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बकरी पालन किसानों के लिए लाभप्रद व्यवसाय
बकरी पालन किसानों के लिए लाभप्रद व्यवसाय

संजय दत्त गहतोड़ी1,  दिव्यांशी तोमर, डा. सुशील कुमार1, दीपक कुमार 2 , आदित्य अभिनव2 एवं आकृति2
1. असिस्टेंट प्रोफेसर, डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर, शिवालिक इंस्टीट्यूट आफ प्रोफेशनल स्ट्डीज देहरादून उत्तराखंड
2. तृतीय वर्ष बी. एस. सी., कृषि संकाय, शिवालिक इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज

बकरीपालन: मांस व दूध की उपलब्धता के लिए व्यवसायिक स्तर पर बकरी पालन किया जाता है। किसान पशुपालन के साथ बकरी का उपयोग प्राचीनकाल से करता आ रहा है, पशुओं की उपयोगिता इसलिए भी महत्वपूर्ण है। 
भारत में बकरी पालन का भविष्य बहुत ही उज्जवल है। कम लागत में ‘बकरी पालन व्यवसाय’ गरीब किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए आय का एक अच्छा साधन है। किसान बकरी पालन का व्यवसाय करके अपनी आमदनी के साथ-साथ अपना भविष्य भी उज्जवल बना सकते है।किसान ‘बकरी पालन व्यवसाय’ से आय दोगुनी से तिगुनी कर सकते है, किसान बकरी पालन को शुरू करते वक्त उच्च नस्ल की बकरियों का चयन करें। स्टॉल फीडिंग के लिए ‘बारबरी’ बकरी और चराई के लिए रखना है तो ‘सिरोही’ बकरी का चयन करें। बकरी के दूध का उपयोग बर्फी, कुल्फी,पनीर, दही, खीर, लस्सी, साबुन, लिक्विड सोप उत्पाद बनाने में किया जाता है

महत्व: 
भारत में मांस का मुख्य स्रोत ‘बकरे’ हैं। इसकी घरेलू मांग बहुत अधिक है। बकरी के ‘दूध का व्यवसाय’ भी आमदनी का बढ़िया स्रोत है। बकरी का दूध आज के युग में औषधि से कम नहीं हैं। यदि किसी व्यक्ती को प्लेटलेट्स (Platelets) कम हो या डेंगू से पीड़ित हो तो उसे बकरी के दूध पीने की सलाह दी जाती हैं। बकरी के दूध में औषिधीय गुण एवं पोषक तत्व भरपूर होने के कारण इसकी मांग शहरों के साथ गांव में भी अधिक है। सरकार बकरी पालन को बढ़ावा देने के लिए किसानों को ‘बकरी पालन व्यवसाय’ के लिए अनुदान देती हैं। सूखा प्रभावित क्षेत्र में खेती के साथ बकरी पालन आसानी से, कम लागत में करके अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है।किसान जरूरत के समय बकरियों को बेचकर आसानी से नकद पैसा प्राप्त कर सकता है। बकरी एक पालतू पशु है, जिसे दूध तथा मांस के लिये पाला जाता है। इसके अतिरिक्त इससे रेशा, चर्म , खाद एवं बाल प्राप्त होता है। बकरी का विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में अपने को ढालने की क्षमता पाई जाती हैं।कृषि प्रधान देश की अर्थव्यवस्था में पशुधन एवं पशुपालन का महत्वपूर्ण स्थान है। बकरी-पालन हमारे देश का काफी बहुत पुराना व्यवसाय है। बात दुध की हो या मांस की, हमारे देश के गरीब किसान के लिए बकरी से बेहतर कोई दूसरा जानवर नहीं है। बड़े पशुओं जैंसे गाय, भैंस की शारीरिक जरूरत और रखरखाव काफी महंगी पड़ती है,छोटे व गरीब किसानों के लिए बकरी-पालन काफी सरल एवं लाभप्रद व्यवसाय है। बकरी के इन्हीं गुणों के कारण इसें ‘‘ गरीब की गाय‘‘ कहा जाता है। बकरी को घर के छोटे बच्चे व खाली सदस्य आराम से सार्वजनिक चरागाहों, अन्य भूमी पर चराकर पाल सकते है।
एक साल में बकरी से 1200 रूपए की आय दुध से प्राप्त की जा सकती है। बकरियों के नर बच्चे मांस उत्पादन हेतु काम में लाए जाते है। छः माह की उम्र पर एक स्वस्थ बच्चे से 3000-4000 रूपए का लाभ प्राप्त किया जा सकता है। समाज का पिछडा वर्ग जिनके पास भूमि नहीं बराबर है। बकरी पालन को अपनाकर अपनी हालत को काफी हद तक सुधार सकता है। बकरी-पालन से निम्न फायदे हैं।
1. बकरी दुध एवं मांस के लिए उपयुक्त स्त्रोत है।
2. चमड़े व बालों से अतिरिक्त आय प्राप्त होती है।
3. इसकी खाद मुत्र से खेत की उर्वरा शक्ति बढती है।
4. कम आयु में ही इससे दुध उपलब्ध होता है।
5. इसका मांस अन्य पशुओं के मांस की तुलना में अधिक पसंद किया जाता है।
6. एक बार में एक से अधिक बच्चे दे सकती है।
7. किसी विशेष आवास की जरूरत नही होती है।
8. सालभर रोजगार प्रदान करती है।
9. बहुत कम खर्चे में पाली जाती है।
10. आवास हेतु कम स्थान घेरती है।
11. विपरित परिस्थितियों में पाली जा सकती है।
12. बकरी का दुध अन्य पशुओं की तुलना में मानव दुध के काफी नजदीक है।

