श्वेत क्रांति के सच्चे हीरो: पशुपालकों का संघर्ष और संतुलित पोषण का विज्ञान

श्वेत क्रांति के सच्चे हीरो: पशुपालकों का संघर्ष और संतुलित पोषण का विज्ञान
श्वेत क्रांति के सच्चे हीरो: पशुपालकों का संघर्ष और संतुलित पोषण का विज्ञान

Vaibhav shrivastava

19-01-2026

आज जब भारत के डेयरी सेक्टर की चर्चा पूरे विश्व में होती है, तो हर भारतीय को गर्व महसूस होता है।

वर्ष 2023–24 में 239.30 मिलियन टन दूध उत्पादन कर भारत ने यह साबित कर दिया है कि दूध उत्पादन के क्षेत्र में उसका कोई मुकाबला नहीं है। वहीं 2024–25 के लिए 248 मिलियन टन का अनुमानित आंकड़ा हमारी निरंतर प्रगति और मजबूत होती डेयरी अर्थव्यवस्था का प्रमाण है।


लेकिन इन चमकदार आंकड़ों के पीछे एक सच्चाई छिपी है, जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। वह सच्चाई है- हिंदुस्तान का किसान और पशुपालक।


यह लेख उन किसानों की कड़ी मेहनत को एक सम्मानस्वरूप समर्पण है, जो कठिन परिस्थितियों में अपने पशुओं की सेवा करते हैं, और उन मूक जीवों के प्रति सहानुभूति की अभिव्यक्ति है जो पूरे देश का पोषण करते हैं।


पशु और मनुष्य का रिश्ता

भारत में पशुपालन कभी भी सिर्फ़ कमाई का साधन नहीं रहा।

आंगन में बंधी गाय या भैंस परिवार का हिस्सा मानी जाती है।

मुर्रा भैंस, जिसे “काला सोना” कहा जाता है, या साहीवाल, गिर और थारपारकर जैसी देसी नस्लें केवल जानवर नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।


लेकिन आज एक गंभीर सवाल उठता है —

क्या हम अपने पशुओं के साथ न्याय कर पा रहे हैं?

अक्सर पशु को एक मशीन समझ लिया जाता है, जिससे केवल दूध निकालना है।

हम भूल जाते हैं कि दूध, अच्छे स्वास्थ्य और सही देखभाल का परिणाम है।

जब पशु अंदर से स्वस्थ और संतुष्ट होगा, तभी वह भरपूर दूध देगा।

आज पशुपालन में दिखने वाला नुकसान असल में कुप्रबंधन और पोषण की कमी का नतीजा है।


पोषण और संतुलित आहार का महत्व

ग्रामीण भारत में आज भी यह धारणा प्रचलित है कि अगर जानवर का पेट भरा है, तो सब ठीक है।

सूखा चारा या पुआल डाल दिया जाता है, जिससे जानवर पेट तो भर लेता है, लेकिन शरीर को ज़रूरी पोषण नहीं मिलता।

जैसे इंसान केवल चावल खाकर स्वस्थ नहीं रह सकता, वैसे ही दूध देने वाला पशु भी सिर्फ पेट भरने से स्वस्थ नहीं रह सकता।

एक अधिक दूध देने वाला पशु एक एथलीट की तरह होता है, जिसे सही मात्रा में ऊर्जा, प्रोटीन, मिनरल्स और विटामिन्स की ज़रूरत होती है।


संतुलित आहार के मुख्य घटक


1. ऊर्जा (Energy)

ऊर्जा जीवन की बुनियाद है।

मक्का, बाजरा, गेहूं और चोकर जैसे अनाज पशु को ऊर्जा देते हैं।

ऊर्जा की कमी से पशु कमजोर हो जाता है और दूध उत्पादन घटने लगता है।

2. प्रोटीन (Protein)

प्रोटीन दूध के ठोस घटकों का आधार है।

सरसों, बिनौला और सोयाबीन की खली पशु की मांसपेशियों और दूध उत्पादन के लिए बेहद जरूरी होती है।

3. मिनरल मिक्सचर

अक्सर किसान इसे गैर-ज़रूरी खर्च मानते हैं, जबकि यही

कैल्शियम, फॉस्फोरस और जिंक पशु के प्रजनन तंत्र को स्वस्थ रखते हैं।

बांझपन जैसी समस्याओं की जड़ अक्सर पोषण की कमी होती है।

4. विटामिन

विटामिन पशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करते हैं।

इनकी कमी से मैस्टाइटिस जैसी गंभीर बीमारियां होती हैं।


आहार और मुनाफे का वैज्ञानिक गणित

वैज्ञानिक दृष्टि से आहार को दो भागों में बांटना चाहिए:

शरीर के रखरखाव के लिए आहार

– पशु के वजन के अनुसार हरा और सूखा चारा

दूध उत्पादन के लिए कंसंट्रेट फीड

– गाय: हर 2.5 लीटर दूध पर 1 किलो कंसंट्रेट

– भैंस: हर 2 लीटर दूध पर 1 किलो कंसंट्रेट

इस गणित को नज़रअंदाज़ करने से पशु बीमार पड़ सकता है और भारी आर्थिक नुकसान हो सकता है।


असंतुलित आहार के दुष्परिणाम

कैल्शियम की कमी से मिल्क फीवर

कीटोसिस जैसी मेटाबॉलिक बीमारियां

कमजोर इम्युनिटी

समय पर गर्भधारण न होना

दूध उत्पादन में भारी गिरावट


गर्भवती और सूखे पशुओं की देखभाल

सूखा समय किसान अक्सर आराम का समय समझ लेते हैं, जबकि यही भविष्य की कमाई की नींव होता है।

गर्भावस्था के अंतिम महीनों में दिया गया अतिरिक्त पोषण

अगले दुग्धकाल में अधिक दूध की गारंटी देता है।

यह खर्च नहीं, बल्कि एक स्मार्ट निवेश है।


निष्कर्ष

पशुपालन सिर्फ दूध बेचने का काम नहीं है, यह जीवन और विश्वास का एक चक्र है।

अगर हम अपने पशुओं को सही पोषण, देखभाल और सम्मान देंगे, तो वे हमें समृद्धि देंगे।


मुख्य सुझाव

पशुओं को हमेशा पर्याप्त और साफ पानी दें

नमक और मिनरल मिक्सचर को आहार का अनिवार्य हिस्सा बनाएं

पेट नहीं, पोषण भरें

साइंस और दया — दोनों को साथ लेकर चलें

स्वस्थ पशु = खुशहाल किसान = मजबूत भारत


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