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चना की खेती के लिए अच्छी जल निकास वाली मिट्टी चुनें, क्षेत्र के अनुसार अच्छी किस्म का बीज लें, बुआई से पहले बीज उपचार करें और उचित समय पर बुआई करें। खाद की मात्रा मिट्टी की जांच के आधार पर तय करें तथा सिंचाई जरूरत के अनुसार करें। फली छेदक, उकठा और खरपतवार की समय पर निगरानी भी जरूरी है।
रबी सीजन में चना किसानों के लिए एक प्रमुख दलहनी फसल है। अगर खेत का सही चुनाव, समय पर बुआई, अच्छे बीज का इस्तेमाल, बीज उपचार और जरूरत के अनुसार खाद-पानी का प्रबंधन किया जाए, तो चने की फसल को अच्छी शुरुआत मिल सकती है। जानिए चना की खेती कैसे करें, कौन-सी सावधानियां रखें और अच्छी पैदावार के लिए किन बातों का ध्यान देना जरूरी है।
चना भारत की प्रमुख दलहनी फसलों में शामिल है। इसकी दाल और बेसन का इस्तेमाल घरों में रोजमर्रा के भोजन से लेकर कई तरह के व्यंजनों में होता है। हरे चने को भी सब्जी के रूप में खाया जाता है।
लेकिन किसान के लिए चना सिर्फ खाने की फसल नहीं, बल्कि रबी सीजन की एक महत्वपूर्ण कमाई वाली फसल भी है। इसकी खेती में शुरुआत से सही प्रबंधन किया जाए तो फसल की बढ़वार और उत्पादन बेहतर रखने में मदद मिल सकती है।
चना की खेती के लिए कैसी मिट्टी होनी चाहिए?
चना ऐसी जमीन में अच्छा रहता है जहां पानी की निकासी अच्छी हो। हल्की से मध्यम बनावट वाली मिट्टी, जैसे बलुई दोमट से दोमट मिट्टी, इसकी खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
खेत में पानी लंबे समय तक जमा रहने से चने की फसल को नुकसान हो सकता है। इसलिए ऐसी जमीन से बचें जहां जलभराव की समस्या रहती हो। ICAR के
अनुसार अच्छी जल निकासी वाली हल्की से मध्यम मिट्टी चने के लिए उपयुक्त रहती है, जबकि जलभराव वाली जमीन उपयुक्त नहीं है।
मिट्टी का पीएच भी चने की खेती में महत्वपूर्ण है। सामान्य तौर पर करीब 6 से 7.5 पीएच वाली मिट्टी अच्छी मानी जाती है।
चने की बुआई से पहले खेत कैसे तैयार करें?
चने के लिए खेत को बहुत ज्यादा महीन करने की जरूरत नहीं होती। मिट्टी न तो बहुत कड़ी हो और न ही जरूरत से ज्यादा भुरभुरी।
खेत की स्थिति के अनुसार जुताई करके बड़े ढेलों को तोड़ें और खेत को समतल करें। बुआई के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी रहनी चाहिए।
अगर खेत में पिछली फसल के अवशेष या खरपतवार हैं, तो उनका भी सही तरीके से प्रबंधन करें। जरूरत से ज्यादा जुताई करने के बजाय मिट्टी और पिछली फसल की स्थिति देखकर जुताई का तरीका तय करना बेहतर है।
चने की उन्नत किस्म कौन-सी लगाएं?
चने की किस्म का चुनाव अपने क्षेत्र, मिट्टी, पानी की उपलब्धता और बुआई के समय के अनुसार करना चाहिए।
किसानों के बीच JG 11, JG 315, JG 74, JG 322, JG 130,
JG 16, JG 63, JG 412, JG 226, JG 6 और JAKI 9218 जैसी किस्में अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित रही हैं।
इसके अलावा काबुली चने की भी कई किस्में उपलब्ध हैं। ICAR-भारतीय
दलहन अनुसंधान संस्थान की सूची में अलग-अलग क्षेत्रों के लिए देसी और काबुली चने की कई किस्में दी गई हैं। उदाहरण के लिए DCP 92-3 उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र के लिए और IPCK 2002-29 तथा IPCK 2004-29 मध्य क्षेत्र के लिए दर्ज हैं।
किसान अपने इलाके में अनुशंसित किस्म को प्राथमिकता दें। हर किस्म हर क्षेत्र में एक जैसा प्रदर्शन करे, यह जरूरी नहीं है।
चने की बुआई में कितना बीज लगेगा?
