18 महीने में तैयार होने वाली फसल, बाजार में भारी मांग – जानिए शतावरी की पूरी खेती

18 महीने में तैयार होने वाली फसल, बाजार में भारी मांग – जानिए शतावरी की पूरी खेती
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Kisaan Helpline

Crops
Apr 06, 2026

परिचय: क्यों खास है शतावरी की खेती?

 

शतावरी, जिसे आयुर्वेद में अत्यंत महत्वपूर्ण औषधीय पौधा माना जाता है, आज किसानों के लिए एक लाभदायक विकल्प बनती जा रही है। यह पौधा लिली परिवार से संबंधित है और मुख्य रूप से इसकी जड़ों का उपयोग दवाइयों के निर्माण में किया जाता है। भारत के कई हिस्सों, खासकर मध्य प्रदेश और हिमालयी क्षेत्रों में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा रही है।

शतावरी की खास बात यह है कि इसे कम पानी और कम देखभाल में उगाया जा सकता है, जबकि बाजार में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।

 

औषधीय महत्व: आयुर्वेद में शतावरी की भूमिका

 

शतावरी कोऔषधियों की रानीभी कहा जाता है। इसकी जड़ों में पाए जाने वाले प्राकृतिक तत्व शरीर को ऊर्जा देने के साथ-साथ रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक होते हैं।

विशेष रूप से महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए यह बेहद उपयोगी मानी जाती है। इसका उपयोग दूध बढ़ाने वाली दवाओं, टॉनिक और इम्यूनिटी बूस्टर बनाने में किया जाता है। यही कारण है कि बड़ी आयुर्वेदिक कंपनियां इसकी जड़ों की बड़े स्तर पर खरीद करती हैं।

 

उपयुक्त जलवायु और मिट्टी

 

शतावरी की खेती के लिए गर्म और मध्यम जलवायु सबसे बेहतर मानी जाती है। 10 से 50 डिग्री सेल्सियस तापमान में यह अच्छी तरह विकसित होती है।

मिट्टी की बात करें तो बलुई दोमट भूमि, जिसमें पानी का निकास अच्छा हो, सबसे उपयुक्त होती है। खेत तैयार करते समय 2-3 बार जुताई करके उसमें पर्याप्त मात्रा में गोबर की खाद मिलाना जरूरी है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है।

 

नर्सरी और रोपाई की सही विधि

 

शतावरी की खेती आमतौर पर बीजों के माध्यम से की जाती है। पहले नर्सरी में पौधे तैयार किए जाते हैं। जब पौधे लगभग 40-45 दिन के हो जाते हैं और उनकी ऊंचाई 4-5 इंच तक पहुंच जाती है, तब उन्हें खेत में लगाया जाता है।

रोपाई के समय पौधों के बीच लगभग 60 सेंटीमीटर की दूरी रखी जाती है। गड्ढे बनाकर उनमें पौधों को सावधानीपूर्वक लगाया जाता है, जिससे जड़ों का विकास अच्छे से हो सके।

 

बुवाई का सही समय

 

शतावरी की बुवाई फरवरी से लेकर जून-जुलाई तक की जा सकती है। यदि समय पर बुवाई और सही तकनीकों का पालन किया जाए, तो किसान बेहतर उत्पादन और अधिक मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं।

 

खाद और पोषण प्रबंधन

 

बेहतर उत्पादन के लिए जैविक खाद का उपयोग अत्यंत लाभकारी होता है। खेत तैयार करते समय गोबर की खाद डालने के साथ-साथ हर वर्ष जून-जुलाई में केंचुआ खाद या कम्पोस्ट का उपयोग करना चाहिए।

इसके अलावा बायो-फर्टिलाइजर का प्रयोग करने से मिट्टी की गुणवत्ता बनी रहती है और पौधों की वृद्धि भी बेहतर होती है।

 

खरपतवार नियंत्रण और देखभाल

 

शतावरी की खेती में खरपतवार नियंत्रण बहुत जरूरी होता है। समय-समय पर निराई-गुड़ाई करने से केवल खरपतवार हटते हैं, बल्कि मिट्टी भी भुरभुरी रहती है, जिससे जड़ों का विकास अच्छा होता है।