मानव पोषण और बकरी :- प्रोटीन व दुध की कमी को पूरा करने का सबसे अच्छा सस्ता रास्ता बकरी पालन है। बकरी  दुध की प्रोटीन की मात्रा मानव दुध के प्रोटीन से मिलती जुलती है, यह मानव बच्चे के लिए उत्तम दुध है। बहुत से लोग, जिन्हे गाय व भैंस के दुध से एलर्जी होती है या पेट में छाले/ अल्सर हो, उनके लिए बकरी का दुध बहुत लाभदायक है। लोग बकरी के मांस को अन्य जानवरो के मांस से ज्यादा पसंद करते है,बकरी के मांस में प्रोटीन की मात्रा अधिक व वसा की मात्रा कम होती है, जो संतुलित आहार की नजर से अच्छा है। बकरी प्रतिदिन 1 से 2 लीटर दुध देती है, एक परिवार के दुध की आवश्यकता को पूरा किया जा सकता है तथा अतिरिक्त दुध को बेचकर आर्थिक लाभ भी प्राप्त हो सकता है। बकरी को दुध के लिए ज्यादा दाना-पानी की जरूरत नही होती है। घर या आसपास मौजुद चारा व दुसरी चीजें खिलाकर आसानी से बकरी को पालकर दैनिक जरूरतों को पुरा किया जा सकता है। प्राचीनकाल से ही बकरी का दुध मानव दुध के उपरान्त दूसरे स्थान पर प्रतिस्थापित होकर नवजात बच्चों के स्वास्थय के लिए अति उत्तम माना जाता रहा है। यहां तक कि वृद्धों के लिए भी बकरी का दुध अति पौष्टिक, शीघ्र पचने वाला एवं लाभकारी होता है। अतः बकरी को मनुष्य की सौतेली मां की संज्ञा दी जाती है।

बकरियों की भारतीय नस्ल: 
21 प्रकार की मुख्यत: होती हैं।

  • दुधारू नस्ल: जैसे जमुनापारी,सुरती जखराना, बरबरी
  • मांसवाली नस्ल: ब्लैक बंगाल,मेहसाना,संगमनेरी
  • ऊन उत्पादक: कश्मीरी,गद्धी

बकरी पालन की प्रक्रिया: बकरी पालने के लिए हम उसे घर पर भी आसानी से रख सकते है। अगर बड़े पैमाने पर किया जाए तो उनके लिए बाड़ा बनाने की जरूरत पड़ती है। बकरियां खेतो में जंगल में घूम फिरकर अपना भोजन आसानी से प्राप्त कर लेती है।

