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करेले की फसल और फायदे
करेले की फसल और फायदे

करेले की फसल और फायदे


गोविंद कुमार,   संजय दत्त गहतोड़ी,  श्वेता सिंह , सोनल सृष्टि,
डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर, शिवालिक इंस्टीट्यूट आफ प्रोफेशनल स्ट्डीज देहरादून उत्तराखंड

करेला का नाम सुनते ही कड़वेपन का ख्याल आ जाता है। हरे या गहरे हरे रंग की इस सब्जी का स्वाद भले ही मन को न भाए पर इसमें ढेरों एंटीऑक्सीडेंट और जरूरी विटामिन पाए जाते हैं। कई लोग कड़वा होने के कारण करेले को खाना पसंद नहीं करते लेकिन यह शरीर के लिये काफी लाभदायक होता है। करेला शीतल, भेदक, हलका, कड़वा व वातकारक होता है और ज्वर, पित्त, कफ रूधिर विकार, पाण्डुरोग, प्रमेह और कृमि रोग का नाश भी करता है। करेली के गुण भी करेले के समान है। करेले का साग उत्तम पथ्य है। यह आमवात, वातरक्त, यकृत, प्लाहा, वृध्दि एवं जीर्ण त्वचा रोग में लाभदायक होता है। इसमें विटामिन ‘ए’अधिक मात्रा में होता है। इसमें लोहा, फास्फोरस तथा कम मात्रा में विटामिन सी भी पाया जाता है।
करेले का नूट्रिशनल वैल्यू: करेले में प्रचूर मात्रा में विटामिन A, B और C पाए जाते हैं। इसके अलावा कैरोटीन, बीटाकैरोटीन, लूटीन, आइरन, जिंक, पोटैशियम, मैग्नीशियम और मैगनीज जैसे फ्लावोन्वाइड भी पाए जाते हैं।

फायदे - 

  1. करेले में फास्फोरस पर्याप्त पाया जाता है। यह कफ, कब्ज और पाचन संबंधी समस्याओं को दूर करता है। 
  2. अस्थमा की शिकायत होने पर करेला बेहद फायदेमंद होता है। दमा रोग में करेले की बगैर मसाले सब्जी खाने से लाभ मिलता है।
  3. पेट में गैस बनने और अपच होने पर करेले के रस का सेवन करना अच्छा होता है
  4. करेले का जूस पीने से लीवर मजबूत होता है और लीवर की सभी समस्याएं खत्म हो जाती है। पीलिया में भी लाभ मिलता है।   
  5. करेले की पत्तियों या फल को पानी में उबालकर इसका सेवन करने से, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
  6. उल्टी-दस्त या हैजा हो जाने पर करेले के रस में काला नमक मिलाकर पीने से तुरंत आराम मिलता है।
  7. लकवा या पैरालिसिस में भी करेला बहुत कारगर उपाय है। कच्चा करेला खाने से रोगी के लिए लाभदायक होता है।
  8. खून साफ करने के लिए भी करेला अमृत के समान है। मधुमेह में यह बेहद असरकारक माना जाता है। 
  9. खूनी बवासीर में करेला अत्यंत लाभदायक है। 
  10. गठिया व हाथ पैरों में जलन होने पर करेले के रस की मालिश करना लाभप्रद होता है।
  11. यह किडनी को सक्रिय कर, हानिकारक तत्वों को शरीर से बाहर करने में मदद करता है।
  12. यह हानिकारक वसा को ह्दय की धमनियों में जमने नहीं देता जिससे रक्तसंचार व्यवस्थित बना रहता है, और हार्ट अटैक की संभावना नहीं होती। 

 
मिट्टी : बलुई दोमट या दोमट मिट्टी होनी चाहिए। खेत समतल तथा उसमें जल निकास व्यवस्था के साथ सिंचाई की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए,  बुवाई से 20-25 दिन पहले 25-30 टन गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद को एक हैकटेयर खेत में मिलाना चाहिए। बुवाई से पहले नालियों में 50 किलो डीएपी, 50 किलो म्यूरेट आफ पोटास का मिश्रण प्रति हैक्टेयर के हिसाब से (500 ग्राम प्रति थमला) मिलाऐं। 30 किलो यूरिया बुवाई के 20-25 दिन बाद व 30 किलो यूरिया 50-55 दिन बाद पुष्पन व फलन के समय डालना चाहिए। यूरिया सांय काल मे जब खेत मे अच्छी नमी हो तब ही डालना चाहिए।

