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Soybean (सोयाबीन)

Basic Info

सोयाबीन-[वैज्ञानिक नाम="ग्लाईसीन मैक्स"] सोयाबीन फसल है। सोयाबीन भारतवर्ष में महत्वपूर्ण फसल है यह दलहन के बजाय तिलहन की फसल मानी जाती है। सोयाबीन का उत्पादन 1985 से लगातार बढ़ता जा रहा है और सोयाबीन के तेल की खपत मूँगफली एवं सरसों के तेल के पश्चात सबसे अधिक होने लगा है सोयाबीन एक महत्वपूर्ण खाद्य स्रोत है। इसके मुख्य घटक प्रोटीन, कार्बोहाइडेंट और वसा होते है। सोयाबीन में 38-40 प्रतिशत प्रोटीन, 22 प्रतिशत तेल, 21 प्रतिशत कार्बोहाइडेंट, 12 प्रतिशत नमी तथा 5 प्रतिशत भस्म होती है। विश्व का 60% सोयाबीन अमेरिका में पैदा होता है। भारत मे सबसे अधिक सोयाबीन का उत्पादन मध्यप्रदेश करता है। मध्यप्रदेश में इंदौर में सोयाबीन रिसर्च सेंटर है।

Seed Specification

उपयुक्त किस्मों का चयन :- राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान केंद्र एवं विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा अलग क्षेत्रों के लिए वहाँ की कृषि जलवायु एवं मिट्टी के लिए अलग किस्मों का विकास किया गया है एवं किस्में समर्थित की गई हैं। उसी के अनुसार सोयाबीन किस्में बोई जानी चाहिए। इन किस्मों का थोड़ा बीज लाकर अपने यहाँ ही इसे बढ़ाकर उपयोग में लाया जा सकता है।

बुवाई का समय :-
जून के अन्तिम सप्‍ताह में जुलाई के प्रथम सप्‍ताह तक का समय सबसे उपयुक्‍त है, बोने के समय अच्‍छे अंकुरण हेतु भूमि में 10 सेमी गहराई तक उपयुक्‍त नमी होना चाहिए। जुलाई के प्रथम सप्‍ताह के पश्‍चात बोनी की बीज दर 5-10 प्रतिशत बढ़ा देनी चाहिए।

बीज की मात्रा :-
छोटे दाने वाली किस्‍में – 70 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर
मध्‍यम दाने वाली किस्‍में – 80 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर
बडे़ दाने वाली किस्‍में – 100 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर।

बीज उपचार :-
बुवाई से पहले सोयाबीन के बीजो को उपचारित करे। कार्बेन्डीजिम या थिरम 2 ग्राम / किग्रा बीज का 24hrs बीज के साथ उपचार करें या ट्राइकोडर्मा के टैल्क सूत्रीकरण के साथ  4 ग्राम / किग्रा बीज (या) स्यूडोमोनस फ्लोरेसेंस 10 ग्राम / किग्रा बीज का प्रयोग करें।

Land Preparation & Soil Health

मिट्टी परिक्षण :-
संतुलित उर्वरक व मृदा स्वास्थ्य हेतु मिट्टी में मुख्य तत्व- नत्रजन, फॉस्फोरस, पोटाश, द्वितीयक पोषक तत्व जैसे सल्फर, कैल्शियम, मैग्नीशियम एवं सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे जस्ता, तांबा, लोहा, मैंगनीज, मोलिब्डेनम, बोरॉन साथ ही पी.एच., ई.सी. एवं कार्बनिक द्रव्य का परीक्षण करायें। 

भूमि :-
सोयाबीन की खेती अधिक हल्‍की रेतीली व हल्‍की भूमि को छोड्कर सभी प्रकार की भूमि में सफलतापूर्वक की जा सकती है, परन्‍तु पानी के निकास वाली चिकनी दोमट भूमि सोयाबीन के लिए अधिक उपयुक्‍त होती है। जहां भी खेत में पानी रूकता हो वहां सोयाबीन ना लें।

