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थ्रोट चॉकिंग, केला का प्रमुख विकार आइए जानते है की इसे कैसे करेंगे प्रबंधित?
थ्रोट चॉकिंग, केला का प्रमुख विकार आइए जानते है की इसे कैसे करेंगे प्रबंधित?

डॉ एसके सिंह 
प्रोफेसर (पादप रोग) 
प्रधान अन्वेषक , अखिल भारतीय फल अनुसन्धान परियोजना एवं सह निदेशक अनुसन्धान
डा. राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर, बिहार  

केला में बंच सामान्य तरीके से न निकल कर कभी कभी आभासी तने को फाड़ते हुए असामान्य तरीके से निकलते हुए दिखाई देता है तो उसे थ्रोट चॉकिंग ( गला घोंटना ) कहते है। केले का यह एक शारीरिक विकार है और काफी हद तक अजैविक (एबायोटिक) कारणों  से होता  है। थ्रोट चॉकिंग (गला घोंटना) तब देखा जाता है जब गुच्छा आभासी तने ( स्यूडोस्टेम) के ऊपर से निकलने वाला होता है, लेकिन निकलने  के विभिन्न चरणों में फंस जाता है और गुच्छा (बंच) आभासी तने (स्यूडोस्टेम ) के ऊपर से निकलने  बजाय पौधे के आभासी तने के किनारे को फाड़ कर निकलते हुए दिखाई देता है। इस तरह से गुच्छे (बंच) निकलने की वजह से केला उत्पादक किसानो को भारी नुकसान होता है। कम गंभीर मामलों में शीर्ष 1 या 2 हाथ पौधे के गले में फंस जाते हैं जिससे फल खराब हो जाते हैं और अक्सर थोक बाजार में खारिज कर दिया जाता है।  चूंकि गुच्छा गले से बाहर नहीं आ पाता है, इसलिए गुच्छा को कवर करना मुश्किल होता है और सनबर्न क्षति के लिए अधिक संवेदनशील होता है। जिन गुच्छों को उभरने में कठिनाई का अनुभव होता है, उनमें आमतौर पर कई पत्ते छद्म तने के शीर्ष पर एक साथ 'गुच्छे' होते हैं। भारत के दक्षिणी भाग की तुलना में भारत के उत्तरी भाग में यह विकार बड़ी समस्या है। यह विकार भयावक रूप तब धारण कर लेता है जब केला की रोपाई बिहार एवं उत्तर प्रदेश में सितम्बर महीने में या उसके बाद करते है। यह विकार बौनी प्रजाति के केलो में ,लंबी प्रजाति की तुलना में अधिक लगता है। अत्यधिक ठंडक के समय जब बंच निकलता है तब यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है।

चोक जैसे विकार का प्रमुख कारण
गला घोंटना प्रकृति में मौसमी है। ठंड के मौसम के बाद यह आमतौर पर सर्दियों और शुरुआती वसंत में सबसे ज्यादा होता है। भारत का उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र केले में चोक की समस्या से सबसे ज्यादा प्रभावित है। हालांकि, यह जलभराव या गंभीर जल की कमी के बाद भी हो सकता है। दो कारक गुच्छों के बाहर निकलने  में वास्तविक कठिनाई में योगदान करते हैं 
i) आभासी तने (स्यूडोस्टेम) के अंदर गुच्छा वाले  तने के इंटर्नोड्स के बढ़ाव में कमी
ii) स्यूडोस्टेम के शीर्ष पर पत्ती के आधारों की कठोरता उचित गुच्छा उद्भव को रोक सकती है।  
केला की बौनी किस्में ,लंबी प्रजातियों की तुलना में इस विकार के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं। ड्वार्फ कैवेंडिश में टिश्यू कल्चर रोपण सामग्री की अधिकता भी चोक की समस्या को तेज करती है।
चोक जैसे विकार को कैसे प्रबंधित करें 
 1. केला के लंबी प्रजाति के किस्मों का चयन करें, जो चोक के प्रति कम संवेदनशील हों, जैसे, अल्पान, चंपा, चीनी चंपा, मालभोग,कोठिया, बत्तिसा इत्यादि।
 2. केला की रोपाई सही समय पर करें, इस प्रकार से रोपाई को प्रबंधित करे की केला में फूल अत्यधिक ठंडक के समय न निकले।
 3. केला की खेती के लिए सस्तुत खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग करें।
 4. जलभराव के प्रभाव को कम करने के लिए केले के खेत में उचित जल निकास का प्रबंध करें।
 5. विशेष रूप से गर्म-शुष्क मौसम में पानी की कमी से बचने के लिए नियमित सिंचाई करें।
 6. नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों का अधिक प्रयोग लाभकारी माना जाता है।
 7. चोक समस्या का मुकाबला करने के लिए वृद्धि को बढ़ावा देने वाले रसायनों का प्रयोग करें।