फार्म से घर तक पशु दवाओं का खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव

फार्म से घर तक पशु दवाओं का खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव
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Kisaan Helpline

Agriculture
Sep 01, 2026

फार्म से घर तक: पशु दवाओं का खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव

डॉ. सत्यम भंडारी, डॉ. गायत्री देवांगन डॉ. स्वाति कोली, डॉ. नीतू राजपूत, डॉ. योगिता पांडेय एवं डॉ. अखिलेश पाण्डेय

पशु चिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय, महु, इंदौर (.प्र.)

 

1.     परिचय

 

जो मांस अथवा दूध हमारी थाली में आता है, उन दोनों की सुरक्षा पर पशु-चिकित्सीय दवाओं का एक महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर अनदेखा प्रभाव होता है। पशु-चिकित्सीय दवाएँ जिनका उपयोग पोषण संबंधी कमियों को दूर करने, रोगों की रोकथाम और उपचार करने, तथा पशुओं के शारीरिक, जैव-रासायनिक और व्यवहारिक कार्यों को बहाल, नियंत्रित या परिवर्तित करने के लिए किया जाता है। ये दवाएँ पशुओं के स्वास्थ्य और कल्याण को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, चाहे वह पशुपालन, पालतू पशुओं की देखभाल हो या वन्यजीव प्रबंधन। जैसे कि एंटीबायोटिक दवाएं दुनिया भर में पशुपालन और मुर्गी पालन में इस्तेमाल होती हैं। लेकिन इन दवाओं के कुछ अंश (अवशेष) जानवरों से मिलने वाले खाद्य पदार्थों में रह सकते हैं, जो मनुष्यों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं। औषधीय रूप से सक्रिय पदार्थों के बचे हुए अंश को दवा अवशेष कहा जाता है पशुओं के ऊतकों और खाद्य उत्पादों में बने रह सकते हैं तथा पर्यावरण में भी प्रवेश कर सकते हैं। ये बचे हुए दवा के अंश (अवशेष) मनुष्यों में कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा करते हैं। जैसे कि शरीर में एंटीबायोटिक दवाओं का असर कम होना (प्रतिरोध), कैंसर का खतरा बढ़ना, बच्चों में जन्म से जुड़ी समस्याएँ होना, एलर्जी जैसी प्रतिक्रियाएँ होना, और पेट के अच्छे बैक्टीरिया के संतुलन का बिगड़ना। पशु-उत्पादों में दवा अवशेष विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न हो सकते हैं, जिनमें चारे या पानी का संदूषण, दवाओं का अनुमोदित निर्देशों से हटकर उपयोग (एक्स्ट्रा-लेबल उपयोग), तथा निर्धारित प्रतीक्षा अवधि (withdrawal period) का पालन करना शामिल है। पशु-उत्पन्न खाद्य पदार्थों जैसे मछली, झींगा, दूध और मांस का लंबे समय तक सेवन, जिनमें पशु-चिकित्सीय दवाओं के अवशेष मौजूद हों, मनुष्यों में अवांछनीय स्वास्थ्य प्रभाव उत्पन्न कर सकता है। पशु तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य दोनों दृष्टिकोणों से एंटीबायोटिक्स का जिम्मेदार उपयोग अत्यंत आवश्यक है। इसी कारण, भारत में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए व्यापक निगरानी और नियामक कार्यक्रम स्थापित किए गए हैं। पशु-चिकित्सीय दवा अवशेषों की जांच के लिए प्रयुक्त विश्लेषणात्मक विधियाँ इन पदार्थों की उपस्थिति का पता लगाने, उनका मात्रात्मक आकलन करने तथा उनकी पुष्टि करने के लिए विकसित की गई हैं।

 

2. पशु स्वास्थ्य में पशु चिकित्सा दवाओं की भूमिका

 

पशु चिकित्सा का मुख्य उद्देश्य पशुओं में होने वाली बीमारियों और विकारों की रोकथाम, पहचान और उपचार करना है। यह मानव स्वास्थ्य पर पशुओं से जुड़ी समस्याओं के प्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पशुओं के स्वास्थ्य को बनाए रखकर यह दूध, मांस और अंडों जैसे सुरक्षित पशु-उत्पादों के उत्पादन में सहायता करती है और साथ ही भोजन के माध्यम से फैलने वाले हानिकारक रोगजनकों को मनुष्यों तक पहुंचने से रोकती है। इसके अलावा, पशु चिकित्सा उन बीमारियों की निगरानी और नियंत्रण में भी महत्वपूर्ण है जो पशुओं से मनुष्यों में फैल सकती हैं (जूनोटिक रोग) यह खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने और चिकित्सा अनुसंधान के माध्यम से मानव स्वास्थ्य में सुधार करने में भी योगदान देती है। इसके साथ ही, यह पशुओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखकर खाद्य आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने में मदद करती है और पालतू जानवरों के जीवन की गुणवत्ता और आयु को भी बढ़ाती है।