बीज की मात्रा चने की किस्म और दाने के आकार पर निर्भर करती है। देसी और काबुली चने में बीज दर अलग हो सकती है।
ICAR की रबी सलाह के अनुसार देसी और काबुली चने की बीज दर में अंतर रहता है और किस्म के अनुसार भी मात्रा बदल सकती है।
इसलिए केवल एक तय मात्रा देखकर बीज न डालें। किस्म, दाने के आकार और स्थानीय सिफारिश के अनुसार बीज दर तय करें।
बुआई से पहले बीज की अंकुरण क्षमता की जांच करना भी अच्छा रहता है।
चने का बीज उपचार क्यों जरूरी है?
चने की खेती में बीज उपचार को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इससे बीज और मिट्टी से फैलने वाले कुछ रोगों का खतरा कम करने में मदद मिलती है।
फसल की जरूरत के अनुसार अनुशंसित फफूंदनाशी से बीज उपचार किया जा सकता है। इसके साथ चने के लिए राइजोबियम कल्चर का इस्तेमाल भी किया जाता है। ICAR की
सलाह में चने की पहली बार खेती वाले खेतों में राइजोबियम कल्चर से बीज उपचार की सिफारिश की गई है।
ICAR के अनुसार चने के लिए विशिष्ट राइजोबियम आधारित जैव उर्वरक भी विकसित किए गए हैं। इनका उद्देश्य नाइट्रोजन स्थिरीकरण में मदद करना है।
अगर ट्राइकोडर्मा या किसी अन्य जैविक उत्पाद का इस्तेमाल करना हो, तो उत्पाद के लेबल और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही मात्रा रखें।
चने की बुआई कब करें?
चना बुआई का सही समय क्षेत्र और मौसम पर निर्भर करता है। सामान्य तौर पर चने की बुआई अक्टूबर से नवंबर के बीच की जाती है। मध्य और दक्षिण भारत में अक्टूबर के पहले पखवाड़े से नवंबर के पहले पखवाड़े तक का समय कई परिस्थितियों में उपयुक्त माना जाता है, जबकि उत्तर भारत में वर्षा आधारित और सिंचित स्थिति के अनुसार समय अलग हो सकता है।
बहुत देर से, खासकर दिसंबर-जनवरी में बुआई करने पर फसल को दाना भरने के समय कम नमी और ज्यादा तापमान का सामना करना पड़ सकता है, जिससे उत्पादन और दाने की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
इसलिए अपने क्षेत्र की अनुशंसित बुआई अवधि में चना बोना बेहतर रहता है।
चने की बुआई कितनी गहराई और दूरी पर करें?
चना आमतौर पर कतार में बोया जाता है। ICAR की
सलाह में करीब 30 सेंटीमीटर
कतार दूरी और लगभग 10 से
12.5 सेंटीमीटर तक बुआई की गहराई बताई गई है।
हालांकि बीज की गहराई मिट्टी और नमी की स्थिति के अनुसार भी देखी जानी चाहिए। बहुत उथली बुआई करने पर पौधों को कुछ रोगों का खतरा बढ़ सकता है।
चने की फसल में खाद और उर्वरक कैसे दें?
चना दलहनी फसल है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इसमें पोषक तत्वों की जरूरत नहीं होती। सबसे पहले मिट्टी की जांच कराएं। इसके बाद उसी के अनुसार खाद और उर्वरक की मात्रा तय करें।
ICAR की रबी सलाह में चने के लिए सामान्य तौर पर नाइट्रोजन और फास्फोरस की अनुशंसित मात्रा दी गई है, जबकि पोटाश और दूसरे पोषक तत्वों की जरूरत मिट्टी की स्थिति के अनुसार तय की जाती है।
इसलिए हर खेत में एक जैसी मात्रा में यूरिया, डीएपी या दूसरी खाद डालना सही तरीका नहीं है।
मिट्टी की रिपोर्ट के अनुसार संतुलित पोषण दें।
चने में सिंचाई कब करें?