जलवायु :-
सोयाबीन फसल के लिए शुष्क गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है, इसके बीजों का जमाव 25 डिग्री सेल्सियस पर 4 दिन में हो जाता है, जबकि इससे कम तापमान होने पर बीजों के जमाव में 8 से 10 दिन लगता है । अत: सोयाबीन खेती के लिए 60-65 सेमी. वर्षा वाले स्थान उपयुक्‍त माने गये हैं।

खेत की जुताई :-
वर्षा प्रारम्‍भ होने पर 2 या 3 बार बखर तथा पाटा चलाकर खेत को तैयार कर लेना चाहिए। इससे हानि पहुंचाने वाले कीटों की सभी अवस्‍थाएं नष्‍ट होगीं। जहां तक संभव हो आखरी बखरनी एवं पाटा समय से करें जिससे अंकुरित खरपतवार नष्‍ट हो सके।

Crop Spray & fertilizer Specification

उर्वरक :-
सोयाबीन की बुवाई से पूर्व खेत तैयार करते समय अच्‍छी सड़ी हुई गोबर की खाद (कम्‍पोस्‍ट) 5 टन प्रति हेक्टेयर अंतिम बखरनी के समय खेत में अच्‍छी तरह मिला देवें तथा बोते समय 20 किलो नाइट्रोजन, 60 किलो फॉस्फोरस, 20 किलो पोटाश एवं 20 किलो सल्फर प्रति हेक्टेयर देवें। यह मात्रा मिट्टी परीक्षण के आधार पर घटाई बढ़ाई जा सकती है। गहरी काली मिट्टी में जिंक सल्‍फेट 50 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर एवं उथली मिट्टी में 25 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 5 से 6 फसलें लेने के बाद उपयोग करना चाहिए।

हानिकारक कीट और रोकथाम :-
सफेद मक्खी - सफेद मक्खी की रोकथाम के लिए, थाइमैथोक्सम 40 ग्राम या ट्राइज़ोफोस 300 मि.ली की स्प्रे प्रति एकड़ में करें। यदि आवश्यकता पड़े तो पहली स्प्रे के 10 दिनों के बाद दूसरी स्प्रे करें।

तंबाकू सुंडी - यदि इस कीट का हमला दिखाई दे तो एसीफेट 57 एस पी 800 ग्राम या क्लोरपाइरीफॉस 20 ई सी को 1.5 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें। यदि जरूरत पड़े तो पहली स्प्रे के 10 दिनों के बाद दूसरी स्प्रे करें।

बालों वाली सुंडी - बालों वाली सुंडी का हमला कम होने पर इसे हाथों से उठाकर या केरोसीन में डालकर खत्म कर दें । इसका हमला ज्यादा हो तो, क्विनलफॉस 300 मि.ली. या डाइक्लोरवास 200 मि.ली की प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

पीला चितकबरा रोग - यह सफेद मक्खी के कारण फैलता है। इससे अनियमित पीले, हरे धब्बे पत्तों पर नज़र आते हैं। प्रभावित पौधों पर फलियां विकसित नहीं होती। इसकी रोकथाम के लिए पीला चितकबरा रोग की प्रतिरोधी किस्मों का प्रयोग करें। सफेद मक्खी को रोकथाम के लिए, थाइमैथोक्सम 40 ग्राम या ट्राइज़ोफोस 400 मि.ली की स्प्रे प्रति एकड़ में करें। यदि आवश्यकता पड़े तो पहली स्प्रे के 10 दिनों के बाद दूसरी स्प्रे करें।

