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मृदा मे सुक्ष्मजीवों का महत्व
मृदा मे सुक्ष्मजीवों का महत्व

  मृदा मे सुक्ष्मजीवों का महत्व

अमित सिंह1 डॉ लाल विजय सिंह2 , डॉ. अमित कुमार सिंह3 , नेहा कुमारी4

  1. (सहायक अध्यापक) शिवालिक इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज, देहरादून
  2. (सहायक अध्यापक, उद्यान विभाग) जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय, बलिया (यूपी)
  3. (सहायक अध्यापक, उद्यान विभाग) जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय, बलिया (यूपी)
  4. बी.एस.सी.एजी द्वितीय वर्ष शिवालिक इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज, देहरादून

मृदा या मिट्टी प्राकृतिक रुप से प्राकृतिक बलो के द्वारा अनेक कारकों के अनुकूल होने से बनती है अर्थात जमीन की सबसे ऊपरी सतह जहां तक फसलों की जड़े पहुंचती है या जिसपर सस्य क्रियाएं की जाती है, मृदा कहलाती हैं| मृदा मे मुख्यत: खनिज,  कार्वनिक पदार्थ ,जल या वायु होता है|

खनिजों में विभिन्न तत्व विद्यमान होते है तथा कार्वनिक पदार्थो में फसलों व जंतुओं के सड़े गले अवशेष के साथ-साथ अनेक सुख्मजीव उपलब्ध होते है, जो कृषि के दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण होते हैं| ये सुख्मजीव मुख्यत: दो रूप में पाए जाते है|

पहला लाभदायक एवम दूसरा हानिकारक सुख्मजीव| लाभदायक सुख्मजीवों का बहुत बड़ा योगदान होता है मिट्टी के अंदर, आवश्यक तत्वों को पौधो में उपलब्ध कराने में जबकि हानिकारक सुख्मजीव मृदा जनित, वायु जनित या बीज जनित रोगों को बढ़ावा देते हैं|

मृदा मे सुखमजीवो के लाभ :-

मृदा मे सुख्मजीवों के होने से बहुत सारी लाभ की स्थिति होती है|

  • सुख्मजीवों की प्रचुरमात्रा व सक्रियता से मृदा की सभी जैविक प्रक्रियाएं व मृदा का जैविक गुण प्रयाप्त रूप से सामान बना रहता है जो मृदा उर्वता को दर्शाता है|
  • मृदा में सुख्मजीवों के द्वारा अनेक पदार्थ उत्पन्न किए जाते है को मृदा विलयन में घुलता है तथा पौधो को पोषण प्रदान करता है|
  • हम मृदा में जिस भी पोषक तत्त्व को उर्वरक के माध्यम से मृदा में प्रदान करते हैं सुक्ष्मजीवों के द्वारा ही उन उर्वरकों को उनके उस रुप मे लाया जाता है जिस रूप में पौधे उन्हें ग्रहण करते है| अर्थात मृदा में होने वाले सभी सकारात्मक रासायनिक अभिक्रियाओं के लिए सुख्मजीव ही जिम्मेवार होते है जिसके माध्यम से फसल तत्वों को अवशोषित कर पाते हैं|
  • सुख्मजीव वास्तव मे बहुत सारे सुख्मतत्वों के श्रोत होते है अर्थात इनकी उपलब्धता में कार्वनिक पदार्थ पहले ह्यूमस में व ह्यूम्स बाद में पोषक तत्वों में परिवर्तित होता है|
  • सुख्मजीवों की क्रियाशिलता जड़ो के पास अत्यधिक होती है जिसके वजह से पौधो को सभी तत्व उपलब्ध रुप से जल  विलयन के रूप में प्राप्त हो जाता है और उसका पौधो के द्वारा उपयोग कर लिया जाता है|
  • सुखमजीवों के द्वारा जटिल से जटिल मृदा यौगिक को साधारण यौगिक में बदल दिया जाता है अर्थात उन तत्वों को भी उपलब्ध करवा दिया जाता है जो बहुत लंबे समय से मिट्टी में जटिल यौगिक बनकर पड़े रहते है|
  • सुख्मजीवो के द्वारा मृदा में फसल अवशेष, कूड़ा, कचरा व जंतु अवशेषों को विखंडित किया जाता है जिसके मिट्टी में ह्यूमस उपलब्ध हो जाता है , ह्यूमस के उपलब्ध होने से मिट्टी की जलधारण क्षमता या पोषक तत्वों  की उपलब्धता में वृद्धि होती है|
  • सुख्मजीव मृदा में होने वाली सभी भौतिक, रासायनिक व जैविक क्रियाओं में हिस्सा लेते है साथ ही मृदा के भौतिक, रासायनिक व जैविक स्थिति में सुधार भी करते हैं|
  • कुछ तत्व जैसे- फास्फोरस जिसको मृदा में विस्थापन अत्यंत कम होता है जिनको सुख्मजीवों के द्वारा ही विस्थापित किया जाता है साथ ही कॉम्प्लेक्स फास्फोरस को PSB (Phosphorus solubilizing bacteria) के द्वारा उपलब्ध रूप में लाया जाता है|
  • सुख्मजीवों जैसे राइजोबियम, एजोटोवेक्टर, एजोस्पिरिलम व (BGA) ब्लू ग्रीन एल्गी के द्वारा सबसे अधिक महत्वपूर्ण तत्व नाइट्रोजन मृदा में वातावरण से स्थिरीकरण करवाया जाता है जिससे मृदा की सेहत में सुधार होता है|

सुख्मजीवों से होने वाली हानियां

  • मृदा जनीत रोगों के प्रसार का मुख्य कारण सुख्मजीव होते है क्योंकि ये मिट्टी के अंदर सुसुप्तवस्था में लंबे समय तक अपने स्पोर के रूप में पड़े रहते है तथा अनुकूल कंडीशन मिलने पर पुनः रोग को अंजाम देते है|
  • अत्यधिक सुख्मजीवों की संख्या होने से ये पौधे एक साथ न्यूट्रिएंट्स व जल के लिए कंपटीशन करते है|
  • सुख्मजीवों की अधिकता से मृदा अम्लीय हो जाता है तथा कार्वनिक पदार्थ का क्षरण तेज होने लगता है|

निष्कर्ष :-                      

इस प्रकार सुक्ष्मतत्व खेती में वरदान सिद्ध हुए हैं इनकी उपलब्धता पर ही मृदा के सभी गुण स्थिर होते है तथा जड़ो की बढ़वार भी अच्छी होती है| सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सुख्मजीवों की सक्रियता से ही पोषक तत्वों में आपसी मृदा में केटायन एक्सचेंज (CEC) की घटना होती है जो मृदा में पोषक तत्व उपलब्ध करवाने हेतु बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है| अर्थात सुख्मजीवों की सक्रियता से हानिकारक लवण (salt) का भी निस्कारण हो जाता है साथ ही साथ सभी मृदा की texture, स्ट्रक्चर तथा भौतिक, रासायनिक व जैविक क्रियाएं संतुलित रहती हैं|