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गेहूं की पछेती बुवाई की तकनीक
गेहूं की पछेती बुवाई की तकनीक

गेहूं की पछेती बुवाई की तकनीक

अंकित कुमार, रवि वर्मा, प्रदीप कुमार कनोजिया (शोध छात्र)

डॉ. राजेश कुमार (सहायक प्राध्यापक),

शस्य विज्ञान विभाग, आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या (उत्तर प्रदेश)

किसानों की फसल पध्दति में कुछ ऐसी परिस्थितियां है, जिनकी वजह से गेहूँ देर से बोना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियां तब आती है, जब किसान गेहूँ को, दीर्घकालीन खरीफ की फसलें जैसे-धान, पेडी या कपास के बाद उगाता है। ऐसी परिस्थिति में किसानों को निश्चित कर लेना चाहिए, कि खरीफ की फसल में धान की ऐसी प्रजाति का उपयोग करना चाहिए, जिससे गेहूँ की फसल समय पर बोई जा सके। कभी-कभी खरीफ में मौसम के असामान्य होने के कारण धान की फसल पकने में अधिक समय लगता है जिसके कारण अधिकतर जगहों पर गेहूं की बुवाई में देरी हो जाती है। देर से बोने पर जमाव के समय कम तापमान तथा दाने बनते समय अधिक तापमान होने से फसल की बढ़वार पर काफी प्रभाव पड़ता है तथा फसल को अपना जीवन-चक्र कम समय में पूरा करना पड़ता है, जिससे पैदावार में कमी आती है। बोआई में विलम्ब करने से 3-4 क्विंटल/ है० प्रति सप्ताह की दर से पैदावार कम होती है। फिर भी नई सस्य पध्दतियों के द्वारा देर से बोने पर उपज में सुधार किया जा सकता है।

खेत की तैयारी
खरीफ की फसल को काटने से एक सप्ताह पहले खेत में हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। इस सिंचाई से खेत को तैयार करने में समय की बचत होती है। खरीफ की फसल की कटाई के बाद एक गहरी जुताई मिटटी पलटने वाले हल से तथा 2-3 हल्की जुताई हैरो से करें। और प्लॅकिंग कर दें।

देरी से बुवाई के लिए उन्नत किस्में
गेहूँ की अधिक उपज लेने के लिए रोगरोधी उन्नत किस्मों का ही प्रयोग करें। इनका बुवाई का उपयुक्त समय 25 नवम्बर से 25 दिसम्बर माना जाता है। एच्.डी. 3118, एच.डी.- 2985, पी.बी. डब्ल्यू- 757, डी.बी.डब्ल्यू.- 173, डी.बी.डब्ल्यू. 14, पी.बी.डब्ल्यू. 590, नरेन्द्र गेहू-1014, नरेन्द्र गेहू- 1076, नरेन्द्र गेहू- 2036 और यू पी- 2425 आदि प्रमुख है,

बीज उपचार
बीज के अच्छे अंकुरण के लिए बीज प्रमाणित व उसका शोधन कार्बोक्सिल एजेटोबेक्टर, पी.एस.बी. से उपचारित करना चाहिए।

बीज और बुवाई
गेहूं की बुवाई का इष्टतम समय बढ़ते क्षेत्रों में व्यापक रूप से भिन्न होता है। यह निम्न बातों पर निर्भर करता है, जैसे किस्म, मौसम की स्थिति, मिट्टी का तापमान, सिंचाई की सुविधा और भूमि की तैयारी। देर से बोए गए गेहूं में, केवल कम अवधि किस्मों का प्रयोग करें।

बीज दर एवं दूरी
देर से बोई गई फसल में कल्ले निकलने एवं वृद्धि के लिए कम समय मिलता है, इसलिए अधिक बीजों की आवश्यकता होती है। 125 कि०ग्रा० बीज प्रति हेक्टेयर की दर से पर्याप्त रहता है। कतार से कतार की दूरी 20-22 से०मी० तथा गहराई 5 से०मी० रखनी चाहिए। बोआई के बाद अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद की एक हल्की तह बिछाने से जमाव अच्छा व जल्दी होता है। स्ट्रा मल्च के द्वारा भी जमाव में सहायता मिलती है। 25 दिसम्बर के बाद बोआई करने पर अच्छा आर्थिक लाभ नहीं मिलता है। आमतौर पर, बीज दर 40 किलो प्रति एकड़ पर्याप्त है सामान्य बुवाई के लिए देर से बोई जाने वाली परिस्थितियों में सोनालिका जैसी मोटे अनाज वाली किस्मों के लिए, बीज की दर बढ़ाकर 50 किलो प्रति एकड़ की जाए।