फफूंद नियंत्रण :-
सोयाबीन के पत्‍तों पर कई तरह के धब्‍बे वाले फफूंद जनित रोगों के नियंत्रण के लिए कार्बेन्‍डाजिम 50 डबलू पी या थायोफेनेट मिथाइल 70 डब्‍लू पी 0.05 से 0.1 प्रतिशत से 1 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी का छिड़काव करना चाहिए। पहला छिड़काव 30-35 दिन की अवस्‍था पर तथा दूसरा छिड़काव 40–45 दिन की अवस्‍था पर करना चाहिए।

बैक्‍टीरियल पश्‍चयूल नामक रोग को नियंत्रित - स्‍ट्रेप्‍टोसाइक्‍लीन या कासूगामाइसिन की 200 पी.पी.एम. 200 मि.ग्रा; दवा प्रति लीटर पानी के घोल और कापर आक्‍सीक्‍लोराइड 0.2 (2 ग्राम प्रति लीटर) पानी के घोल के मिश्रण का छिड़काव करना चाहिए।

विषाणु जनित पीला मोजेक वायरस रोग व वड व्‍लाइट रोग प्राय: - एफिड, सफेद मक्‍खी, थ्रिप्‍स आदि द्वारा फैलते हैं अत: केवल रोग रहित स्‍वस्‍थ बीज का उपयोग करना चाहिए। एवं रोग फैलाने वाले कीड़ों के लिए थायोमेथेक्‍जोन 70 डब्‍लू एव. से 3 ग्राम प्रति किलो ग्राम की दर से उपचारित कर एवं 30 दिनों के अंतराल पर दोहराते रहें। रोगी पौधों को खेत से निकाल देवें। इथोफेनप्राक्‍स 10 ई.सी. 1 लीटर प्रति हेक्टेयर थायोमिथेजेम 25 डब्‍लू जी, 1000 ग्राम प्रति हेक्टेयर

Weeding & Irrigation

खरपतवार नियंत्रण :-
फसल के प्रारम्भिक 30 से 40 दिनों तक खरपतवार नियंत्रण बहुत आवश्‍यक होता है। बतर आने पर डोरा या कुल्‍फा चलाकर खरपतवार नियंत्रण करें व दूसरी निंदाई अंकुरण होने के 30 और 45 दिन बाद करें। 15 से 20 दिन की खड़ी फसल में घांस कुल के खरपतवारो को नष्‍ट करने के लिए क्‍यूजेलेफोप इथाइल एक लीटर प्रति हेक्टेयर अथवा घांस कुल और कुछ चौड़ी पत्‍ती वाले खरपतवारों के लिए इमेजेथाफायर 750 मिली. लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव की अनुशंसा है।

सिंचाई :-
खरीफ मौसम की फसल होने के कारण सामान्‍यत: सोयाबीन को सिंचाई की आवश्‍यकता नही होती है। फलियों में दाना भरते समय अर्थात सितंबर माह में यदि खेत में नमी पर्याप्‍त न हो तो आवश्‍यकतानुसार एक या दो हल्‍की सिंचाई करना सोयाबीन के विपुल उत्‍पादन लेने हेतु लाभदायक है। वर्षा ना होने पर उपयुक्त सिंचाई नमी के अनुसार सही समय पर की जा सकती है।

Harvesting & Storage

फसल की कटाई :-
जब सोयाबीन की फलियां सूख जाएं और पत्तों का रंग बदल कर पीला हो जाए और पत्ते गिर जाएं, तब फसल कटाई के लिए तैयार होती है। कटाई हाथों से या दराती से करें। कटाई के बाद फसल को 2-3 दिन तक धुप में अच्छी तरह से सूखा लेना चाहिए। सुखाने के बाद पौधों में से बीजों को निकालने के लिए थ्रेसर, ट्रेक्‍टर, बेलों तथा अन्य कृषि साधनों का प्रयोग करना चाहिए।

बीज भंडारण :- 
सोयाबीन के बीजो अच्छी तरह धुप में सुखाने के बाद, बीजों को अच्छी तरह साफ करें। छोटे आकार के बीजों, प्रभावित बीजों और डंठलों को निकाल दें। बीज के भंडारण हेतु सुखी जगह का चयन करे और नमी से दूर रखे।