 

3. मनुष्यों में दवा अवशेषों (रेज़िड्यू) के स्वास्थ्य प्रभाव

 

अवशेष (रेज़िड्यू) का अर्थ है दवा या कीटनाशक के उपयोग के बाद उनके बचे हुए अंश, जिन्हें खाद्य उत्पादन करने वाले पशुओं या पौधों पर इस्तेमाल किया जाता है। जो उपभोक्ताओं के लिए स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकते हैं। ये अवशेष आमतौर पर दवाओं के गलत उपयोग और निर्धारितविथड्रॉअल पीरियड” (दवा देने के बाद का आवश्यक अंतराल) का पालन करने के कारण होते हैं। पशु-उत्पत्ति वाले खाद्य पदार्थों में दवा अवशेषों से होने वाले जोखिम कई रूपों में दिखाई दे सकते हैं। एंटीमाइक्रोबियल अवशेषों के तात्कालिक प्रभावों में एलर्जी और विषाक्तता शामिल हैं, जो खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मनुष्यों तक पहुंचते हैं। दीर्घकालिक प्रभावों में आंतों के सामान्य सूक्ष्मजीवों में असंतुलन, कैंसर और जन्म दोष जैसी समस्याएं शामिल हो सकती हैं। इसके अलावा, दवा अवशेष एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी सूक्ष्मजीवों के विकास में भी योगदान देते हैं और अक्सर दवाओं के गलत उपयोग से जुड़े होते हैं। पशु चिकित्सा दवाएं विश्वभर में उपयोग की जाती हैं और इनमें विभिन्न रासायनिक वर्ग शामिल होते हैं, जैसे टीके (वैक्सीन), एंटीबायोटिक्स दवाएं, परजीवीरोधी दवाएं और बीटा-एगोनिस्ट। इनमें से एंटीबायोटिक्स दवाएं सबसे महत्वपूर्ण और सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली श्रेणी हैं।

 

4. पशु-चिकित्सा में एंटीबायोटिक्स का उपयोग

 

एंटीबायोटिक दवाएँ ऐसी दवाएँ होती हैं जिनका उपयोग बैक्टीरिया और कुछ अन्य सूक्ष्मजीवों से होने वाले संक्रमण के इलाज के लिए किया जाता है। पशु चिकित्सा में इनका उपयोग काफी ज्यादा होता है, ताकि संक्रामक बीमारियों को नियंत्रित किया जा सके, पशुओं को स्वस्थ रखा जा सके और उनकी उत्पादन क्षमता (जैसे दूध, अंडे आदि) बढ़ाई जा सके। पहलेएंटीबायोटिकशब्द का मतलब उन पदार्थों से था जो एक सूक्ष्मजीव द्वारा बनते हैं और दूसरे सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को रोकते हैं या उन्हें नष्ट कर देते हैं। लेकिन अब इस परिभाषा का दायरा बढ़ गया है। इसमें प्राकृतिक दवाओं के साथ-साथ प्रयोगशाला में आंशिक या पूरी तरह से बनाई गई दवाएँ भी शामिल हैं, जो सूक्ष्मजीवों को खत्म करने या उनकी वृद्धि रोकने का काम करती हैं।

 

5. खाद्य श्रृंखला पर एंटीबायोटिक्स के उपयोग का प्रभाव

 

एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग मुख्य रूप से पशुओं में बैक्टीरिया से होने वाली बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है। लेकिन कई बार इनका उपयोग बीमारियों से बचाव के लिए पहले से ही (रोकथाम के तौर पर) भी किया जाता है। कुछ मामलों में, इन्हें कम मात्रा में पशुओं की वृद्धि बढ़ाने के लिए भी दिया जाता था, जिससे चारा अच्छे से उपयोग होता है और किसानों को ज्यादा लाभ मिलता है। हालांकि, लोगों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए 2006 के बाद कई जगहों पर इस तरह वृद्धि बढ़ाने के लिए एंटीबायोटिक के उपयोग पर रोक या प्रतिबंध लगा दिया गया है। पशुपालन में इस्तेमाल होने वाली आम एंटीबायोटिक दवाओं में टेट्रासाइक्लिन, क्विनोलोन, मैक्रोलाइड, सल्फोनामाइड और पेनिसिलिन शामिल हैं। इनका उपयोग इलाज और बचावदोनों के लिए किया जाता है। खाद्य पदार्थों में हानिकारक दवा अवशेषों के जोखिम को कम करने के लिए, भारत में नियामक प्राधिकरणों ने अधिकतम अवशेष सीमा (MRLs) निर्धारित की है। देश में उत्पादित या आयातित सभी खाद्य उत्पादों को इन मानकों का पालन करना अनिवार्य है। नियामक निगरानी के अतिरिक्त, हितधारकों जैसे किसान, खाद्य उत्पादक और खुदरा विक्रेता द्वारा स्वयं-निगरानी भी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और उपभोक्ता स्वास्थ्य की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

