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गेहूं की खेती करने वाले किसान भाइयों के लिए उपयोगी सलाह
गेहूं की खेती करने वाले किसान भाइयों के लिए उपयोगी सलाह

Wheat Cultivation: गेहूं की खेती के लिये दोमट बलुई दोमट और मटियार दोमट मृदा उपयुक्त होती है। मृदा ऐसी हो, जिसकी जल धारण क्षमता अधिक हो एवं पी-एच मान 7-7.5 होना चाहिये। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के पश्चात 3-4 जुताइयां मिट्टी पलटने वाले हल या कल्टीवेटर से करने के बाद पाटा लगाकर खेत को अच्छी तरह समतल कर लेना चाहिये। खेत की तैयारी करते समय यह ध्यान रखें कि बुआई के समय नमी की मात्रा उपयुक्त हो अन्यथा जमाव पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। अगर नमी उचित मात्रा में नहीं है, तो बुआई से पूर्व पलेवा अवश्य कर लें।

गेहूं की बुवाई का उचित समय
उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्रों में सिंचित दशा में गेहूं की बुआई का उपयुक्त समय नवंबर का प्रथम पखवाड़ा है। उत्तरी-पूर्वी भागों में मध्य नवंबर तक गेहूं की बुआई हर हाल में पूरी कर लें। देर से बोने पर उत्तरी-पश्चिमी मैदानी क्षेत्रों में 25 दिसंबर के बाद तथा उत्तरी-पूर्वी मैदानी क्षेत्रों में 15 दिसंबर के बाद गेहूं की बुआई करने से उपज में भारी नुकसान होता है। इसी प्रकार बारानी क्षेत्रों में अक्टूबर के अन्तिम सप्ताह से नवंबर के प्रथम सप्ताह तक बुआई करना उत्तम रहता है। यदि भूमि की ऊपरी सतह में संरक्षित नमी प्रचुर मात्रा में हो तो गेहूं की बुआई 15 नवंबर तक कर सकते हैं। बीज साफ, स्वस्थ एवं खरपतवारों के बीजों से रहित होना चाहिए। सिकुड़े हुए तथा छोटे एवं कटे बीजों को निकाल देना चाहिए। हमेशा आधार एवं प्रमाणित बीजों को ही बोना चाहिए।

गेहूं की उन्नत किस्में
गेहूं की खेती की सफलता एवं उससे प्राप्त लाभ विशेष रूप से उन्नत प्रजातियों के चयन पर आधारित है। सिंचित अवस्था में समय से बुआई (10 नवंबर से 25 नवंबर) के लिए संस्तुत उन्नत प्रजातियां जैसे-करण वैष्णवी या डीबीडब्ल्यू-303 (औसत उत्पादन 81.2 क्विंटल/हैक्टर एवं आनुवंशिक उपज क्षमता 97.4 क्विंटल / हैक्टर), करण नरेन्द्र या डीबीडब्ल्यू-222 (औसत उत्पादन 61.3 क्विंटल / हैक्टर), करण श्रिया या डीबीडब्ल्यू-252 (औसत उत्पादन 55.0 क्विंटल/हैक्टर), एचडी 2824. एचडी 2894. एचडी 4713. डीवीडब्ल्यू 17. डीबीडब्ल्यू 39. सीबीडब्ल्यू 38. पीबीडब्ल्यू 502, पीबीडब्ल्यू 550, पीबीडब्ल्यू 621, पीबीडब्ल्यू 443, पीबीडब्ल्यूएस 542, पीबीडब्ल्यू 396, डब्ल्यूएच 896, डब्ल्यू एच 542, के 9107, एचपी 1761, एचपी 1761, एनडब्ल्यू 1012, के 307, राज 4120, राज 4229, डीबीडब्ल्यू 110, डीबीडब्ल्यू 39. जी डब्ल्यू 366, डीडब्ल्यू 273 हैं, जिनकी औसत उपज 50-55 क्विंटल / हैक्टर है।
सिंचित अवस्था में देरी से बुआई (25 नवंबर से 25 दिसंबर) के लिए उन्नत प्रजातियां जैसे-एचडी-3018. एचडी-3167. (नई किस्में व सीमित सिंचाई), एचडी-3117. एचडी-3059. एचडी-3118. एचडी 2985, एचडी 2643, एचडी 2824. एचडी 2864, एचडी 2932, डब्ल्यूआर 544, राज 3765 हैं, जिनकी औसत उपज 40-45 क्विंटल / हैक्टर है। 

