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केला उत्पादन की सम्पूर्ण तकनीक : एक नजर में
केला उत्पादन की सम्पूर्ण तकनीक : एक नजर में

डॉ एस के सिंह
प्रोफ़ेसर सह मुख्य वैज्ञानिक (पौधा रोग)
सह निदेशक अनुसंधान
प्रधान अन्वेषक अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (फल)
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय , पूसा , समस्तीपुर, बिहार

कृषि जलवायु 
केला की खेती सफलतापूर्वक आर्द्र उपोष्ण एवं उष्ण क्षेत्रों में समुद्र की सतह से 2000 मीटर की उचाई तक की जा सकती है। भारत में 8 से लेकर 28 डिग्री उत्तर अक्षांश तक 12-38 डिग्री  सेल्सीयस तापक्रम एवं 500-2000 मीलीलीटर वार्षिक वर्षा  वाले क्षेत्रों में इसकी खेती होती है। उच्च अक्षांश में केला की खेती हेतु कुछ ही प्रजातियों को लगाया जा सकता है जैसे, भिरूपाक्षी केला की खेती के लिए आर्दश तापक्रम 200 से 300 सेल्सियस है। इसके उपर या नीचे केला की वृद्धि रूक जाती है। 12 डिग्री सेल्सियस से नीचे के तापक्रम पर पौध की वृद्धि रूक जाती है। क्योंकि केले के पौधे के अन्दर का दुध जैसा स्राव जम जाता है। यदि केला का घौद जाड़े के मौसम में निकलता है, तो वह जाड़ा की वजह से प्रभावित होता है। तना के भीतर फंसा हुआ प्रतीत होता है और कभी-कभी विलम्ब से तना को फाड़ते हुए बाहर निकलता है। अतः अत्यधिक जाड़ा एवं गर्मी दोनों ही केला के पौधों के लिए हानिकारक हैं। खेत में जल जमाव की स्थिति भी इसकी वृद्धि को प्रभावित करती है, जबकि केला पानी को अधिक पसन्द करने वाली फसल है। केले के पौधे की गर्म एवं तेज हवाओं से रक्षा करने के उदेश्य  से वायु रोधक पौधे या वृक्ष खेत के किनारे या मेड़ पर लगाये जाने चाहिए। केला को 12-13 डिग्री सेल्सीयस पर ही एक स्थान से दुसरे स्थान पर ले जाना चाहिए क्योंकि उक्त तापक्रम पर श्वसन सबसे  कम होता है। उच्च तापक्रम पर पौधों के झुलसने की सम्भावना रहती है। प्रकाश  एवं केला की वृद्धि के मध्य कोई सम्बन्ध स्थापित नही हो सका है। लेकिन गर्मियों में 50 प्रतिशत छाया में भी केला की खेती की जा सकती है। वर्षा के जल पर आधारित खेती में भी 25 मीमी वर्षा/सप्ताह पर्याप्त  है अन्यथा सिचाई की व्यवस्था करनी पड़ती है।

भूमि का चयन
केला की खेती विभिन्न प्रकार की भूमि में किया जा सकता है बशर्ते  उस भूमि में पर्याप्त उर्वरता, नमी एवं अच्छा जल निकास हो । किसी भी मृदा को केला की खेती के लिए उपयुक्त बनाने के लिए आवश्यक है कि मृदा की संरचना को सुधारा जाय, उत्तम जल निकास की व्यवस्था किया जाय। यद्यपि कि केला 4.5 से लेकर 8.0 तक पी.एच मान वाले मृदा में उगाया जा सकता है लेकिन इसकी खेती के लिए मृदा का सर्वोत्तम पी. मान 6 से लेकर 7.5 के मध्य होता है। मृदा की संरचना में आषातीत सुधार के लिए आवश्यक  है कि उसमें कार्बनिक पदार्थो को भरपूर मिलाया जाय। भारी मृदा में उत्तम जल निकास की व्यवस्था तथा भूमि में पोषक तत्वों की उपयुक्त स्तर बनाये रखने के लिए खाद एवं उर्वरक की पर्याप्त मात्रा डालना चाहिए। एक ऐसी मृदा जिसमें अम्लीयता ज्यादा न हो, कार्बनिक पदार्थ पर्याप्त हो, नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश की मात्रा समुचित हो, केला की खेती के लिए उपयुक्त होती है।