चना कम पानी में भी उगने वाली फसल है, लेकिन सिंचाई की सुविधा होने पर जरूरत के समय पानी देने से फायदा हो सकता है।
फसल में पानी की जरूरत शाखाएं बनने और फली बनने की अवस्था में हो सकती है। ICAR-भारतीय
दलहन अनुसंधान संस्थान के अनुसार शाखा बनने और फली विकास की अवस्था में स्प्रिंकलर से सिंचाई से उत्पादन और पानी के उपयोग की दक्षता में सुधार देखा गया है।
लेकिन चने के खेत में पानी जमा नहीं होना चाहिए। फूल और फली बनने की अवस्था में जरूरत से ज्यादा पानी देने के बजाय फसल की वास्तविक नमी जरूरत देखकर सिंचाई करें।
चने में खुटाई या ऊपरी बढ़वार रोकने का काम कब करें?
कुछ क्षेत्रों में किसान चने की फसल में पौधे की ऊपरी बढ़वार को हल्का नियंत्रित करने के लिए खुटाई या निपिंग करते हैं। इसका उद्देश्य पौधे में अधिक शाखाएं निकलने में मदद करना होता है।
लेकिन यह काम हर किस्म और हर परिस्थिति में जरूरी नहीं है। अगर करना हो तो फसल की अवस्था और स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार ही करें।
चने की फसल में कौन-कौन से कीट लगते हैं?
चने में कई कीट नुकसान पहुंचा सकते हैं। इनमें फली छेदक प्रमुख कीटों में शामिल है। यह कीट फूल और फलियों की अवस्था में ज्यादा नुकसान कर सकता है। इसलिए फूल आने के बाद खेत की नियमित निगरानी करें। कटवर्म और सेमीलूपर जैसे कीट भी कुछ परिस्थितियों में फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
कीट दिखाई देते ही बिना पहचान के दवा का छिड़काव न करें। पहले खेत की निगरानी करें और जरूरत होने पर समन्वित कीट प्रबंधन अपनाएं।
चने में उकठा और जड़ सड़न से कैसे बचें?
चने की फसल में उकठा और जड़ सड़न जैसी बीमारियां परेशानी पैदा कर सकती हैं।
इनसे बचाव के लिए शुरुआत से ही सावधानी रखें:
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स्वस्थ और अच्छी गुणवत्ता वाला बीज लें
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बुआई से पहले बीज उपचार करें
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रोग प्रभावित खेत में फसल चक्र अपनाएं
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स्थानीय क्षेत्र के लिए उपयुक्त किस्म चुनें
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खेत में पानी जमा न होने दें
ICAR के अनुसार चने में रोग प्रबंधन के लिए रोग सहनशील किस्म, बीज उपचार और उचित फसल प्रबंधन महत्वपूर्ण हैं।
चने में खरपतवार नियंत्रण कैसे करें?
चने के खेत में बथुआ, सेंजी और दूसरे चौड़ी पत्ती वाले तथा घास वर्ग के खरपतवार दिखाई दे सकते हैं।
शुरुआती अवस्था में खरपतवार फसल के साथ पानी, पोषक तत्व और जगह के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। इसलिए समय पर निराई-गुड़ाई या अनुशंसित खरपतवार नियंत्रण उपाय अपनाना जरूरी है।
ICAR-भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान ने चने में खरपतवार नियंत्रण के लिए अलग-अलग परिस्थितियों में पूर्व और बाद में उगने वाले खरपतवारों के नियंत्रण की तकनीकें विकसित की हैं।
रसायन का इस्तेमाल करते समय फसल की अवस्था, उत्पाद के लेबल और स्थानीय कृषि विभाग की अनुशंसा का पालन करें। बिना सलाह के किसी रसायन की मात्रा तय करके छिड़काव न करें।
चने की फसल में कितनी पैदावार मिल सकती है?
चने की पैदावार हर खेत में एक जैसी नहीं होती। यह किस्म, मौसम, मिट्टी, बुआई के समय, पानी, पोषण और कीट-रोग प्रबंधन पर निर्भर करती है।
ICAR की किस्मों की सूची में कुछ देसी और काबुली किस्मों की संभावित उपज करीब 18 से
25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर या उससे आसपास बताई गई है, लेकिन यह किस्म और अनुशंसित क्षेत्र के अनुसार बदलती है।
इसलिए किसी एक उपज को हर किसान के लिए पक्का मानना सही नहीं होगा।
चने की कटाई कब करें?