इस फसल की खासियत यह है कि इसमें कीट और रोगों का प्रकोप बहुत कम होता है, जिससे किसानों का खर्च और मेहनत दोनों कम हो जाते हैं।

 

सिंचाई प्रबंधन: कम पानी में ज्यादा फायदा

 

शतावरी की फसल को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती। सामान्यतः महीने में एक बार सिंचाई पर्याप्त होती है।

ड्रिप इरीगेशन प्रणाली का उपयोग करके पानी की बचत के साथ बेहतर उत्पादन लिया जा सकता है। ध्यान रखें कि खेत में पानी जमा हो, क्योंकि इससे जड़ों को नुकसान हो सकता है।

 

फसल तैयार होने की अवधि और कटाई

 

शतावरी की फसल को तैयार होने में लगभग 18 से 20 महीने का समय लगता है। जब पौधों के बीज पक जाते हैं, तब जड़ों की खुदाई का समय जाता है।

खुदाई के दौरान सावधानी बरतना जरूरी है ताकि जड़ें टूटें नहीं। खुदाई के बाद जड़ों का छिलका हटाकर उन्हें छाया में सुखाया जाता है और फिर बाजार के लिए तैयार किया जाता है।

 

प्रोसेसिंग और भंडारण

 

जड़ों को निकालने के बाद तुरंत उनका छिलका हटाना जरूरी होता है, क्योंकि सूखने के बाद यह प्रक्रिया कठिन हो जाती है।

सुखाई गई जड़ों को पूरी तरह से सूखने के बाद एयरटाइट पैकिंग में रखा जाता है, जिससे उनकी गुणवत्ता बनी रहती है और लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

 

उत्पादन और पैदावार

खेती और प्रोसेसिंग

शतावरी की खेती बीजों से की जाती है। एक एकड़ ज़मीन के लिए लगभग 5 किलोग्राम बीजों की ज़रूरत होती है। सबसे पहले, पौधे तैयार किए जाते हैं, और उसके बाद उन्हें खेत में लगाया जाता है। जब पौधे पूरी तरह से बड़े हो जाते हैं, तो उनकी जड़ें निकाली जाती हैं। अगर कटाई के दौरान लगभग 350 क्विंटल गीली जड़ें मिलती हैं, तो प्रोसेसिंग के बाद उनसे लगभग 35 क्विंटल सूखी जड़ें मिलती हैं।

एक हेक्टेयर क्षेत्र से लगभग 3 से 4 टन सूखी जड़ प्राप्त हो सकती है। इसके अलावा बीज उत्पादन भी किया जा सकता है, जिससे अतिरिक्त आय का स्रोत बनता है।

गीली जड़ों को सुखाने के बाद उनका वजन काफी कम हो जाता है, लेकिन बाजार में सूखी जड़ों की कीमत अधिक होती है।

 

कम लागत में ज्यादा मुनाफा

 

शतावरी की खेती में लागत अपेक्षाकृत कम आती है। एक बीघा खेत में इसकी खेती करने पर लगभग 20,000 रुपये का खर्च होता है।

वहीं, फसल तैयार होने के बाद किसानों को 1.5 लाख रुपये तक का मुनाफा मिल सकता है। वर्तमान में बाजार में इसकी कीमत 25,000 से 30,000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच रही है, जो इसे एक अत्यधिक लाभदायक फसल बनाती है।

 

क्यों अपनाएं शतावरी की खेती?

 

आज के समय में जब पारंपरिक खेती से मुनाफा कम हो रहा है, ऐसे में शतावरी जैसी औषधीय फसल किसानों के लिए एक बेहतरीन विकल्प बनकर उभरी है।

कम पानी, कम देखभाल और उच्च बाजार मूल्य के कारण यह फसल किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यदि वैज्ञानिक तरीके से इसकी खेती की जाए, तो यह किसानों को लंबे समय तक स्थायी और अच्छा लाभ दे सकती है।

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