प्रजातियाँ 
भारत में लगभग 500 किस्में उगायी जाती हैं लेकिन एक ही किस्म का विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न नाम है। राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के पास केला की 79 से ज्यादा प्रजातियाँ बिरौली एवं केला अनुसंधान केन्द्र हाजीपुर में संग्रहित हैं। केला का पौधा बिना शाखाओं वाला कोमल तना से निर्मित होता है, जिसकी ऊचाई 1.8 मी0 से लेकर 6 मी0 तक होता है। इसके तना को झूठा तना या आभासी तना कहते हैं क्योंकि यह पत्तियों के नीचले हिस्से के संग्रहण से बनता है। असली तना जमीन के नीचे होता है जिसे प्रकन्द कहते हैं। इसके मध्यवर्ती भाग से पुष्पक्रम निकलता है।

रोपण सामग्री का चुनाव
केला का प्रवर्धन सकर या प्रकन्द द्वारा होता है। ऊतक संवर्धन द्वारा तैयार पौधे भी रोपण हेतु प्रयोग किये जाते हैं। सकर दो प्रकार के होते हैं। 
नुकीली पत्तियों वाले सकर 
ये सकर पतली व नुकीली पत्तियों वाले (तलवार की तरह) होते है। देखने में कमजोर लगते है, परन्तु प्रवर्धन के लिए अत्यधिक उपयुक्त होते हैं।
वाटर संकर यानि चौड़ी पत्ती वाले सकर
यह सकर चैड़ी पत्तियों वाले होते हैं। देखने में ये मजबूत लगते हैं लेकिन आन्तरिक रूप से ये कमजोर होते हैं। प्रवर्धन हेतु इनका प्रयोग वर्जित है। सकर सदैव स्वस्थ उच्च गुणवत्ता वाली किस्मों के पौधों से ही लेना चाहिए जिसमें रोग एवं किड़ों का प्रकोप बिल्कुल न हो। दो तीन माह पुराना ओजस्वी सकर प्रवर्धन हेतु अच्छा होता है। केले के प्रकन्द से ही नए पौधे तैयार हो सकते हैं। बहुत अधिक पौधे जल्द तैयार करने के लिए पूरा प्रकन्द या इसके टुकड़े काटकर प्रयोग में लाते हैं। इनसे पौधा बनने में थोड़ा अधिक समय अवश्य  लगता है परन्तु पहली फसल के पौधे अधिक समरूप होते हैं। प्रकन्द का औसत वजन लगभग एक से डेढ़ किलोग्राम होना चाहिए। सकर की खुदाई  के बाद उसकी सफाई करने के पश्चात्  उसका कार्बेन्डाजीम (0.1%)  मोनोक्रोटोफास (0.2%) के जलीय घोल में 90 मिनट तक डालकर शोधन करते हैं। तत्पश्चात  सकर को 7 दिन तक धूप मे रखकर उसको जीवाणु/फफूँद विहीन कर देते हैं। जहाँ सूत्रकृमि की समस्या हो वहाँ पर सकर को गाय के गोबर मे डुबाने के पश्चात  नीम आधारित कीटनाशक से शोधन के पश्चात , नीम की खली @ 2-3 किलोग्राम/गड्ढा प्रयोग करना चाहिए, रोपण हेतु सकर के चयन मे विशेष  सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि रोपण सामग्री के समान नही होने की वजह से केला की फसल भी एक समान नही होती है, जिससे उसकी कटाई के समय में भारी अन्तर आता है तथा फसल का प्रबन्धन कठिन हो जाता है।