जब पौधे अच्छी तरह पक जाएं और फलियां सूखने लगें, तब फसल की कटाई करें।
बहुत ज्यादा देर तक फसल को खेत में खड़ा रखने से सूखी फलियों से दाने गिरने का नुकसान हो सकता है। इसलिए फसल की पकने की अवस्था देखकर समय पर कटाई करना जरूरी है।
कटाई के बाद दानों को अच्छी तरह सुखाएं और तभी भंडारण करें।
चने का भंडारण कैसे करें?
भंडारण से पहले चने के दानों को अच्छी तरह सुखाना जरूरी है।
भंडारण की जगह साफ, सूखी और नमी से सुरक्षित होनी चाहिए। जूट की बोरियों, धातु के डिब्बों या सुरक्षित भंडारण पात्रों में चना रखा जा सकता है।
भंडारण के दौरान घुन और दूसरे कीटों पर भी नजर रखें। अगर दानों में नमी ज्यादा रह गई तो भंडारण में समस्या बढ़ सकती है।
चना की खेती में इन गलतियों से बचें
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बिना जांच के खाद डालना: मिट्टी की जरूरत जाने बिना हर साल एक जैसी खाद डालने से खर्च बढ़ सकता है।
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देर से बुआई करना: देर से बोई गई फसल को दाना भरने के समय तापमान और नमी की समस्या हो सकती है।
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बीज उपचार छोड़ देना: रोगों से बचाव के लिए बीज उपचार को खेती की शुरुआत का जरूरी हिस्सा मानें।
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खेत में पानी जमा करना: चना जलभराव को सहन नहीं करता।
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कीट की पहचान किए बिना दवा डालना: पहले कीट की पहचान करें, फिर अनुशंसित उपाय अपनाएं।
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भंडारण से पहले दाना ठीक से न सुखाना: इससे भंडारण में कीट और नमी से जुड़ी परेशानी हो सकती है।
किसान के लिए सबसे जरूरी बात
चना की अच्छी फसल के लिए कोई एक उपाय काफी नहीं होता। सही खेत, सही किस्म, समय पर बुआई, बीज उपचार, संतुलित पोषण, जरूरत के अनुसार सिंचाई और समय पर कीट-रोग नियंत्रण—इन सभी का मिलकर असर पड़ता है।
इसलिए खेती में एक ही तय मात्रा या तरीका हर खेत पर लागू करने के बजाय मिट्टी, मौसम, किस्म और पानी की उपलब्धता के हिसाब से फैसला करें।
भारत में चने की खेती कई प्रमुख कृषि क्षेत्रों में होती है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में चना महत्वपूर्ण फसल है। स्थानीय संस्करण में संबंधित राज्य की मिट्टी, मौसम, प्रचलित किस्म और कृषि विभाग की सिफारिश जोड़ना ज्यादा उपयोगी रहेगा।
चना की खेती से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
चना की बुआई कब करनी चाहिए?
सामान्य तौर पर चने की बुआई अक्टूबर-नवंबर में की जाती है। क्षेत्र और सिंचाई की स्थिति के अनुसार सही समय बदल सकता है। बहुत देर से बुआई करने पर फसल को दाना भरने के समय तापमान और नमी की समस्या हो सकती है।
चने के लिए कैसी मिट्टी अच्छी होती है?
अच्छी जल निकास वाली हल्की से मध्यम बनावट की मिट्टी चने के लिए उपयुक्त रहती है। खेत में पानी जमा नहीं होना चाहिए।
चने के बीज का उपचार क्यों करना चाहिए?
बीज उपचार से बीज और मिट्टी से फैलने वाले कुछ रोगों का खतरा कम करने में मदद मिलती है। चने में राइजोबियम कल्चर का उपयोग भी किया जाता है।
चने में सिंचाई कब करें?
सिंचाई की जरूरत मिट्टी, मौसम और फसल की स्थिति पर निर्भर करती है। शाखा बनने और फली विकास की अवस्था में पानी की जरूरत हो सकती है। जलभराव से बचना जरूरी है।
चने में प्रमुख कीट कौन-सा है?
फली छेदक चने का प्रमुख कीट है। फूल और फली बनने की अवस्था में खेत की नियमित निगरानी करना जरूरी है।
चने की खेती में खरपतवार कैसे नियंत्रित करें?
शुरुआती अवस्था में निराई-गुड़ाई या क्षेत्र और फसल की स्थिति के अनुसार अनुशंसित खरपतवार नियंत्रण उपाय अपनाएं। रसायन का प्रयोग केवल अनुशंसित मात्रा और सही फसल अवस्था में करें।
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