Crop Related Disease

Description:
मौसम के खुलते ही सोयाबीन, मूंग व उड़द में पीला मोजेेक रोग की सम्भावना है।कृषि वैज्ञानिकों की सलाह है कि पीले पड़ रहे पौधों को शुरूआत में ही उखाड़ कर फैंक दें, ताकि बाकी फसल को यलो मोजेक बीमारी से बचाया जा सके।
Organic Solution:
पीला मोजाइक वायरस फैलाने वाली सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए बीज को थायोमिथोक्साम 30 एफ.एस. से 3 ग्राम अथवा इमिडाक्लोप्रिड एफ.एस. 1.25 मिलीलीटर प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें।
Chemical Solution:
फसल पर सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए बीज को थायोमिथोक्साम 25 डब्ल्यू.जी. का 100 ग्राम को 500 लीटर पानी में घोल कर/ हे. की दर से छिड़काव करें।
Description:
बैक्टीरियल ब्लाइट Pseudomonas savastanoi pv के कारण होता है। ग्लाइसिनिया, और आमतौर पर सोयाबीन पर होने वाले पहले पर्ण रोगों में से एक है। बैक्टीरियल ब्लाइट शायद ही कभी गंभीर उपज नुकसान का कारण बनता है।
Organic Solution:
इस बीमारी को नियंत्रित करने के लिए कॉपर फफूंदनाशकों की सिफारिश की जाती है
Chemical Solution:
सोयाबीन पर बैक्टीरियल ब्लाइट के नियंत्रण के लिए कॉपर फफूंदनाशकों का उपयोग किया जा सकता है लेकिन इसे प्रभावी होने के लिए रोग चक्र में जल्दी लगाने की आवश्यकता होती है। हालांकि, कोर एकीकृत कीट प्रबंधन प्रथाओं का पालन करने की सिफारिश की जाती है क्योंकि कवकनाशी अक्सर इस रोगज़नक़ के खिलाफ प्रभावी नहीं होते हैं।
Description:
बैक्टीरियल pustule Xanthomonas axonopodis pv के कारण होता है। यह रोग मध्य से देर के मौसम में होता है जब तापमान गर्म होता है। रोग विकास गर्म, गीले मौसम के अनुकूल है।
Organic Solution:
इस बीमारी को नियंत्रित करने के लिए कॉपर फफूंदनाशकों की सिफारिश की जाती है |
Chemical Solution:
रोग के प्रारंभिक चरण में तांबा आधारित कवकनाशी (उदाहरण के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड, 3 जी / एल पानी) लागू करें।
Description:
ब्राउन स्टेम रोट कवक कैफोफोरा ग्रेगाटा (Cadophora gregata) के कारण होता है। ब्राउन स्टेम रोट अधिक गंभीर होता है जब तापमान ठंडा होता है और मिट्टी की नमी मौजूद होती है। गैर-मेजबान फसल (मकई, छोटे अनाज, और चारा फलियां) के लिए फसल का रोटेशन रोगज़नक़ के स्तर को कम करेगा।
Organic Solution:
सहिष्णु और प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग | फसल चक्रण का पालन किया जाना चाहिए। पिछली फसल अवशेष नष्ट हो जाना चाहिए। फसल अवशेषों को निकालना।
Chemical Solution:
2 किलो / हेक्टेयर पर मैनकोजेब का छिड़काव करें।
Description:
चक्र भृंग (गर्डल बीटल) वैज्ञानिक नाम 'ओवेरिया ब्रेयिस' है। इसे कटर इल्ली के नाम से भी जानते हैं। पौधे की 20 से 25 दिन की अवस्था से लेकर लगभग फसल के परिपक्व होने की अवस्था तक इन कीट का प्रकोप रहता है। 