सिंचाई
फसल अवस्था के आधार पर सिचाई की 5-6 अवस्थाये होती है। इन अवस्थाओं पर सिचाई करना आवश्यक होता है, अन्यथा फसल उत्पादन में कमी आती है। विलम्ब से बोआई की स्थिति में तापमान कम होने से मूल शिखर जड अवस्था (सी०आर०आई०) देर से आने पर पहली सिंचाई 25-30 दिन में करें। जनवरी में बोने पर 15 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करने पर अच्छे परिणाम मिले है। यदि एक सिंचाई उपलब्ध है, तो यह सिंचाई मूल शिखर जड़ अवस्था (सी०आर०आई०) पर देनी चाहिए। दो सिंचाई उपलब्ध होने की स्थिति में पहली मूल शिखर जड़ अवस्था पर तथा दूसरी बूट अवस्था (बाली निकलने के पहले) तथा तीन सिंचाई उपलब्ध होने पर पहली मूल शिखर जड़ अवस्था पर दूसरी बूट पर तथा तीसरी दुग्ध अवस्था पर करनी चाहिए। चार सिंचाइयों की उपलब्धता की स्थिति में पहली मूल शिखर जड अवस्था पर दूसरी लेट टिलरिंग, तीसरी बूट अवस्था तथा चौथी दुग्धावस्था पर सिंचाई करनी चाहिए।

उर्वरक
उर्वरको की मात्रा मृदा जांच कराने के बाद निर्धारित करें। जांच के अभाव में एक हैक्टर में 80 कि०ग्रा० नाइट्रोजन, 40 कि०ग्रा० फास्फोरस एवं 30 कि०ग्रा० पोटाश एवं 30 कि०ग्रा० सल्फर की मात्रा दें। फास्फोरस एवं पोटाश को कमी की दशा में ही दें। फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नाइट्रोजन की आधी मात्रा बोते समय बीज से 5 से०मी० गहराई पर एवं दूरी पर डाले। शेष नाइट्रोजन की मात्रा पहली सिंचाई के 24 घंण्टे पूर्व पर डालें।

खरपतवारों का नियंत्रण
बोआई के 4-5 सप्ताह बाद एक निराई-गुडाई करने से खरपतवार नष्ट किये जा सकते है। चौड़ी पती वाले खरपतवारों को नष्ट करने के लिए 2,4-डी सोडियम साल्ट 80% को 625 ग्रा० प्रति हेक्टर सक्रिय अवयव मात्रा को 600-700 लीटर पानी में घोलकर 25-30 दिन में छिडकाव करें। घास कुल के खरपतवारों को नष्ट करने के लिए सल्फोसल्फ्यूरान 75% डब्लू. जी. की 33 ग्रा० सक्रिय अवयव को प्रति हेक्टर की दर से 20-25 दिन के बाद 600-700 लीटर पानी में घोलकर छिडकें या फ्लूरोक्सीपामर (स्ट्रेने) के 100 ग्राम सक्रिय अवयव एवं आइसोप्रोटोरोन के आधा कि०ग्रा० सक्रिय अवयव के मिश्रण को 800-1000 लीटर पानी में घोलकर 30-35 दिन में छिड़काव करें।

विलंब की दशा में सीड ड्रिल द्वारा बीज की बुवाई अधिक लाभकारी

  • गेहूं की बुवाई अगेती धान तोरिया आलू गन्ना की पेडी एवं शीघ्र पकने वाली हॉरर के बाद की जाती है किंतु कृषि अनुसंधान की विकसित निम्न तकनीक द्वारा इन क्षेत्रों की भी उपाधि बहुत कुछ बढ़ाई जा सकती है।
  • पछेती बोआई के लिए क्षेत्र अनुकूलता सार प्रजातियों का चयन करें जिसका वर्णन पहले किया जा चुका है।
  • विलंब की दशा में जीरो टिलेज मशीन से बुवाई करें।
  • बीज दर 125 कि०ग्रा० प्रति हेक्टेयर एवं संतुलित मात्रा में उर्वरक 80:40:30 एनपीके आवश्यक प्रयोग करें।
  • बीज को रात भर पानी में भिगोकर 24 घंटे रखकर जमाव करके उचित मृदा पर बोया जाए।
  • पछेती गेहूं में सामान्यता की अपेक्षा जल्दी जल्दी से चाइयों की आवश्यकता होती है पहली सिंचाई जमा के 15 से 20 दिन बाद करके टॉप ड्रेसिंग करें। बाद की सिंचाई 15 से 20 दिन के अंतराल पर करें। बाली निकलने से दुग्ध अवस्था तक फसल को जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहे इस अवधि में जल की कमी का उपज पर विशेष को प्रभाव पड़ता है। सिंचाई हल्की करें, अन्य शस्य क्रियाएं सिंचित गेहूं की भांति अपनाएं।

इस विधि के निम्न लाभ है।

  • गेहूं की खेती में लागत की कमी आती है।
  • गेहूं की बुवाई 7 से 10 दिन जल्द होने से उपज में वृद्धि होती है।
  • पौधों की उचित संख्या तथा उर्वरक का श्रेष्ठ प्रयोग संभव हो पाता है।
  • पहली सिंचाई में पानी न लगने के कारण फसल बढ़वार में रुकावट की समस्या नहीं रहती है।
  • गेहूं के मुख्य खरपतवार गेहूंसा के प्रकोप में कमी हो जाती है।
  • निचली भूमि नहर के किनारे की भूमि एवं ईट भट्टे की जमीन में इस मशीन द्वारा समय से बुवाई की जा सकती है।

भंडारण
बीज में उपस्थित नमी की मात्र 10-11 प्रतिशत से कम होनी चाहिए, साथ ही मौसम का बिना इंतजार किये हुए उपज को बखारी या बोरो में भर कर साफ सुथरे स्थान पर सुरक्षित कर सूखी नीम कि पती का बिछावन डालकर करना चहिए या रसायन का भी प्रयोग करना चाहिए।