ऊतक संवर्धन विधि द्वारा केला का प्रवर्धन
विगत कुछ वर्षो से ऊतक संवर्धन (टिसु  कल्चर) विधि द्वारा केले की उन्नत प्रजातियों के पौधे तैयार किये जा रहे हैं। इस विधि द्वारा तैयार पौधों से केलों की खेती करने के अनेकों लाभ हैं। ये पौधे स्वस्थ, रोग रहित होते है। पौधे समान रूप से वृद्धि करते है। अतः सभी पौधों में पुष्पन, फलन, कटाई एक साथ होती है, जिसकी वजह से विपणन में सुविधा होती है। फलों का आकार प्रकार एक समान एवं पुष्ट होता है। प्रकन्दों की तुलना में ऊतक संवर्धन द्वारा तैयार पौधों में फलन लगभग 60 दिन पूर्व हो जाता है। इस प्रकार रोपण के बाद 13-15 माह में ही केला की पहली फसल प्राप्त हो जाती है। जबकि प्रकन्दों से तैयार पौधों से पहली फसल 16-17 माह बाद मिलती है। ऊतक संवर्धन विधि से तैयार पौधों से औसत उपज 30-35 किलोग्राम प्रति पौधा तक मिलती है। पहली फसल लेने के बाद दूसरी खुटी फसल (रैटून) में गहर 8-10 माह के भीतर पुनः आ जाती है। इस प्रकार 24-25 माह में केले की दो फसलें ली जा सकती हैं जबकि प्रकन्दों से तैयार पौधों से सम्भव नहीं है। ऐसे पौधों के रोपण से समय तथा धन की बचत होती है। परिणाम स्वरूप, पूँजी की वसूली शीघ्र होती है। लेकिन उपरोक्त सभी लाभ तभी मिलेगें जब मातृ पौधों का चयन बहुत ही सावधानी से किया जाय तथा बाद के देखभाल में भी पूरा ध्यान दिया जाय। ऊतक सवर्धन विधि द्वारा पौधों को तैयार करने के विभिन्न चरण निम्नलिखित है जैसे, मातृ पौधों  का चयन, विषाणु मुक्त मातृ पौधों को चिन्हित करना, पौधों से संक्रमण विहिन ऊतक संवर्धन तैयार करना, प्रयोगशाला में संवर्धन का बहुगुणन तथा नवजात पौधों को सख्त बनाना, वातावरण के अनुरूप पौधों को बनाना तथा आनेवाली व्यवहारिक समस्याओं का अध्ययन करना इत्यादि।

मातृ पौधों की पहचान 
ऊतक संवर्धन की सफलता तथा अधिकतम लाभ हेतु मातृ पौधों का चयन करना एक महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि मातृ पौधे के ऊतक से ही नये पौधे ऊतक संवर्धन विधि द्वारा तैयार किये जाते हैं। सर्वप्रथम आवष्यकता इस बात कि है कि ऐसे मातृ पौधों का चयन किया जाय जो अपनी प्रजाति के सम्पूर्ण गुण रखता हो, उच्च उत्पादकता हो तथा विषाणु रोगों से मुक्त हो। मातृ पौधों के चयन के समय निम्नलिखित बिन्दुओं को ध्यान में रखना चाहिए: 

  • पौधा स्वस्थ हो तथा जिसकी पुष्टि उसकी सामान्य बढ़बार की दर से होती है।
  • आभासी तना पुष्ट एवं मजबूत होना चाहिए जो पूरे पौधे को एक मजबूत आधार दे सकें।
  • पौधे मे औसतन 13-15 स्वस्थ पत्तियाँ होनी चाहिए जो पौधे के सक्रिय वृद्धि अवस्था मे आवष्यक प्रकाष संष्लेषण की क्रिया को सम्पन्न कर सकें।
  • पौधे के अन्दर ऐसा गुण होना चाहिए, जिससे कम से कम समय फसल के तैयार होने में लगें।
  • अपनी प्रजाति के अन्य पौधों के औसत से ज्यादा उपज क्षमता होनी चाहिए।
  • फल की गुणवत्ता, अपनी प्रजाति के गुणों का प्रतिनिधित्व करने वाला होना चाहिए।
  • पौधे पर कोई भी विषाणुजनित रोगों का लक्षण नही दिखाई देना चाहिए।

विषाणु मुक्त मातृ पौधों को चिन्हित करना 
ऐसे मातृ पौधों का चयन करना चाहिए जो विषाणु रोगों से मुक्त हो तथा जिसकी पुष्टि लक्षणों एवं सेरो-डायगनोस्टिक विधियों द्वारा होती हो। स्वस्थ रोपण सामग्री के चयन की प्राथमिक विधि में रोगों को उनके द्वारा उत्पन्न लक्षणों को देख कर पहचानते हैं। क्योंकि प्रत्येक विषाणु द्वारा पौधे के वृद्धि की विभिन्न अवस्थाओं में एक निश्चित लक्षण उत्पन्न होता है, जिसकी विस्तृत चर्चा रोग के अध्ययन के समय किया जायेगा। विषाणु मुक्त मातृ पौधों को चिन्हित करना ऊतक संवर्धन द्वारा विषाणु मुक्त पौधों को पैदा करने हेतु अत्यावष्यक है। विषाणु मुक्त होने के लिए चिन्हित करने की एक विशिष्ट प्रक्रिया है जिसे अपनाना चाहिए। विषाणु के लक्षणों की पुष्टि अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी द्वारा सुनिश्चित  कर लेना चाहिए।