यह कीट पत्तियो पर अण्डे देता है फिर मैगट के बाहर आने के बाद पत्तियों से रैंगता हुआ तने को भेदता है। सक्रंमित तने में लाल धारिया मैगट और प्यूपा के साथ दिखाई देती है। यह तने से जड़ क्षेत्र तक जाकर पौधा मार देता है
Organic Solution:
खेत में ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें एवं नियमित रूप से खरपतवार प्रबंधन करें। समय से पूर्व बुवाई करने पर कीट का प्रकोप अधिक होता है। अतः बुवाई समय से जुलाई माह में करें। फसल में खाद्य एवं उर्वरक का प्रयोग समय से करें एवं पोटाश की मात्रा अवश्य डालें। प्रभावित पौधे को नीचे से तोड़कर नष्ट कर दें। रोग रोधी किस्में जैसे-जे.एस. 93-05, जे.एस 71-05 का प्रयोग करें। खेत के चारों ओर ढेंचा लगाए जो कि कीटों को अपनी तरफ आकर्षित करके फसल को होने वाले नुकसान से बचाती है।
Chemical Solution:
रासायनिक नियंत्रण हेतु ट्राइजोफास 800 मिली प्रति हेक्टेयर या लैम्बडासायहैलोथरीन 4-9 सी .एस. का 300 एम. एल. प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
Description:
तना मक्खी कीट का वैज्ञानिक नाम 'मेलेनोग्रोमाइजा फेजियोलाइ' है। ये मक्खी अण्डे पत्ती की निचली सतह पर देती है। ये अण्डे पीले, सफेद रंग के होते हैं। मादा का रंग भूरा, काला होता है। 
Organic Solution:
उचित समय में बुवाई करें। देरी से फसल में कीट का प्रकोप बढ़ जाता है। समुचित मात्रा में खाद एवं उर्वरक का प्रयोग चाहिए। अनुशंसित बीज दर का प्रयोग करें। प्रकोपित पौधे को उखाड़ कर नष्ट कर दें। एक ही खेती में लगातार सोयाबीन की फसल नहीं लें। जैविक नियंत्रण के लिए प्रेयिंग मेटेड क्राइसोपरला, क्राक्सीनेल वीटिल को फसल में छोड दें। रोगरोधी जातियां जे.एस. 93-05, जे.एस. 71-05 लगाएँ।
Chemical Solution:
इमीडाक्लोप्रिड 17.08 एस.एल. 5 मि.ली. प्रति कि.ग्रा. से बीजोपचार करें। भूमि उपचार हेतु फोरेट 10 जी, 10 किलो प्रति हेक्टे. या कार्बोफ्यूरान 3 जी का 30 किलो प्रति हेक्ट. की दर से प्रयोग करें। इसके अतिरिक्त डाईमेथोएट 30 ई.सी. 700 मिली. या इमाडाक्लोप्रिड 200 मिली. प्रति हेक्टे. की दर से छिड़काव करें।
Description:
सेमीलूपर कीट का वैज्ञानिक नाम 'डायक्रीसिया ओरीचैल्सिया' है। इसे कूबड़ वाली इल्ली भी कहते हैं। इस कीट की इल्लियां पत्तियो को खाती है।
Organic Solution:
यदि 1 मीटर की पौध कतार में दो या दो से अधिक इल्ली दिखाई दे तो इसका नियंत्रण करना आवश्यक हो जाता है। इसके लिए उचित बीज दर का प्रयोग करें क्योंकि यदि पौधों के बीच की दूरी नियंत्रित होगी तो इस कीट का प्रकोप कम होगा। उचित खरपतवार प्रबंधन करें। खेत में "टी आकार" की लकड़ी की खूंटियां लगाएं जिसमें बैठने वाली चिड़ियां इन इल्लियों को खा सकें। फेरोमोन ट्रैप 10 ट्रैप प्रति हेक्टेयर की दर से खेतों में लगाएँ। प्रकाश प्रपंचों का प्रयोग करें।
Chemical Solution:
इल्लियों का प्रकोप ज्यादा हो जाए तो रासायनिक दवाओं का प्रयोग करें, जैसे-फसल के 30 से 35 दिन की अवस्था में क्विनालफास 2 मिली. प्रति लीटर पानी की दर से 1.5 लीटर प्रति हेक्टेयर दवा का छिड़काव करें या ट्राइजोफास 800 मिली. प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करें।