 

6. खाद्य पदार्थों में पशु चिकित्सा दवाओं के अवशेष के कारण

 

कई पशुपालक अपने पशुओं का इलाज स्वयं करते हैं। हालांकि वे पशु चिकित्सकों द्वारा उपयोग की जाने वाली दवाओं का ही प्रयोग करते हैं, लेकिन उन्हें सही उपयोग, उचित मात्रा (डोज़) और आवश्यकविथड्रॉअल पीरियड” (दवा देने के बाद का अंतराल) की पर्याप्त जानकारी नहीं होती। इस तरह एंटी-इन्फेक्टिव दवाओं का गलत और अनियंत्रित उपयोग पशु-जनित उत्पादों में दवा के अवशेष बनने का कारण बनता है, खासकर जब निर्धारित विथड्रॉअल पीरियड का पालन नहीं किया जाता। एक्स्ट्रा-लेबल ड्रग यूज़ (ELDU) का मतलब है किसी स्वीकृत दवा का ऐसे तरीके से उपयोग करना जो उसके लेबल पर दिए गए निर्देशों के अनुसार हो। यह तब होता है जब मनुष्यों के लिए स्वीकृत दवा को पशुओं में दिया जाता है, या किसी एक पशु प्रजाति के लिए बनी दवा को दूसरी प्रजाति में इस्तेमाल किया जाता है, या फिर किसी ऐसी बीमारी के इलाज में दवा का उपयोग किया जाता है जिसके लिए वह मूल रूप से स्वीकृत नहीं थी। इस प्रकार का अनुचित या बिना निगरानी के उपयोग पशु उत्पादों में दवा अवशेषों के जोखिम को बढ़ाता है और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। विथड्रॉअल समय का सही तरीके से पालन करना भी एक महत्वपूर्ण कारण है, जिससे पशु उत्पादों में दवा के अवशेष पाए जाते हैं। विथड्रॉअल समय वह अवधि है, जिसमें पशु के शरीर में दवा की मात्रा घटकर सुरक्षित स्तर तक पहुंच जाती है। यह अवधि दवा के प्रकार, उसकी मात्रा और देने के तरीके (जैसे इंजेक्शन या मौखिक) पर निर्भर करती है, जो कुछ घंटों से लेकर कई दिनों या हफ्तों तक हो सकती है। सरल शब्दों में, यह वह समय होता है जो किसी पशु को आखिरी बार दवा देने और उसके बाद उसे सुरक्षित रूप से वध करने या उसके उत्पाद (दूध, मांस आदि) को मानव उपयोग के लिए लेने के बीच होना चाहिए। यदि इस अवधि का पालन नहीं किया जाता, तो खाद्य पदार्थों में हानिकारक अवशेष रह सकते हैं, जो मनुष्यों के स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकते हैं।

 

7. पशुओं में एंटीबायोटिक उपयोग को कम करने की रणनीतियाँ

 

सबसे प्रभावी रणनीतियाँ झुंड (फ्लॉक) और पशुधन (हर्ड) प्रबंधन पर केंद्रित होती हैं, जिससे रोगों के प्रवेश और प्रसार को सीमित किया जा सके। जैव-सुरक्षा (बायोसिक्योरिटी), स्वच्छता और पशुपालन प्रथाओं में सुधार करने से एंटीबायोटिक्स पर निर्भरता को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

