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Wheat Farming: गेहूं की ये किस्म देगी बम्पर पैदावार, उत्पादन 75 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
Wheat Farming: गेहूं की ये किस्म देगी बम्पर पैदावार, उत्पादन 75 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

गेहूं की खेती: देश में किसानों की आय बढ़ाने और कम लागत पर अधिक उपज देने वाली किस्मों को विकसित करने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के विभिन्न संस्थानों की मदद से फसलों की नई किस्में विकसित की जा रही हैं। पूसा तेजस किस्म को इंदौर इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च ऑफ इंडिया द्वारा विकसित किया गया है।

कृषि वैज्ञानिकों ने गेहूं की कई ऐसी किस्में विकसित की हैं, जो कम समय और कम खर्च में ही अच्छी क्वालिटी का अनाज देती है, सही समय पर बुवाई करने से फसल की पैदावार भी अच्छी होती है। इन किस्मों में पूसा तेजस (Pusa Tejas Wheat) गेहूं शामिल है, जिसे साल 2016 में इंदौर कृषि अनुसंधान केन्द्र ने विकसित किया था, लेकिन आज के समय में यह किस्म मध्य प्रदेश के किसानों के लिये किसी वरदान से कम नहीं है।

पूसा तेजस गेहूं किस्म (HI 8759) की विशेषताएं
पूसा तेजस गेहूं का वैज्ञानिक नाम HI-8759 भी है। नई गेहूं किस्म पूसा तेजस को मध्य भारत के लिए चिह्नित किया है। यह प्रजाति तीन-चार सिंचाई में पककर तैयार हो जाएगी। उत्पादन 55-75 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होगा। पूसा तेजस से चपाती के साथ पास्ता, नूडल्स और मैकरॉनी जैसे खाद्य पदार्थ भी बना सकते हैं। ये प्रजाति प्रोटीन, विटामिन-ए, आयरन व जिंक जैसे पोषक तत्वों से समृद्ध है। कृषि मंत्रालय की सेंट्रल वैराइटी रिलीज कमेटी की मंजूरी मिल गई है। अब किसान फसल ले सकते हैं। यह किस्म 'ब्लास्ट' रोग, गेरुआ रोग, कंड़वा, करनाल बंट रोगों से प्रतिरोधी है। इस किस्म की पत्ती चौड़ी, मध्यमवर्गीय, चिकनी और सीधी होती है। इसके पौधे में 10 से 12 कल्ले होते हैं।


पूसा तेजस गेहूं की खेती
गेहूं की यह किस्म मध्य भारत के लिए उपयुक्त है | मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, राजस्थान( कोटा एवं उदयपुर डिवीज़न) एवं उत्तरप्रदेश (झाँसी डिवीज़न) की जलवायु के लिए उपयुक्त पाई गई है। 

खेत की तैयारी
किसान भाइयों, गेहूं की बुवाई से पहले खेत की अच्छी गहरी जुताई दो से तीन बार करना आवश्यक है, उसके बाद खेत में कुली लगाकर खेत को समतल करना भी आवश्यक है।

बुवाई का सही समय 
पूसा तेजस की बुवाई का सही समय 10 नवंबर से लेकर 25 नवंबर तक होता है।

बीज की मात्रा
गेहूं की पूसा तेजस किस्म में कल्ले की अधिकता होती है। इसके पौधे में 10 से 12 कल्ले होते हैं, इसलिए प्रति एकड़ बीज की मात्रा 50-55 किलो, प्रति हेक्टेयर 120-125 किलो तक ली जा सकती है. वहीं प्रति बीघा में 20 से 25 किलो का बीज ले सकते हैं।

खाद एवं रासायनिक उर्वरक प्रबंधन
संतुलित उर्वरक एंव खाद का उपयोग दानों के श्रेष्ठ गुण तथा अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए अति-आवश्यक है। यदि आप किसी खेत में पूसा तेजस की बोवनी कर रहे हो उससे पहले प्रति हेक्टेयर 20 से 25 टन गोबर की सड़ी हुई खाद डालना भी बहुत जरूरी है। इससे खेत के अंदर जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ती है खेत में सूक्ष्म पोषक तत्वों की पूर्ति होती है जिससे आप की फसल अधिक पैदावार देती हैं। अतः 120 किग्रा. नत्रजन (आधी मात्रा जुताई के साथ) 60 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर सिंचाई दशा में पर्याप्त है | इसमें नत्रजन की आधी मात्रा पहली सिंचाई के बाद टापड्रेसिंग के रूप में प्रयोग करना चाहिए | असिंचित दशा में 60:30:15 तथा अर्ध असिंचित में 80:40:20 के अनुपात में नत्रजन, फास्फोरस व पोटाश डालना चाहिए |

सिंचाई
कठिया गेंहूँ की किस्म में सुखा प्रतिरोधी क्षमता अधिक होती है इसलिए 3-5 सिंचाई ही पर्याप्त होती है | पहली सिंचाई बुआई के 25-30 दिन के अन्दर ताजमूल अवस्था, दूसरी सिंचाई बुआई के 60-70 दिन पर दुग्धावस्था एवं तीसरी सिंचाई बुआई के 90-100 दिन पर दाने पड़ते समय करनी चाहिए |

गेहूं का उत्पादन 
गेहूं की पूसा तेजस किस्म से बुवाई के 115 से 125 दिनों के अंदर 55-75 क्विंटल तक पैदावार ले सकते हैं। पूसा तेजस गेहूं के एक हजार दानों का वजन ही 50 से 60 ग्राम होता है। कड़क और चमकदार दानों वाली पूसा तेज प्रजाति दिखने में जितनी आकर्षक होती है, इससे बने खाद्य पदार्थ भी उतने ही स्वादिष्ट होते हैं।