प्रजनन क्षमता: एक बकरी लगभग 18 महीने में बच्चा प्रजनन करने की स्थिति में आ जाती है। एक बकरी एक साथ 1-4 बच्चो का प्रजनन करती है, साल में दो बार प्रजनन करने से इनकी संख्या मैं वृद्धि होती है।

बकरियों में रोग: बकरियों में मुंह पका,खुरपका रोग के साथ पेट मैं खुजली कि समस्या देखने को मिलती है।

  • अफरा: इस बीमारी में बकरियां तनाव में रहना शुरू कर देती  है लगातार अपने दांतो को पीसती रहती है और मांशपेशियों को हिलाती है इस बीमारी के लिए सोडियम बीकार्बोनेट दिया जाता है।
  • कोकिसिद्योसिस: इस बीमारी में बकरी के बच्चे डायरिया समस्या शिकार हो जाते है इस बीमारी में बच्चो का वजन तेजी से काम होता है।

लघु / कुटीर उद्योग और बकरी :- दुध और मांस के उपरान्त बकरी का चमड़ा भी काफी महत्वपूर्ण है। जैकेट, कोट, पर्स, जूते, दस्ताने, पेटियां तथा घर की सजावटी चीजें बनाकर बेचने से अधिक लाभ कमाया जा सकता है। बकरी की खाल अन्य खालो की अपेक्षा अच्छी समझी जाती है।बकरियों से बाल तथा रेशा प्राप्त होते है। जिनसे विभिन्न प्रकार के नमदें, ऊनी वस्त्र बनाए जाते है। प्रत्येक बकरी से सालभर में लगभग दो क्विंटल खाद प्राप्त होती है। बकरी के उपरोक्त उपयोगिता को देखते हुए बकरी उत्पादन से संबंधित लघु उद्योग स्थापित किए जा सकते है। जैसे- दुग्ध उद्योग, मांस और चमड़ा उद्योग व वस्त्र उद्योग आदि। इससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे तथा साथ ही बकरी पालन को अपेक्षित स्तर पर लाया जा सकेगा।

बकरी पालन का तरीका : बकरी फार्म हाउस या बकरी के शेड बनाने के लिए सही जगह का चुनाव करना ज़रूरी होता है, बकरी के शेड के लिए हम ऐसे जगह को चुनें की जहाँ बकरियों के चरने की जगह हो,  जिससे हम बकरियों को चरा कर उसे हरा चारा भी उपलब्ध करा सकें| एक - दो एकड़ की जमीन यह व्यवसाय शुरू करने के लिए काफी है| बकरियों का शेड बनाने से पहले जमीन का बाउंड्री जरूर करवा दें 6 फिट का बाउंड्री वाल अवश्यक है| पानी के लिए बोरिंग भी अवश्यक है|जिससे  बाड़े को सेफ्टी और पशुओं के पीने के लिए साफ़ पानी मिल सके | 20-25 बकरी और एक नर बकरा से जोकि बजट में भी है और रिस्क भी कम है । इसके लिए आपको 80x14 वर्ग फ़ीट का शेड बनाना है जिसमे  आसानी से 100 बकरी रख सकते हैं , विशेषज्ञों द्वारा बताया जाता है  कम से कम एक बकरी को रखने के लिए 10 -12 वर्ग फ़ीट का जगह जरूर रखें। दो तरह के चारे हम बकरियों को जरूर दें एक हरा चारा और दूसरा सूखा चारा,  हरा चारा में  पत्ते,घांस , बरसीम , मक्का इत्यादि अवश्य दें और सूखे चारे के रूप में हम 100 kg सूखा चारा बना के रख लें।
मकई का दर्रा – 35 kg,गेहू का चोकर – 35 kg,खल्ली (मूंग फली ) – 10 kg,चने का छिलका – 20 kg,मिनरल मिक्सचर पाउडर – 4.5 kg,नमक – 1 kg
यह चारा बकरियों को दिन में सुबह शाम कुट्टी यानि कटे हुए पोवाल में मिला कर दें एक बकरी के चारे का औसत एक पाओ (२५० ग्राम ) कुटटी में 300 ग्राम यह सूखा चारा मिला कर थोड़ा पानी दे कर संद दें और खाने दें इससे बकरियों का विकास बहुत अच्छा होगा और दिन में हरा चारा दें 7 से 8 महीने के भीतर बकरे का वजन 25 -30 kg का हो जाता है यह वजन आपके बकरियों के नसल पर भी निर्भर करता है।