चिन्हित मातृ पौधे से असंक्रमित संवर्धन की शुरूआत
यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण अवस्था है, इसमें मातृ पौधे से कोषिका को लेकर कृत्रिम खाद्य पर रखते है क्योंकि यह एक मृतजीवी अवस्था है तथा रोग के प्रति अति संवेदनशील भी होती है। प्रजाति के अनुसार केला में अपने एक जीवन काल में कम से कम 12 से लेकर 100 सकर पैदा करने की क्षमता होती है। जिसमें  से कुछ वाटर सकर यानि पानी सकर होती हैं जिनकी पत्तिया गहरी हरी, चैड़ी होती है। जबकि दूसरे सकर में पत्तियाँ तलवार जैसी होती हैं। तथा आभासी तना मजबूत होता है। ऐसे ही सकर को रोपण हेतु प्रयोग में लाते है। तीन महीने पुराने तलवार नुमा पत्ती वाले पौधे के सकर जिनका वजन 500-700 ग्राम का होता है को ऊतक संवर्धन हेतु प्रयोग में लाते है। चयनित सकर को मातृ पौधे से अलग करते है तथा मृदा से बाहर निकालते हैं। सकर के विषाणु मुक्त होने के लिए आवष्यक जाँच करके चिन्हित करते हैं। सकर के विषाणु मुक्त होने के पश्चात उसको अन्य सूक्ष्मजीवों से भी मुक्त होना आवष्यक है। इसके लिए सकर की सतह को रसायनों द्वारा सूक्ष्मजीवविहिन (निर्जर्मीकृत) करते है। तत्पश्चात  सकर से ऊतक को लेकर संवर्धन माध्यम पर स्थानान्तरित करते हैं। संक्रमण रोकने के लिए संवर्धन माध्यम में स्ट्रेप्टोसाइक्लीन (0.1प्रतिशत) को मिलाना चाहिए, जिससे अवांछित जीवाणु की वृद्धि रूक जाती है। संवर्धन  माध्यम मे जैसे ही किसी भी प्रकार का संक्रमण निवेशन के 3 या 5 वें दिन दिखाई दे संवर्धन माध्यम को छाँट कर अलग कर देना चाहिए। इस प्रकार से हम अपने बहुमूल्य सामग्री को संक्रमण मुक्त रख पाते हैं।
इस प्रकार से 7 बार स्थानान्तरित करने के उपरान्त निवेषित ऊतक मे जड़ निकलते हुए दिखाई देती है। जड़ युक्त तना जब कृत्रिम संवर्धन में 6-10 सेमी का हो जाता है तब उसे वृद्धि कक्ष (ग्रोथ चैम्बर) में स्थानान्तरित करते हैं और उपयुक्त समय तक उस नवजात पौध को कठोरीकृत करते हैं, तत्पश्चात  इस पौध को मृदा मे स्थानान्तरित करने के बाद द्वितीयक कठोरीकृत करते हैं, आवश्यक खाद, पानी तथा फसल सुरक्षा के बाद पौध को खेत में स्थानान्तरित करते हैं।

मृदा प्रबन्धन
केला का जड़ तन्त्र उथला होता है जो खेती करने की वजह से क्षतिग्रस्त हो सकता है, अतः सतह पर आच्छादित होने वाली फसलों को नही लेने की सलाह दी जाती है। तथापि केला के शुरूआती चार महीनों के लिए अल्प अवधि की फसलों को अन्तरवत्र्तीय फसल के रूप में लेने की सस्तुति की जाती है जैसे, मूली, फूलगोभी, पत्तागोभी, अरवी, ओल, हल्दी, अदरक, लोबिया एवं गेंदा इत्यादि। कभी भी कद्दूवर्गीय सब्जियों को अन्तरवर्तीय फसल के रूप में नही लेना चाहिए क्योंकि इन फसलों में विषाणु रोगों की अधिकता होती है।

बाग संस्थापन
केला की खेती से अधिकाधिक आय प्राप्त करने हेतु खेत की तैयारी, बाग लगाने का समय, पौधे, तथा पंक्ति से पंक्ति दूरी, सकर का चुनाव या ऊतक सवर्धन द्वारा तैयार पौधों का चयन इत्यादि बिन्दुओं पर विशेष  ध्यान देना आवश्यक  होता है।

