खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते युद्ध और राजनीतिक तनाव का असर अब भारत के कृषि व्यापार पर भी दिखाई देने लगा है। खासकर काबुली चना (सफेद छोला) के निर्यात को लेकर व्यापारियों और किसानों के बीच चिंता बढ़ रही है। भारत से बड़ी मात्रा में काबुली चना ईरान, तुर्किए और कई खाड़ी देशों में भेजा जाता है, लेकिन मौजूदा हालात में यह व्यापार धीमा पड़ने की आशंका है।
कृषि निर्यात से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि यदि खाड़ी देशों में युद्ध लंबे समय तक जारी रहता है, तो इसका सीधा असर भारतीय किसानों की आय पर भी पड़ सकता है। क्योंकि भारत में उगने वाला बड़ा साइज वाला काबुली चना खाड़ी देशों में काफी पसंद किया जाता है और वहां इसकी मांग सालभर बनी रहती है।
भारत दुनिया के प्रमुख काबुली चना उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में इसका उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है। इनमें से मध्य प्रदेश का 7–8 मिमी और 8–9 मिमी साइज का काबुली चना अंतरराष्ट्रीय बाजार में खास पहचान रखता है।
खाड़ी देशों में छोले से बनने वाले कई व्यंजन लोकप्रिय हैं। ईरान और अरब देशों में इसे अलग-अलग पारंपरिक डिश में इस्तेमाल किया जाता है। यही कारण है कि भारत का काबुली चना वहां लगातार निर्यात किया जाता रहा है।
भारत से यह निर्यात मुख्य रूप से कांडला, मुंद्रा और जेएनपीटी जैसे बंदरगाहों से होता है। नई फसल आने के बाद निर्यात गतिविधियाँ और तेज हो जाती हैं।
खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव और संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार की सप्लाई चेन को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। जहाजों की आवाजाही, भुगतान प्रणाली और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
व्यापार से जुड़े लोगों का कहना है कि अगर युद्ध लंबे समय तक चलता है तो:
माल की शिपमेंट में देरी हो सकती है
पेमेंट मिलने में समस्या आ सकती है
निर्यात ऑर्डर कम हो सकते हैं
इन परिस्थितियों में व्यापारियों को नुकसान होने के साथ-साथ किसानों की फसल की कीमत भी प्रभावित हो सकती है।
खाड़ी देशों में भारत से केवल काबुली चना ही नहीं, बल्कि कई अन्य कृषि उत्पाद भी भेजे जाते हैं। इनमें प्रमुख हैं:
बासमती चावल
केला
अंगूर
सोयामील
चाय
यदि युद्ध के कारण व्यापारिक गतिविधियां बाधित होती हैं, तो इन उत्पादों के निर्यात पर भी असर पड़ सकता है। खासतौर पर बासमती चावल का बड़ा बाजार भी ईरान और खाड़ी देशों में है।
भारत और ईरान के बीच कृषि व्यापार कई वर्षों से मजबूत रहा है। ईरान भारतीय बासमती चावल और काबुली चना का प्रमुख आयातक है।
आंकड़ों के अनुसार, भारत हर साल ईरान को बड़ी मात्रा में कृषि उत्पाद निर्यात करता है। इनमें चावल की हिस्सेदारी सबसे अधिक है, जबकि काबुली चना भी महत्वपूर्ण निर्यात वस्तुओं में शामिल है।
हालांकि मौजूदा परिस्थितियों में भुगतान और व्यापारिक लेन-देन को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। यही वजह है कि निर्यातकों के साथ-साथ किसान भी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।
यदि खाड़ी देशों में व्यापार धीमा पड़ता है तो इसका असर सीधे किसानों की फसल की कीमतों पर पड़ सकता है। काबुली चना के लिए निर्यात बाजार महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। निर्यात कम होने पर घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ सकती है, जिससे कीमतों में दबाव आ सकता है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत में छोले की घरेलू खपत भी अच्छी है, इसलिए पूरी तरह से बाजार खत्म होने की संभावना कम है। फिर भी निर्यात में गिरावट किसानों और व्यापारियों के लिए चुनौती बन सकती है।
फिलहाल कृषि व्यापार से जुड़े लोग उम्मीद कर रहे हैं कि खाड़ी क्षेत्र में तनाव जल्द कम होगा और व्यापार सामान्य हो जाएगा। क्योंकि भारत के लिए यह क्षेत्र कृषि उत्पादों का बड़ा बाजार है।
जब तक हालात स्थिर नहीं होते, तब तक काबुली चना और अन्य कृषि निर्यात पर नजर बनाए रखना जरूरी होगा। आने वाले महीनों में यह तय होगा कि खाड़ी क्षेत्र की स्थिति भारतीय किसानों और व्यापारियों को कितना प्रभावित करती है।
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