लहसुन की बंपर पैदावार के लिए बेसल डोज में क्या डालें, क्या नहीं? किसान भाई जानें सही खाद और मात्रा

लहसुन की बंपर पैदावार के लिए बेसल डोज में क्या डालें, क्या नहीं? किसान भाई जानें सही खाद और मात्रा
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Kisaan Helpline

Agriculture
Sep 03, 2026

सितंबर के महीने में, मध्य प्रदेश के मंदसौर, नीमच, रतलाम और राजस्थान के आसपास के लहसुन उत्पादक इलाकों में किसान भाई अगैती लहसुन की बुवाई की तैयारी शुरू कर चुके हैं। खेत की जुताई, मिट्टी की तैयारी और बीज की व्यवस्था के साथ-साथ इस समय सबसे जरूरी काम बेसल डोज की सही योजना बनाना है।

 

बुवाई से पहले किसान भाई यह जरूर देख लें कि खेत की मिट्टी में पहले से कौन-कौन से पोषक तत्व मौजूद हैं और किस पोषक तत्व की कमी है। यह सब पता चलेगा मिट्टी जाँच करवाने से उसके बाद अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट का इस्तेमाल करें और रासायनिक खाद जैसे फास्फोरस, पोटाश और सल्फर की मात्रा मिट्टी की जांच और स्थानीय कृषि सिफारिश के आधार पर ही तय करें। इससे शुरुआत में फसल को संतुलित पोषण मिलेगा और अनावश्यक खाद पर होने वाला खर्च भी कम किया जा सकेगा।

 

अगैती लहसुन की बुवाई में जल्दबाजी के चक्कर में किसान भाई कच्ची गोबर की खाद, जरूरत से ज्यादा डीएपी या पोटाश और बुवाई के समय भारी मात्रा में यूरिया डालने से बचें। खेत में खाद डालते समय यह भी ध्यान रखें कि खाद सीधे लहसुन की कलियों के संपर्क में न आए। अगर खेत में पिछली फसल के दौरान दीमक, जड़ खाने वाले कीड़े या किसी रोग की समस्या रही है, तो बुवाई से पहले ही उसके प्रबंधन की योजना बना लें।

 

खास बात यह है कि हर खेत की जरूरत अलग होती है, इसलिए पड़ोसी किसान के खेत में इस्तेमाल हुई खाद की मात्रा को देखकर अपने खेत में भी उतनी ही खाद डालना सही तरीका नहीं है। अगैती लहसुन में शुरुआत से ही सही खेत तैयारी, स्वस्थ बीज और संतुलित बेसल डोज पर ध्यान देना आगे की फसल के लिए काफी महत्वपूर्ण है।

 

लहसुन की बुवाई के समय बेसल डोज में अच्छी सड़ी गोबर की खाद के साथ मिट्टी की जांच के अनुसार फास्फोरस, पोटाश और सल्फर दें। कच्ची गोबर की खाद और बिना जांच के अधिक रासायनिक खाद डालने से बचें।

 

लहसुनकी खेती में अच्छी पैदावर का आधार बुवाई के समय सही खाद और सही मात्रा से ही तैयार होता है। अगर शुरुआत में मिट्टी को जरूरत के मुताबिक पोषण मिल जाए तो पौधों की जड़ें अच्छी तरह विकसित होती हैं और आगे चलकर कंद के आकार और फसल की बढ़वार पर भी अच्छा असर पड़ता है।

 

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ज्यादा खाद डालने से फसल भी ज्यादा होगी। लहसुन में संतुलित खाद, सही समय और मिट्टी की जरूरत के हिसाब से पोषण देना ज्यादा जरूरी है।

 

लहसुन में बेसल डोज क्या होती है?

 

बेसल डोज यानी बुवाई से पहले या बुवाई के समय खेत में दी जाने वाली खाद। इसका मकसद फसल को शुरुआती दिनों में जरूरी पोषण उपलब्ध कराना होता है।

 

लहसुनकी फसल में बेसलडोज तय करते समय खेत की मिट्टी, पिछली फसल, सिंचाई की व्यवस्था और मिट्टी जांच रिपोर्ट को ध्यान में रखना चाहिए। हर खेत में एक जैसी मात्रा डालना सही तरीका नहीं है।

 

सबसे पहले खेत में डालें अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद

 

लहसुन की बुवाई से पहले खेत की तैयारी करते समय अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट मिलाना फायदेमंद रहता है। इससे मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने और उसकी संरचना सुधारने में मदद मिलती है।

 

ध्यान रखें कि कच्ची या ताजी गोबर की खाद खेत में डालें। इससे कीट, रोग और खरपतवार जैसी परेशानियां बढ़ सकती हैं।

 

प्रति एकड़ लगभग 5–6 टन वर्मी कम्पोस्ट का इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है। हालांकि, खाद की गुणवत्ता और खेत की स्थिति के आधार पर इसकी मात्रा में आवश्यकता अनुसार बदलाव किया जा सकता है।

 

डीएपी डाल रहे हैं तो पोटाश का भी रखें ध्यान

 

बुवाई के समय कई किसान डीएपी का इस्तेमाल करते हैं। प्रति एकड़ 50 किलो डीएपी देने की सलाह दी जाती है। वहीं, पोटाश फसल की अच्छी बढ़वार और कंद के बेहतर विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

हालांकि, पोटाश की मात्रा मिट्टी की जांच और स्थानीय कृषि विशेषज्ञों की सिफारिश के आधार पर तय करना अधिक उचित रहता है, ताकि फसल को उसकी जरूरत के अनुसार पोषक तत्व मिल सकें।

