय अवस्था में रहने के पश्चात् लट तृतीय और अंतिम अवस्था में परिवर्तित हो जाती है। यह औसतन 41 मिलीमीटर लम्बी होती है। लट की यह तृतीय अवस्था 6- 8 सप्ताह तक रहती है। यही द्वितीय और तृतीय अवस्था की लटें पौधों की जड़ों को काटकर अधिक नुकसान पहुंचाती है।

जुलाई से अक्टूबर तक नुकसान
सफेद लट (White Grub) का पूर्ण समय काल 12-15 सप्ताह का होता है। जिसके अन्तर्गत यह जुलाई से मध्य अक्टूबर तक पौधों की जड़ों को खाकर नुकसान पहुंचाती है। इसके पश्चात् यह लटें भूमि में 40- 70 सेमी गहराई में चली जाती है और शंकु (प्यूपा) में परिवर्तित हो जाती है। शंकु (प्यूपा) से लगभग दो सप्ताह में प्रौढ़ भृंग निकल आते है जो अगली वर्षा आने तक भूमि की गहराई में 70-100 सेमी. तक चले जाते है। इस समय यह भृंग निष्क्रीय होते है। इसी निष्क्रियता की अवस्था में अगली वर्षा तक भूमि में पड़े रहते है। मानसून की वर्षा के बाद यह भृंग भूमि से बाहर निकल कर अपना अगला जीवन चक आरंम्भ कर देते है। इस प्रकार एक वर्ष में इस फीट की एक ही पीढ़ी पाई जाती है।

समन्वित प्रबंधन
परपोषी पर भृंग नियंत्रण :- सफेद लट से फसलों को बचाने लिए, भृंग नियंत्रण सबसे सस्ता, कारगर और दूरगामी प्रभाव वाला उपाय है। साथ ही, इससे पर्यावरण प्रदूषण से भी बचा जा सकता हैं। क्योंकि लट नियंत्रण की तुलना में भृंग नियंत्रण में प्रति हैक्टयर कीटनाशकों की मात्रा बहुत ही कम लगती है। मानसून अथवा मानसून पूर्व की पहली अच्छी वर्षा के बाद यह भृंग संध्या के समय भूमि से बाहर निकलकर पोषी वृक्षों (नीम, खेजड़ी, बेर, रोहिड़ा, सेंजना) पर बैठते है। इसलिए खेत में और आसपास ऐसे वृक्षों की कटाई और छंगाई कर देनी चाहिए जिससे उनको बैठने हेतु आश्रय और भोजन नहीं मिले। पहली अच्छी वर्षा के बाद इन पोषी वृक्षों पर मोनोक्रोटोफोस 36 एसएल अथवा क्यूनालफॉस 25 ईसी 1.5 मिली प्रति लीटर अथवा इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल 0.5 मिली प्रति लीटर पानी में घोलकर संध्या के समय छिड़काव करना चाहिए। जिससे भृंगो का कीटनाशक रसायनों के छिड़काव से नियंत्रण हो सके। जहां पर छिड़काव की सुविधा ना हो वहां पर पोषी पौधों के नीचे चादर, प्लास्टिक सीट अथवा तिरपाल बिछाकर डण्डे से हिलाए और नीचे गिरे भृगों को एकत्रित कर मिट्टी के तेल युक्त पानी (एक भाग मिट्टी का तेल और 20 भाग पानी) में डालकर नष्ट करें।

लट नियंत्रणः- गर्मी की गहरी जुताई करे। जिससे जमी सुषुप्तावस्था में पड़े कीट सूर्य की तेज रोशनी से नष्ट हो जाये। परभक्षी पक्षियों भोजन बन जाए। हमेशा अच्छी सड़ी खाद काम में लेवे। बिजाई से पूर्व गूंगफली के बीजों को 3 मिली इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल अथवा 6 मिली क्लोरायरीफोस 20 ईसी से प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें। खड़ी फसल में लट नियंत्रण हेतु मानसून की वर्षा के बाद जब भृंग निकलने लगे उसके ठीक 20-25 दिन बाद प्रति हेक्टयर इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल 300 मिली अथवा क्यूनालफॉस 25 ईसी अथवा क्लोरपायरीफोस 20 ईसी 4 लीटर को 100 किलो सड़ी खाद अथवा वर्मीकम्पोट में मिलाकर देवें और सिंचाई करें। 

इन बातों का रखें ध्यान
  • बीजोपचार करते समय हाथों में दस्ताने और मुंह पर मास्क अवश्य लगाए ।
  • खड़ी फसल में सफेद लट नियंत्रण भृगों के निकलने के 20-25 दिन बाद अवश्य कर देवें, पौधों के मरने का इन्तजार ना करें। सफेद लट नियंत्रण हेतु कीटनाशी मिश्रित खाद अथवा रेत बिखेरने के साथ तुरन्त सिंचाई करें।
  • जिस खेत में कीटनाशी दवा डाली गई है। उन खेतों से निकाले गए खरपतवार 40 दिनों तक पशुओं को ना खिलाए।

- डॉ. वीके सैनी, मुकेश शर्मा, हरीश कुमार रछोयां, 
                  कृषि विज्ञान केन्द्र, सरदारशहर चूरू-1