भूमि की तैयारी
गड्ढा खोदने से पूर्व खेत की 2-3 जुताई करके खरपतवार खेत से निकाल देना चाहिए तथा मिट्टी को भुरभुरी बना देना चाहिए। खेत की सफाई के लिए खरपतवार को कभी भी जलाना नहीं चाहिए। इसके बाद 30 x30x30 सें. मी. या 45 x45x45 सें. मी. आकार के गड्ढें, 1.5 x1.5  मीटर (बौनी प्रजाति हेतु) या 2 x2 मीटर (लम्बी प्रजाति हेतु) की दूरी पर खोद लेते हैं। गड्ढा खुदाई का कार्य मई-जून में कर लेना चाहिए। खुदाई के उपरान्त उसी अवस्था में गड्ढों को 15 दिन के लिए छोड़ देना चाहिए। कड़ी धुप की वजह से हानि कारक कीट, फफूँद, जीवाणु व कीट नष्ट हो जाते हैं। गड्ढों को रोपण से 15 दिन पूर्व कम्पोस्ट खाद एवं मिट्टी के (1:1) मिश्रण से भर देना चाहिए। गड्ढों की मिट्टी 20 किलोग्राम सड़ी गोबर की खाद (कम्पोस्ट) एक किलो अंडी की या नीम की खल्ली, 20 ग्राम फ्यूराडान मिट्टी में मिला देना चाहिए तथा गड्ढा भर देना चाहिए। समस्याग्रस्त मृदा में इस मिश्रण के अनुपात को बदला जा सकता है जैसे, अम्लीय मृदा में चूना, सोडीयम युक्त मृदा में जिप्सम तथा उसर मृदा में कार्बनिक पदार्थ एवं पाइराइट मिलाने से मृदा की गुणवत्ता में भारी सुधार होता है। गड्ढा भरने के उपरान्त सिंचाई करना आवश्यक  है, जिससे गढ्ढो की मिट्टी बैठ जाय।

रोपण
ऊतक संवर्धन द्वारा तैयार पौधों का रोपण 
पालीथिन थैले में 8-10 इंच  उचाई के ऊतक संवर्धन द्वारा तैयार पौधे रोपण हेतु उपयुक्त होते हैं। पालीथिन के पैकेटों को तेज चाकू या ब्लेड से काटकर अलग कर देते हैं, तथा पौधों को निकाल लेते है, ध्यान यह देना चाहिए कि मिट्टी के पिण्डी न फुटने पाये। पहले से भरे गये गढ्ढो के बीचो-बीच मिट्टी के पिन्डी के बराबर छोटा सा गढ्ढा बनाकर पौधे को सीधा रख देना चाहिए। पौधे की जड़ों को बिना हानि पहुचाएँ पिन्डी के चारों ओर मिट्टी भरकर अच्छी प्रकार दबा देना चाहिए ताकि सिंचाई के समय मिट्टी में गढ्ढे न पड़ें। बहुत अधिक गहराई में रोपण कार्य नहीं करना चाहिए। केवल पौधे की पिन्डी तक ही मिट्टी भरना चाहिए।

केला रोपण की दूरी
केला में पौधे से पौधा एवं पंक्ति से पंक्ति की दूरी विभिन्न कारकों द्वारा प्रभावित होती है जैसे, केला की किस्म, खेती करने की विधि, मृदा की उर्वरता इत्यादि। केला की परम्परागत खेती  में विभिन्न किस्मों के लिए रोपण की दूरी भी भिन्न-भिन्न निर्धारित की गई है जो निम्नवत है।

प्रजाति के अनुसार रोपण की दूरी 
प्रजाति-  दूरी- प्रति हेक्टेयर पौधों की संख्या
रोबस्टा, डवार्फ कावेन्डीश  -1.5 x 1.5 मी0- 4444
पूवान, मोन्थन, मालभोग, ने पूवान- 2.0 x1.0 मी0- 2500
केला एवं मसाला (हल्दी या अदरक) की मिश्रित खेती- 3.6 x 3.6 मी0-750