बीज की मात्रा व बुआई
500 ग्राम बीज प्रति एकड़, बीजों को बाविस्टीन (2 ग्रा प्रति किलो बीज दर से) के घोल में 18-24 घंटे तक भिगोये तथा बुवाई के पहले निकालकर छाया में सुखा लेना चाहिए। बीज 2 से 3 इंच की गहराई पर करना चाहिए।

फसल अंतरण
नाली से नाली की दूरी 2 मी., पौधे से पौधे की दूरी 50 सेंमी तथा नाली की मेढों की ऊंचाई 50 सेंमी रखनी चाहिए। नालीयां समतल खेत में दोनो तरफ मिट्टी चढ़ाकर बनाऐं। खेत मे 1/5 भाग मे नर पैतृक तथा 4/5 भाग में मादा पैतृक की बुआई अलग अलग खण्डो में करनी चाहिए।

फल तुड़ाई व बीज निकालना
फल पकने पर फल चमकीले नारंगी रंग के हो जाते हैं। फल को तभी तोड़ना चाहिए क्योकि कम पके फल में बीज अल्प विकसीत रहते हैं। 

उन्नत  किस्में
ग्रीन लांग, फैजाबाद स्माल, जोनपुरी, झलारी, सुपर कटाई, सफ़ेद लांग, ऑल सीजन, हिरकारी, भाग्य सुरूचि , मेघा – एफ 1, वरून – 1 पूनम, तीजारावी, अमन नं.- 24, नन्हा क्र. – 13 ।

जलवायु
करेले कि बढ़वार के लिए न्यूनतम तापक्रम 20 डिग्री सेंटीग्रेड तथा अधिकतम 35  - 40 डिग्री सेंटीग्रेड होना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक
नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा स्फूर एवं पोटाश की पूरी मात्रा बोवाई के समय देना चाहिए। शेष नाइट्रोजन की आधी मात्रा टाप ड्रेसिंग के रूप में बोवाई के 30-40 दिन बाद देना चाहिए। फूल आने के समय इथरेल 250 पी. पी. एम. सांद्रता का उपयोग करने से मादा फूलों की संख्या अपेक्षाकृत बढ़ जाती है, और परिणामस्वरूप उपज में भी वृद्धि होती है। 250 पी. पी. एम. का घोल बनाने हेतु (0.5 मी. ली.) इथरेल प्रति लिटर पानी में घोलना 

सिंचाई
प्रति 8-10 दिनों बाद सिंचाई की जाती है।

निंदाई गुड़ाई
प्राथमिक अवस्था में निंदाई – गुड़ाई करके खेत को खरपतवारों से मुक्त रखना चाहिए। 

फल तुड़ाई

  • सब्जी के लिए फलों को साधारणत: उस समय तोड़ा जाता है, जब बीज कच्चे हों। यह अवस्था फल के आकार एवं रंग से मालूम की जाती है। वैसे तो फलो की तुड़ाई मुलायम एवं छोटी अवस्था मे ही कर लेनी चाहिए। फलों को तोड़ते समय इस बात का ध्यान रखे कि फलों के साथ में डंठल की लम्बाई 2 सेंटीमीटर से कम नहीं होनी चाहिए| इससे फल अधिक समय तक टिके हुए रहते हैं| कटाई सुबह के समय करनी चाहिए और फलों को कटाई के बाद छाया में रखना चाहिए | जब बीज पकने की अवस्था आती हैं, तो फल पीले – पीले होकर रंग बदल लेते हैं।
  • करेला की प्रति एकड़ लागत 20-25 हज़ार रुपये होती है। इससे 50-60 क्विंटल तक उपज मिल जाती है।  बाज़ार में करीब 2 लाख रुपये का भाव मिलता है। 
  • करेले की फसल एक ऐसी फसल है, जिसे लगाने के लगभग 75 से 85 दिनों के बाद किसानों को उत्पादन मिलनें लगता है और यह उत्पादन लगभग 3 से 4 महीनें तक निरंतर होता रहता है| कुल मिलाकर किसानों के लिए करेले की खेती करना लाभप्रद होता है।