Description:
इस कीट का वैज्ञानिक नाम "स्पोडोप्टेरा लिटुरा'' है। ये कीट अगस्त से सितंबर माह में फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। वयस्क शलभ मटमैला, भूरे रंग का होता है। इल्ली भूरे रंग की होती है। इसके प्रत्येक खंड में दोनों तरफ काले तिकोने धब्बे पाए जाते हैं। इल्ली 35-40 मि.मी. लम्बी होती है। मादा पत्तों के निचली सतह में अंडे देती है जिसे अपनी भूरे बालों द्वारा ढंक देती है। अंडे से 4 से 5 दिन में इल्ली निकलती है। इल्ली 20-22 दिन बाद भूमि में जाकर शंखी प्यूपा में बदल जाती है। 8 से 10 दिन बाद वयस्क बाहर निकलता है। यह बहुभक्षी कीट है। इसके लिये तंबाकू, टमाटर, गोभी, गाजर, बैंगन, सूर्यमुखी, अरंडी, उड़द, कपास इत्यादि पोषक पौधे हैं।
Organic Solution:
नियमित फसल चक्र अपनाएं एवं अनुशंसित बीज की मात्रा उपयोग करें। फेरोमोन ट्रेप 10-12 प्रति हे. खेत में लगाये। अंडे एवं इल्लियों को इकट्ठा करके नष्ट करें। खेत में टी. आकार की खूटियां 40 से 50 प्रति हे. लगाएं। जैविक नियंत्रण के लिये एन.पी.व्ही. 250 एल.ई., 250 सूंडी के बराबर के घोल को प्रति हे. खेत में छिड़काव करें।
Chemical Solution:
1 मीटर में 10 से ज्यादा इल्लियां देखे जाने पर फसल को आर्थिक नुकसान होता है। अतः ऐसी अवस्था में रसायनों का प्रयोग करें जैसे-फसल के 30 से 35 दिन की अवस्था में क्विनालफास दवा 2 मि.ली. प्रति हे. पानी की दर से 1.5 ली. प्रति हे. खेत में छिड़काव करें अथवा ट्राइजोफास दवा 800 मि.ली. प्रति हे. छिड़काव करें।
Description:
इस कीट का वैज्ञानिक नाम 'स्पाइलोसोमा 'ओबलीकुमा' है। इल्लियां 40-50 मि.मी. व भूरे लाल रंग की रोएं वाली होती हैं। इसके लिये पोषक पौधे मूंग, उड़द, सूर्यमुखी, तिल, अलसी, अरंडी इत्यादि है।
Organic Solution:
खेत में गहरी जुताई करें। अनुशंसित बीजदर 70 से 100 किलोग्राम हे. का प्रयोग करें। नियमित रूप से फसल चक्र अपनाये। इल्लियों के झुण्डे को इकठ्ठा करके नष्ट करें। जैविक नियंत्रण के लिये एन.पी.व्ही. 250 एल.ई., 1250 सूंडी के बराबर के घोल को प्रति हे. खेत में छिड़काव करें। प्रकाश प्रपंच का उपयोग करें। बेसिलस थुरिनजिनसिस 1 लीटर या एक किलो ग्राम प्रति हे. के हिसाब से छिड़काव करें। नीम के तेल का उपयोग करें।
Chemical Solution:
क्लोरपाइरीफॉस 20 ईसी @ 1.5 लीटर/हेक्टेयर या ट्राईजोफोस 40 ईसी @ 1.0 लीटर/हेक्टेयर या क्विनालफॉस 25 ईसी @ 1.5 लीटर/हेक्टेयर लगाएं। डस्ट क्लोरपाइरीफॉस 1.5% डीपी या क्विनालफॉस 1.5% डीपी @ 25 किग्रा/हेक्टेयर जब जनसंख्या 10/मी पंक्ति लंबाई (ईटीएल) तक पहुंचने की संभावना है।
Description:
इस कीट का वैज्ञानिक नाम "बेमेसिया टबासी” है। इस कीट के शिशु तथा वयस्क दोनों ही फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। पत्तियों को हिलाने पर ये उड़ जाते हैं। ये कीट शहद के समान द्रव उत्सर्जित करते हैं जिस पर काले रंग की फफूंद विकसित हो जाती है। पौधों की पत्तियां पीली व कमजोर हो जाती है। व्यस्क सफेद मक्खी 1.5 मिमी. लम्बी होती है। ये मक्खी पीला विषाणु नामक रोग फसल में फैलाती है।
