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तीन से चार महीने में फसल तैयार, किसान की आय बढ़ेगी मेंथा की खेती से

किसानों की आय बढ़ाने के लिए मेंथा की खेती एक बेहतर विकल्प है। इसकी खेती करके किसान अन्य फसलों की तुलना में बेहतर आय कर सकता है। BHU कृषि विज्ञान संस्थान के FISI विभाग के प्रोफेसर जेएन बोहरा ने बताया कि मेंथा की खेती पारंपरिक खेती से अधिक लाभ कमाया जा सकता है। इसका तेल दवा और सुगंध के लिए उपयोग किया जाता है। इस समय बाजार में मेंथा तेल की कीमत 1600 रुपये से 1700 रुपये प्रति लीटर है। प्रो. बोहरा ने कहा कि किसानों को इसकी खेती के लिए प्रेरित भी किया जाता हैं। अच्छी जल निकासी वाली बलुई मिट्टी इसके उत्पादन के लिए उपयुक्त है। इसकी खेती तीन से चार महीने में तैयार हो जाती है। इसके बाद फसल को काटकर धान की रोपाई की जाती है। मेंथा के जड़ों की सबसे पहले बुवाई की जाती है। पौधे तैयार होने के बाद मार्च-अप्रैल में रोपाई की जाती है।

खाद की मात्रा: खेत को तैयार करते समय, दस टन गोबर की खाद, फास्फोरस 60 किग्रा, पोटास 60 किग्रा और 125 किग्रा नत्रजन को तीन भागों में बांटा जाता है। इससे किसान अधिक उत्पादन ले सकता है।

सिंचाई: इसकी खेती में सामान्य रूप से 10 से 12 सिंचाई की आवश्यकता होती है। अच्छे उत्पादन के लिए 10-15 दिनों के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए। बहुत गर्म होने पर भी पानी 10 दिन में दिया जा सकता है।

कटाई: वर्षा ऋतु में मेंथा की फसल कटाई नहीं करनी चाहिए। पहली कटाई रोपाई के 100 से 110 दिनों के बाद की जाती है। इस समय के दौरान यह देखा गया है कि फसल में 50% फसल में फुल आ गए हो। फसल के बाद, पौधों को 2 से 3 घंटे तक धूप में सुखाना चाहिए। इसके बाद आसवन विधि के माध्यम से मशीन से तेल निकाला जाता है।

उत्पादन और आय: मेंथा की खेती करके किसान प्रति हेक्टेयर 42 से 44 टन फसल प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार, लगभग रु. 195,000 प्रति हेक्टेयर लाभ प्राप्त किया जा सकता है।