सही समय पर प्रजनन :
जैसे ही बकरी गरम हो 14-22 घंटे के अंदर ही उसको बकरे से पाल खिलवा दें इससे गर्भ धारण में आसानी होती है । बच्चा देने के पष्चात 35 से 40 दिन के भीतर यदि वो दोबारा हीट में आ जाये तो दोबारा पाल खिलवाएं सही समय पर प्रजनन होना बहुत जरुरी है फार्म का प्रोडक्शन निर्भर होता है।

1 वर्ष का कुल खर्च: उपरोक्त सभी खर्चों को जोड़ कर एक वर्ष में बकरी पालन (100) के लिए कुल 2.5-3 लाख रूपये तक की आती है।

बकरी पालन से लाभ: इस व्यापार में प्रति महीने एक सामान  लाभ प्राप्त नही होता है|कई त्यौहारों बकरीद, ईद आदि के मौके पर इन बकरियों की मांग काफी बढ़ जाती है| शुरूआती दौर में यह लाभ प्रतिवर्ष लगभग 3.5 से 4 लाख रूपए का होता है. यह लाभ प्रति वर्ष बढ़ता जाता है। बकरियाँ जितनी अधिक बच्चे पैदा करती हैं, उतना अधिक लाभ प्राप्त होता है।

मार्केटिंग (Marketing): किसी भी बिज़नेस को करने में मजा तब आता है जब हमें उसका रिटर्न अच्छा मिले तथा इसके लिए हमे बकरियों को सही दाम में बेचना बहुत जरुरी है आप अपने लोकल मार्किट पर ज्यादा निर्भर हैं इसके साथ साथ आप को चाहिए के आप अपने बकरी फार्म का प्रचार अच्छे से करें ताकि आपको बल्क आर्डर आये जैसे शादी ब्याह में , हॉस्पिटल में , मिलिट्री कैंट में , बाड़े से बाड़े होटलों में आप संपर्क करें और उचित मूल्य प्राप्त करें| इस व्यापार को चलाने के लिए मार्केटिंग की आवश्यकता बहुत अधिक होती है. अतः आपको डेयरी फार्म से लेकर माँस के दुकानों तक  व्यापार पहुंचाना होता है। बकरियों से प्राप्त दूध को विभिन्न डेयरी फार्म तक पहुँचा सकते हैं। मांस की दुकानों में इन बकरियों को बेच कर अच्छा लाभ प्राप्त हो सकता है।
भारत में एक बड़ी संख्या की आबादी मांस खाती है। अतः माँस के बाजार में इसका व्यापार आसानी से हो सकता है। बकरी उत्पादन से संबंधित लघु उद्योग स्थापित किए जा सकते है। जैसे- दुग्ध उद्योग, मांस और चमड़ा उद्योग व वस्त्र उद्योग आदि। इससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे तथा साथ ही बकरी पालन को अपेक्षित स्तर पर लाया जा सकेगा। भूमिहीन बेरोजगारों के लिये भेड़ व बकरियों का पालन एक अच्छा व्यवसाय है। इस व्यवसाय को कम पूँजी से भी प्रारम्भ किया जा सकता है। इसलिये बकरियों को ‘गरीब की गाय’ कहा जाता है। बकरियों को चराने मात्र से ही उनका पेट भरा जा सकता है। गाय-भैसों से अलग, बकरी से जब चाहों तब दूध निकाल लो, इसी कारण इसे चलता-फिरता फ्रिज भी कहा जाता है। भेड़ तथा बकरियों के माँस पर किसी भी प्रकार का धार्मिक प्रतिबन्ध भी नहीं है। इसके अलावा भेड़ को ऊन उद्योग की रीढ़ की हड्डी माना जाता है।माँस, ऊन तथा चमड़ा उद्योग के लिये कच्चे माल का स्रोत होने के कारण इस व्यवसाय के द्वारा रोजगार की प्रबल सम्भावनाएँ हैं। साथ ही वैज्ञानिक ढंग से इनका पालन करने से अच्छी आय प्राप्त की जा सकती है। अतः यह व्यवसाय किसानों की आय दोगुना करने में सहायक है।