Organic Solution:
फसल चक्र अपनाएं। खरपतवार प्रबंधन, खाद्य व उवर्रक प्रबंधन करें। जल निकास की उचित व्यवस्था करें। संक्रमण की शुरूआती अवस्था में पीले पड़े पत्तों को तोड़ दें और गाय के गोबर उपलो से बनी राख से डस्टिंग करें।
Chemical Solution:
कीट का आक्रमण होने पर खेत में ट्राइजोफास 40 ई.सी. 800 से 1000 मिली. लीटर या मिथाइल डेमेटान 25 ई.सी. 800 मिली. लीटर प्रति हे. का छिड़काव करें। इमाडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. 5 मिली. लीटर प्रति किलो ग्राम बीज दर से बीजोपचार करें। पूर्वमिश्रित बीटासायफ्लुथ्रीन 49 + इमिडाक्लोप्रिड 19.81% ओ.डी. का 350 एम.एल. प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें। पूर्वमिश्रित थायो मिथाक्जाम + लैम्बडासायहैलोथरीन का 125 एम.एल. प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें यह सफेद मक्खी के साथ साथ पत्ती खाने वाले कीटों का भी नियंत्रण करता है।
Description:
इस कीट का वैज्ञानिक नाम 'हेलिकोवर्पा आर्मीजेरा' है। 3 से 6 इल्लियां प्रतिमीटर की कतार में होने पर 20 से 90 प्रतिशत फसल को हानि पहुंच सकती है। नवजात इल्ली हरे रंग की एवं बाद में हल्के भूरे रंग की हो जाती है। इल्ली 04 मिमी. लम्बी होती है। इसके पोषक पौधों कपास, अरहर, तम्बाकू, टमाटर, मटर इत्यादि है।
Organic Solution:
ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें। इल्लियों एवं अंडों को इकट्ठा करके नष्ट कर दें। टी. आकार की खुटियां जिन पर पक्षी बैठकर इल्लियां खा सकें। 50 प्रति हे. खेत में लगाएं।
Chemical Solution:
क्लोरोपाइरीफास 20 ई.सी. 1.5 ली या इंडोक्साकार्ब 14.8 एस.एल. 300 मिली लीटर प्रति हे. के हिसाब से छिड़काव से करें।
Description:
यह एक बीज एवं मृदाजनित रोग है। रोग की शुरूआती अवस्था में पत्तियों तने और फली पर गहरे भूरे रंग के अनियमित धब्बे बन जाते है और बाद में यह धब्बे काली संरचनाओं से भर जाते है।पत्तियों एवं षिराओं का पीला-भूरा होना, मुड़ना और झड़ना इस बीमारी के लक्षण है।
Organic Solution:
Chemical Solution:
खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था रखें।बीज को कार्बेन्डाजिम + मेंकोजेब 3 ग्राम प्रति किलो बीच की दर से उपचारित करें। रोग के लक्षण दिखाई देने पर 5 ग्राम प्रति लीटर मेंकोजेब अथवा 1 ग्राम प्रति लीटर र्कावेंडाजिम का छिड़काव करें। टेबुकोनाझोल का 625 एम. एल. प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
Description:
यह रोग पानी की कमी, निमेटोड अटैक, मिट्टी के कड़क होने की दशा में होता है। इसमें नीचे की पत्तिया पीली पड़ जाती है और पौधा मुरझा जाता है।
Organic Solution:
रोग सहनषील किस्मे जैसे जे.एस.-2034, जे.एस.-2029, जे.एस.-9752 का उपयोग करें। ट्राइकोडर्मा विरडी से 4 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीज उपचारित करें।
Chemical Solution:
खड़ी फसल में कार्बेनडाजिम 1 ग्राम प्रति लीटर की दर से छिड़काव करें।

