गलघोटू बीमारी से कुछ ही घंटों में हो सकती है पशुओं की मौत, समय पर टीकाकरण ही बचाव

गलघोटू बीमारी से कुछ ही घंटों में हो सकती है पशुओं की मौत, समय पर टीकाकरण ही बचाव
News Banner Image

Kisaan Helpline

Agriculture
Apr 07, 2026

मानसून का मौसम जहां खेती के लिए फायदेमंद होता है, वहीं पशुपालकों के लिए कई तरह की बीमारियों का खतरा भी बढ़ा देता है। खासकर गाय और भैंस पालने वाले किसानों के लिए यह समय बेहद संवेदनशील होता है। बदलते मौसम, बढ़ती नमी और पशुशालाओं में गंदगी के कारण कई संक्रामक रोग तेजी से फैलते हैं। इन्हीं में से एक है गलघोटू (Hemorrhagic Septicemia), जो हर साल हजारों पशुओं की जान ले लेता है।


यह बीमारी इतनी खतरनाक होती है कि कई मामलों में 12 से 24 घंटे के अंदर ही पशु की मृत्यु हो सकती है। इसलिए इसे पशुपालन क्षेत्र की सबसे घातक बीमारियों में गिना जाता है। यदि समय रहते इसका बचाव न किया जाए, तो यह पूरे गांव या क्षेत्र में तेजी से फैल सकती है।


क्या है गलघोटू बीमारी और कैसे फैलती है?

गलघोटू एक जीवाणु जनित बीमारी है, जो Pasteurella multocida नामक बैक्टीरिया के कारण होती है। यह बैक्टीरिया वातावरण में पहले से मौजूद रहता है, लेकिन जैसे ही मौसम में नमी बढ़ती है और साफ-सफाई में कमी आती है, यह तेजी से सक्रिय हो जाता है।


यह बीमारी मुख्य रूप से निम्न माध्यमों से फैलती है:

  • संक्रमित पशु के सीधे संपर्क में आने से

  • लार, नाक के स्राव और सांस के जरिए

  • दूषित पानी और चारे के सेवन से

  • भीड़भाड़ वाले और गंदे पशुशाला वातावरण में


बरसात के मौसम में जब पशु एक ही स्थान पर अधिक समय तक रहते हैं और जमीन गीली रहती है, तब संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।


किन क्षेत्रों और परिस्थितियों में ज्यादा खतरा?

यह बीमारी विशेष रूप से उन क्षेत्रों में अधिक फैलती है जहां:

  • भारी वर्षा होती है

  • जलभराव की स्थिति बनी रहती है

  • पशुशालाओं में सफाई की कमी होती है

  • पशुओं को खुले और गीले स्थान पर बांधा जाता है


मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान जैसे राज्यों में मानसून के दौरान इसके मामले अधिक सामने आते हैं। छोटे और सीमांत किसान, जिनके पास सीमित संसाधन होते हैं, इस बीमारी से ज्यादा प्रभावित होते हैं।


गलघोटू के लक्षण पहचानना क्यों जरूरी?

इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके लक्षण अचानक दिखाई देते हैं और बहुत तेजी से बढ़ते हैं। कई बार किसान लक्षण पहचान नहीं पाते और तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।


मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं:

  • तेज बुखार (104–106°F तक)

  • गले और गर्दन में दर्दनाक सूजन

  • सांस लेने में कठिनाई और तेज सांस

  • मुंह और नाक से अधिक लार या स्राव

  • पशु का सुस्त और कमजोर हो जाना

  • चारा और पानी छोड़ देना

  • आंखों का लाल होना

  • अचानक गिर जाना


यदि समय पर इलाज न मिले, तो पशु की मौत बहुत जल्दी हो सकती है।


इलाज संभव है या नहीं?

गलघोटू का इलाज संभव है, लेकिन यह तभी प्रभावी होता है जब बीमारी की शुरुआती अवस्था में पहचान हो जाए। एंटीबायोटिक्स और सपोर्टिव थेरेपी से कुछ मामलों में पशु को बचाया जा सकता है, लेकिन देरी होने पर इलाज का असर कम हो जाता है। इसलिए विशेषज्ञ हमेशा यह सलाह देते हैं कि इलाज से ज्यादा ध्यान रोकथाम (Prevention) पर देना चाहिए।


टीकाकरण क्यों है सबसे जरूरी?

गलघोटू से बचाव का सबसे सुरक्षित और सस्ता तरीका टीकाकरण है। सरकार और पशुपालन विभाग हर साल इस बीमारी के खिलाफ टीकाकरण अभियान भी चलाते हैं।


टीकाकरण से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें:

  • 6 महीने की उम्र में पहला टीका लगवाएं

  • इसके बाद हर साल एक बार बूस्टर डोज जरूरी है

  • मई-जून में टीकाकरण कराना सबसे सही समय होता है

  • एक बार टीका लगने से पशु को पूरे मानसून के दौरान सुरक्षा मिलती है


समय पर टीकाकरण कराने से इस बीमारी का खतरा लगभग खत्म किया जा सकता है।


पशुपालकों के लिए अतिरिक्त सावधानियां

टीकाकरण के साथ-साथ कुछ जरूरी प्रबंधन उपाय अपनाना भी जरूरी है:

  • पशुशाला को हमेशा साफ, सूखा और हवादार रखें

  • पानी जमा न होने दें

  • पशुओं को गीली जमीन पर न बांधें

  • नए खरीदे गए पशु को कुछ दिन अलग रखें

  • बीमार पशु को तुरंत अलग कर दें

  • पशुओं को साफ और ताजा चारा-पानी दें

  • नियमित रूप से पशु चिकित्सक से जांच कराएं

  • आर्थिक नुकसान से बचने का एक ही तरीका


गलघोटू बीमारी न केवल पशुओं की जान लेती है, बल्कि किसानों को भारी आर्थिक नुकसान भी पहुंचाती है। एक दुधारू पशु की मौत का मतलब है सीधे तौर पर आय का नुकसान, जिससे किसान की आर्थिक स्थिति पर असर पड़ता है। यदि एक गांव में यह बीमारी फैल जाए, तो कई पशुओं की जान जा सकती है, जिससे पूरे क्षेत्र की पशुपालन व्यवस्था प्रभावित होती है।


गलघोटू एक तेजी से फैलने वाली और जानलेवा बीमारी है, लेकिन सही समय पर टीकाकरण और साफ-सफाई के जरिए इससे पूरी तरह बचाव किया जा सकता है। पशुपालकों को चाहिए कि वे मानसून शुरू होने से पहले ही अपने पशुओं का टीकाकरण कराएं और पशुशाला की साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दें। थोड़ी सी जागरूकता और सावधानी से बड़े नुकसान से बचा जा सकता है।

Smart farming and agriculture app for farmers is an innovative platform that connects farmers and rural communities across the country.

© All Copyright 2024 by Kisaan Helpline