1.     पशुओं में इस्तेमाल के लिए एक नई तरह की दवाओं पर काम हो रहा है, जिन्हें बैक्टीरियोफेज (फेज) कहा जाता है। ये ऐसे वायरस होते हैं जो केवल बैक्टीरिया को ही नुकसान पहुँचाते हैं। हाल के शोधों में एंटीबायोटिक दवाओं के असर कम होने (प्रतिरोध) की समस्या से निपटने के लिए इनका उपयोग एक नए तरीके के रूप में किया जा रहा है। इस तकनीक में वैज्ञानिक खास तरह के फेज तैयार करते हैं, जो बैक्टीरिया के अंदर CRISPR-Cas नाम की प्रणाली पहुँचाते हैं। यह प्रणाली सीधे बैक्टीरिया को मारने की बजाय, उनके अंदर मौजूद एंटीबायोटिक प्रतिरोध वाले जीन को निशाना बनाकर उन्हें निष्क्रिय कर देती है। इससे बैक्टीरिया फिर से एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति संवेदनशील हो सकते हैं।

2.     टीकाकरण भी इस पूरे प्रयास में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे टीके जो जानवरों को शुरू में ही बैक्टीरिया या वायरस से होने वाली बीमारियों से बचाते हैं, वे खास तौर पर जरूरी हैं, क्योंकि ये आगे होने वाली दूसरी गंभीर बीमारियों को भी रोक सकते हैं। इससे पशुओं का स्वास्थ्य बेहतर रहता है और एंटीबायोटिक दवाओं की जरूरत भी कम पड़ती है।उदाहरण के लिए, डेयरी उद्योग में थनेला रोग (मास्टाइटिस) एक आम समस्या है, जिसके कारण एंटीबायोटिक का सबसे ज्यादा उपयोग होता है। यह रोग स्टैफिलोकोकस  (Staphylococcus), स्ट्रेप्टोकोकस (Streptococcus) और . कोलाई (Escherichia coli)  जैसे बैक्टीरिया से होता है। अगर इन बैक्टीरिया के खिलाफ बेहतर और प्रभावी टीके विकसित किए जाएँ, तो इस बीमारी को काफी हद तक रोका जा सकता है।

3.     खाद्य उत्पादन करने वाले पशुओं में बीमारियाँ कम करने और एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग घटाने के लिए सही प्रबंधन और बचाव बहुत जरूरी है। इसके लिए पशुओं के रहने की जगह को साफ-सुथरा रखना, एक जगह पर जरूरत से ज्यादा पशु रखना, अच्छा और पोषक आहार देना, और ऐसा वातावरण बनाना जरूरी है जिससे पशुओं को कम तनाव हो। साथ ही, बीमारियों को खत्म करने के लिए जरूरी कार्यक्रम भी अपनाने चाहिए।

4.     इसके अलावा, सही पोषण देकर पशुओं की रोग-प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) बढ़ाई जा सकती है। और जब पशुओं को तनाव होता है, जैसे परिवहन के समय या चराई की जगह बदलने पर, तब उन्हें खास ध्यान और उचित आहार देना बहुत फायदेमंद होता है। ऐसे समय पर खास देखभाल और संतुलित आहार देने से बीमारियों का खतरा कम किया जा सकता है। इसके साथ ही, ऐसे पशुओं का चयन करके प्रजनन करना जो प्राकृतिक रूप से बीमारियों के प्रति ज्यादा प्रतिरोधी होते हैं, लंबे समय में संक्रमण को कम करने में बहुत मदद करता है।

 

निष्कर्ष

पशु-चिकित्सीय दवाएँ पशुओं के स्वास्थ्य, कल्याण और सुरक्षित पशु-उत्पादों के उत्पादन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं, किंतु इनका अनुचित अथवा अनियंत्रित उपयोग खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। यदि दवाओं का उपयोग निर्धारित मात्रा, सही उद्देश्य और आवश्यक प्रतीक्षा अवधि (Withdrawal Period) का पालन किए बिना किया जाए, तो दूध, मांस, अंडे तथा अन्य पशु-उत्पादों में दवा अवशेष रह सकते हैं। ऐसे अवशेष मनुष्यों में एलर्जी, एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध (AMR), आंतों के लाभकारी सूक्ष्मजीवों के असंतुलन, कैंसर तथा जन्मजात विकृतियों जैसी समस्याओं का कारण बन सकते हैं। इन जोखिमों को कम करने के लिए पशु-चिकित्सक की सलाह के अनुसार दवाओं का विवेकपूर्ण उपयोग, निर्धारित प्रतीक्षा अवधि का पालन, प्रभावी जैव-सुरक्षा, स्वच्छ पशुपालन, संतुलित पोषण, नियमित टीकाकरण तथा सरकारी निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण अत्यंत आवश्यक हैं। साथ ही, पशुपालकों में जागरूकता बढ़ाना और दवा उपयोग के संबंध में उचित प्रशिक्षण देना भी समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

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