Soybean (सोयाबीन) Crop Types

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Frequently Asked Questions

Q1: भारत में किस मौसम में सोयाबीन उगाया जाता है?

Ans:

खरीफ मौसम के दौरान सोयाबीन प्रमुख तिलहनी फसल है। बुवाई जून में शुरू होती है और सितंबर में फसल काटा जाता है। यह देखा गया है कि बुवाई और रोपण चरण के दौरान कीमतें गिरना शुरू हो जाती हैं, और जुलाई, अगस्त और सितंबर में फसल विकास चरणों के दौरान और गिरावट जारी रहती है।

Q3: भारत में सोयाबीन का सर्वाधिक उत्पादन किस राज्य में होता है?

Ans:

व्यापार मंडल ने कहा कि मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान राज्यों में फसल अच्छी स्थिति में है, जो देश के कुल उत्पादन का 90% से अधिक है। इसने कहा कि एक साल पहले सोयाबीन की पैदावार 22% बढ़कर 1,052 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर होने की उम्मीद है।

Q5: क्या हमें सोयाबीन खाना चाहिए?

Ans:

सोयाबीन पोषक तत्वों और लाभकारी पौधों के यौगिकों से भरपूर होते हैं। कम से कम संसाधित सोया खाद्य पदार्थों में समृद्ध आहार विभिन्न स्वास्थ्य लाभ प्रदान कर सकते हैं, जिनमें बेहतर हृदय स्वास्थ्य, कम रजोनिवृत्ति के लक्षण और कुछ कैंसर का कम जोखिम शामिल है।

Q2: भारत में किस प्रमुख क्षेत्र में सोयाबीन उगाया जाता है?

Ans:

भारत में सोयाबीन का उत्पादन महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में हावी है, जो कुल उत्पादन का 89 प्रतिशत योगदान देता है। राजस्थान, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ और गुजरात शेष 11 प्रतिशत उत्पादन में योगदान करते हैं। महराष्ट्र में सोयाबीन में अग्रणी बनने की क्षमता है।

Q4: भारत का कौन सा राज्य सोयाबीन उत्पादन में प्रथम स्थान पर है?

Ans:

मध्यप्रदेश ने 2005 में सोयाबीन के कुल उत्पादन का 60 प्रतिशत उत्पादन करके देश में सोयाबीन में पहला स्थान हासिल किया। चना, मक्का और कुल दालों और तिलहन के उत्पादन में अधिकतम हिस्सेदारी हासिल करने में भी राज्य सबसे ऊपर है।

Q6: सोयाबीन की कटाई किस महीने करते हैं?

Ans:

सितंबर-अक्टूबर: सोयाबीन की फसल की कटाई करें। यदि आवश्यक हो तो सुरक्षित भंडारण के लिए अनाज को लगभग 15% नमी तक सुखाएं।