गेहूं की बुवाई का तरीका
सीडड्रिल से बुआई काफी लोकप्रिय हो रही है। इससे बीज की गहराई तथा पंक्तियों की दूरी नियंत्रित रहती है तथा इससे अंकुरण अच्छा होता है। विभिन्न परिस्थितियों में बुआई हेतु फर्टी-सीडड्रिल, जीरो-टिल ड्रिल, फर्ब ड्रिल आदि मशीनों का प्रचलन बढ़ रहा है। इसी प्रकार फसल अवशेष को बिना साफ किए हुए अगली फसल के बीज बोने के लिए रोटरी-टिल ड्रिल एवं हैप्पी सीडर भी उपयोग में लाई जा रही हैं। सामान्यतः गेहूं की फसल में पंक्तियों की दूरी बोने के समय, मृदा की दशा एवं सिंचाइयों की उपलब्धता पर निर्भर करती है। सिंचित तथा समय से बोने हेतु पंक्तियों की दूरी 23 सें.मी. एवं देरी से बोने पर तथा ऊसर मृदा में पंक्तियों की दूरी 15-18 से.मी. रखनी चाहिए। सामान्य दशाओं में बौनी प्रजाति के गेहूं को लगभग 5 से.मी. गहरा बोना चाहिए। ज्यादा गहराई में बोने से अंकुरण तथा उपज पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

बीज उपचार
बीजजनित रोगों से बचाव हेतु 2.0 ग्राम वीटावैक्स या 2.5 ग्राम कार्बेन्डाजिम या 2.0 ग्राम थीरम या 2.5 ग्राम | मैन्कोजेब नामक दवा से बोने से पहले प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करें। ईयर कॉकल व कंडुआ रोग से बचाव हेतु रोगग्रस्त बीज को 20 प्रतिशत नमक के घोल में डुबोकर नीचे बचे स्वस्थ बीज को अलग छांटकर साफ पानी से धोयें। इसके बाद सुखाकर बुआई करें। दीमक नियंत्रण हेतु 600 मि.ली. क्लोरपायरीफॉस 20 ई.सी. को आवश्यकतानुसार पानी में घोलकर 100 कि.ग्रा. बीजों पर समान रूप से छिड़ककर उपचारित करें। 

गेहूं की फसल में उगने वाले प्रमुख खरपतवार
गेहूं की फसल में पाये जाने वाले खरपतवार मुख्यतः दो श्रेणियों में रखे जाते हैं। एक संकरी पत्ती वाले व दूसरे चौड़ी पत्ती वाले गेहूं में उगने वाले मुख्य खरपतवार जैसे -मोथा, बथुआ, गुल्ली डंडा, जंगली जई, खरतुवा, हिरनखुरी, कृष्णनील आदि हैं। खरपतवारों का नियंत्रण खरपतवारनाशी रसायनों द्वारा करने से जहां एक ओर खरपतवारों का उचित समय पर नियंत्रण हो जाता है. वहीं दूसरी ओर लागत एवं समय की भी बचत होती है। खरपतवारनाशी रसायनों का उपयोग करते समय यह ध्यान देना होगा कि उचित सान्द्रता को उपयुक्त विधि द्वारा उपयुक्त समय पर प्रयोग करें, ताकि इनसे समुचित लाभ प्राप्त हो सके।

सिंचाई
गेहूं के अच्छे उत्पादन के लिए चार से छः सिंचाइयों की आवश्यकता पड़ती है। किसान भाइयों को पानी की उपलब्धता के अनुसार सिंचाई करनी चाहिए।

गेहूं में खाद एवं उर्वरक
खाद एवं उर्वरकों का प्रयोगः अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद 10 टन प्रति हैक्टर बुआई के एक माह पहले डालें। तीन वर्ष में कम से कम एक बार खाद अवश्य डालें। मृदा परीक्षण द्वारा ज्ञात की गई मृदा में उपलब्ध पोषक तत्वों की मात्रा के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करें। उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर ही करना उचित रहता है। सिंचित समय से बुआई के लिए 150:60:50 नाइट्रोजन, फॉस्फोरस व पोटाश कि.ग्रा. प्रति हैक्टर एवं सिंचित देर से बुआई के लिए 120:60:50 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर नाइट्रोजन, फॉस्फोरस व पोटाश एवं वर्षा पर आधारित बुआई के लिए 60:30:20 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटाश (सम्पूर्ण मात्रा बुआई के समय) देनी चाहिए।
गेहूं की फसल में यदि जिंक सल्फेट की कमी है, तो 25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से बुआई के समय खेत में डालनी चाहिये। यदि इसके बाद भी जिंक सल्फेट की कमी दिखाई देती है, तो 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट का पर्णीय छिड़काव अवश्य करें। दो से तीन पर्णीय छिड़काव 15 दिनों के अन्तराल पर करें। गंधक की कमी को दूर करने के लिए गंधकयुक्त उर्वरक जैसे अमोनियम सल्फेट अथवा सिंगल सुपर फॉस्फेट का प्रयोग अच्छा रहता है। पोषक तत्वों की कमी दूर करने का उत्तम तरीका समेकित पोषक तत्व प्रबंधन है। विभिन्न कार्बनिक स्रोत जैसे-गोबर की खाद, हरी खाद, फसल अवशेष एवं विभिन्न प्रकार की कम्पोस्ट खादों को उर्वरकों के साथ दिया जाता है।