केला की सघन रोपण विधि
यह केला उत्पादन की एक नयी विधि है। इसमें उत्पादन बढ़ाने हेतु प्रति इकाई क्षेत्रफल केला के पौधों की संख्या बढ़ाने की सलाह दी जाती है। इस विधि में उत्पादन तो बढ़ता है, लेकिन खेती की लागत घटती है। उर्वरक एवं पानी का समुचित एवं सर्वोत्तम उपयोग हो जाता हैं। राजेन्द्र कृषि विष्वविद्यालय एवं देष के अन्य हिस्सों में किये गये प्रयोगों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि रोबस्टा एवं बसराई प्रजाति के पौधों की संख्या/हेक्टेयर बढ़ाकर अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। तमिलनाडु विश्वविद्यालय   में हुए प्रयोग के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया है कि प्रकन्दों की संख्या एक स्थान पर एक न रखकर तीन रखकर तथा पौधों से पौधों तथा पंक्ति से पंक्ति की दूरी 2 x3 मीटर रख कर प्रति हेक्टेयर 5000 पौधा रखा जा सकता है। इसमें नेत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाष की 25 प्रतिशत मात्रा परम्परागत रोपण की तुलना में बढ़ाना पड़ता है। इस व्यवस्था के फलस्वरूप उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।

आजकल सघन रोपण विधि के अन्तर्गत कावेन्डीश  समूह के केलों (ऊतक संवर्धन द्वारा तैयार पौधें) को जोड़ा पंक्ति पद्धति में लगाने की संस्तुति की जाती है। इस विधि में सिचाई टपक विधि द्वारा करने से सलाह दी जाती है। इसके कई फायदे है। केला की प्रथम फसल  मात्रा 10-11 महीने में ली जा सकती है तथा उपज कम से कम 60 टन तक मिल जाती है।

रोपण का समय 
केला रोपण का समय विभिन्न कारकों द्वारा निर्धारित होता है जैसे, प्रजाति, क्षेत्र विषेष की जलवायु, बाजार की आवष्यकता इत्यादि। पष्चिमी तथा उत्तरी भारत में केला लगाने का सबसे अच्छा समय दक्षिणी-पष्चिमी मानसून की शूरूआत यानि जून-जुलाई का महीना है। दक्षिण भारत के केरल के मालाबार हिस्से में सितम्बर-अक्टूबर में तथा इसके कुछ अन्य क्षेत्रों  में दिसम्बर माह में केला लगाते हैं। पालिनी की निचली पहाड़ियों पर अप्रैल में, कावेरी नदी के किनारों पर फरवरी-मार्च तथा तंजोर जिले में केला दिसम्बर-जनवरी के महीने में लगाया जाता है। मैसूर, आन्ध्र प्रदेश तथा उड़ीसा में केला जून माह के अन्त में लगाते है। पष्चिम बंगाल, बिहार तथा आसाम में मानसून शुरू होने के बाद जून-जुलाई में केला लगाते हैं। बिहार में केला अगस्त के प्रथम सप्ताह के बाद नहीं लगाना चाहिए। क्योंकि इस प्रकार लगाये गये केले में गहर जाड़ों में निकलती है, जो अत्यधिक ठंढ़क की वजह से असामान्य निकलती है। साथ ही अगस्त में लगाई गयी फसल की रोपाई से कटाई तक की अवधि लम्बी हो जाती है क्योंकि शर्दी के कारण फलों को तैयार होने में अधिक समय लगता है।

भारत के विभिन्न प्रदेशों में केला रोपण का समय 
प्रदेश- प्रजाति- रोपण का समय
बिहार- कावेन्डीश, अल्पान, मालभोग, कोठिया- जून-जुलाई, सितम्बर-अक्टूबर
तमिलनाडु- पूवान, रास्थली, कारपुरावाल्ली- जनवरी-मार्च, जून- अगस्त, नवम्बर-दिसम्बर
केरल- नेद्रन, पूवान, रास्थली- अगस्त-अक्टूबर, दिसम्बर-जनवरी
आंध्र प्रदेश- चकारा केली, पूवान- अगस्त - नवम्बर
कर्नाटक- रोबस्टा, डवार्फ कावेन्डीश, ने पूवान -अप्रैल-जून, नवम्बर-फरवरी
महाराष्ट्र- डवार्फ  कावेन्डीश, रोबस्टा- मई-जुलाई, सितम्बर-अक्टूबर
गुजरात-डवार्फ कावेन्डीश- मई - जुलाई
उत्तर पूर्वी क्षेत्र- जहाजी, काचकेल, हेांडा, डिगजोवा- मार्च-अप्रैल, सितम्बर-अक्टुबर