डीएपी नहीं है तो एनपीके का विकल्प

अगर किसान डीएपी का इस्तेमाल नहीं करना चाहते हैं, तो 12:32:16 एनपीके खाद का विकल्प लिया जा सकता है।

ध्यान रखें कि डीएपी और एनपीके को एक साथ पूरी मात्रा में डालने की जरूरत नहीं होती। दोनों से मिलने वाले पोषक तत्वों को ध्यान में रखकर ही खाद की मात्रा तय करनी चाहिए।

 

लहसुन में सल्फर भी है जरूरी

 

लहसुन की फसल के लिए सल्फर भी एक महत्वपूर्ण पोषक तत्व है। यह कंद की गुणवत्ता के साथ-साथ लहसुन की खास गंध और स्वाद को बेहतर बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाता है। इसलिए, खेत की जरूरत के अनुसार सल्फर का इस्तेमाल फसल के लिए लाभदायक हो सकता है।

 

आम तौर पर प्रति एकड़ 8–10 किलो सल्फर देने का सुझाव दिया जाता है। हालांकि, इसकी सही मात्रा मिट्टी में मौजूद सल्फर की मात्रा और फसल की जरूरत के आधार पर तय करना बेहतर रहता है।

 

दीमक और जड़ के कीड़ों से बचाव के लिए सावधानी जरूरी

 

अगर खेत में पहले से दीमक या जड़ खाने वाले कीड़ों की समस्या रही है, तो बुवाई से पहले ही इनके प्रबंधन पर ध्यान देना जरूरी है।

 

फिप्रोनिल आधारित दानेदार उत्पाद का 4–5 किलो प्रति एकड़ इस्तेमाल करने का सुझाव दिया जाता है। हालांकि, किसी भी कीटनाशक का इस्तेमाल करने से पहले उसके लेबल पर दी गई जानकारी, संबंधित फसल में उसकी स्वीकृति और स्थानीय कृषि विभाग की सलाह जरूर जांच लें। कीटनाशक की मात्रा भी इन्हीं निर्देशों के अनुसार तय करें।


बेसल डोज में यूरिया डालने से बचें

 

लहसुनकी बुवाई के समय भारी मात्रा में यूरिया डालना सही तरीका नहीं है। किसान अक्सर यह सोचकर ज्यादा यूरिया डाल देते हैं कि इससे पौधे तेजी से बढ़ेंगे, लेकिन जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन फसल के लिए नुकसानदायक हो सकती है।

 

लहसुन में नाइट्रोजन की जरूरत पूरी फसल अवधि में रहती है, इसलिए इसकी मात्रा को फसल की अवस्था के अनुसार बांटकर देना बेहतर रहता है। ICAR-DOGR के एक अध्ययन में भी पोषक तत्वों को फसल की जरूरत के अनुसार अलग-अलग समय पर देने से बेहतर बाजार योग्य और कुल कंद उत्पादन दर्ज किया गया।

 

लहसुन की खेती में ये गलतियां बिल्कुल करें

 

बेसल डोज डालते समय इन बातों का ध्यान रखें:

 

·        बिना मिट्टी जांच के जरूरत से ज्यादा खाद डालें।

·        ताजी या अधपकी गोबर की खाद इस्तेमाल करें।

·        बुवाई के समय यूरिया की भारी मात्रा डालें।

·        डीएपी, एनपीके और दूसरी खादों को बिना हिसाब एक साथ डालें।

·        खाद की मात्रा सिर्फ दूसरे किसान को देखकर तय करें।

·        खाद को सीधे लहसुन की कलियों के संपर्क में रखने से बचें।

·        कीटनाशक या सूक्ष्म पोषक तत्व जरूरत होने पर ही इस्तेमाल करें।

 

किसान के लिए सबसे जरूरी बात

 

लहसुन की खेती में ज्यादा खाद नहीं, सही खाद और सही मात्रा फसल के लिए ज्यादा जरूरी है। बुवाई से पहले मिट्टी की जांच करा लें और उसी के आधार पर नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और सल्फर की जरूरत तय करें।

 

अगर खेत में जैविक खाद अच्छी मात्रा में है और मिट्टी में पहले से कोई पोषक तत्व पर्याप्त है, तो उस खाद को दोबारा जरूरत से ज्यादा डालने का कोई फायदा नहीं। खर्च बचाने और फसल को संतुलित पोषण देने का सबसे अच्छा तरीका है, मिट्टी की जांच और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के आधार पर खाद की मात्रा तय करना।

 

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

 

लहसुन में बेसल डोज कब डालें?

खेत की अंतिम तैयारी और लहसुन की बुवाई के समय बेसल डोज दी जाती है।

 

क्या लहसुन की बुवाई के समय यूरिया डालना चाहिए?

यूरिया की भारी मात्रा बुवाई के समय नहीं डालनी चाहिए। नाइट्रोजन की जरूरत के अनुसार इसकी मात्रा और समय तय करना बेहतर है।

 

क्या लहसुन में डीएपी और एनपीके दोनों डाल सकते हैं?

दोनों को बिना हिसाब मिलाकर डालना जरूरी नहीं है। खाद का चुनाव मिट्टी जांच और कुल पोषक तत्वों की जरूरत देखकर करें।

 

लहसुन में सल्फर क्यों दिया जाता है?

लहसुन की फसल में सल्फर महत्वपूर्ण पोषक तत्व है और इसकी कमी होने पर फसल की गुणवत्ता बढ़वार प्रभावित हो सकती है।

 

क्या हर खेत में एक जैसी बेसल डोज सही रहती है?

नहीं। मिट्टी का प्रकार, पोषक तत्वों की स्थिति, पिछली फसल और स्थानीय सिफारिश के अनुसार मात्रा बदल सकती है।

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