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कुसुम की उन्नत खेती, जानिए कैसे बढ़ाएं कुसुम का उत्पादन
कुसुम की उन्नत खेती, जानिए कैसे बढ़ाएं कुसुम का उत्पादन

Safflower Farming: कुसुम कसुम्भ या करदी को भारत में चटख रंगों की पंखुड़ियों तथा नारंगी रंग की डाई (कामिन) व इसके बीजों के कारण खेती की जाती है। इसके बीजों में 26 से 36 प्रतिशत तक तेल पाया जाता है। इसका ठंडा दबाया (कोल्ड प्रेस्ड) तेल सुनहरे पीले रंग का होता है और विभिन्न उद्देश्यों के लिए उपयोग किया जाता है। इसका तेल सूरजमुखी के ही तेल की तरह स्वास्थ्यवर्द्धक होता है। इसमें उपयुक्त मात्रा में लिनोलिक अम्ल (78 प्रतिशत) होता है जो रक्त के कोलेस्टेरॉल की मात्रा में कमी लाता है।

भारत में कुसुम की फसल का आच्छादन  में काफी अधिक उपजाऊ भूमि पर है किन्तु प्रमुख उत्पादक राज्यों में कुसुम की फसल की पैदावार कम है। महाराष्ट्र एवं कर्नाटक कुसुम की खेती के प्रमुख राज्य हैं। ये भारत के कुल उत्पादन में 90 प्रतिशत का योगदान देते हैं।


जलवायु
कुसुम एक ठंडी (रवी) मौसम की फसल है। इसके अंकुरण के लिए इष्टतम तापमान लगभग 15 डिग्री सेल्सियस है। पुष्पण के लिए दिन के तापमान को 24 से 32 डिग्री सेल्सियस तक की सीमा अधिक पैदावार के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होती है। समुद्रतल से 1000 मीटर की ऊंचाई तक इसकी खेती की जा सकती है। बौज को उपज और तेल की मात्रा बढ़ती ऊंचाई के साथ कम होती जाती है। पुष्पण के समय यदि तापमान शून्य डिग्री सेल्सियस से कम होता है, तो यह कुसुम की खेती को काफी नुकसान कर सकता है। अंकुरण की अवस्था में फसल बहुत कम तापमान (12 से 10 डिग्री सेल्सियस) भी सहन कर सकती है। पुष्पण के समय अत्यधिक तापमान भी फसल पर कुप्रभाव डाल सकता है। फसल की वृद्धि के सभी चरणों में अत्यधिक वर्षा या आर्द्रता कवक रोगों के संक्रमण को भी बढ़ाती है। कुसुम एक दिन- तटस्थ पौधा है। कुसुम में फोटोपीरियड की तुलना में तापमान अधिक महत्वपूर्ण है। कुसुम की फसल भारी वर्षा क्षेत्रों के लिए उपयुक्त नहीं है। 60-90 सें.मी. के बीच वर्षा वाले क्षेत्रों में यह फसल अच्छी प्रकार से उगाई जा सकती है। खराब जल निकासी या लंबे समय तक बारिश के कारण हुए जलभराव से उपज में काफी कमी हो सकती है। पाला भी इस फसल में बीजों के बनने के समय में अत्यधिक हानिकारक है।

भूमि का चयन
कुसुम की खेती के लिए अच्छी गहरी एवं नमी को सोखने वाली मृदा की आवश्यकता होती है। यह फसल काफी हद तक मृदा के खारेपन के लिए भी सहिष्णु है। धान की फसल के बाद बची अपशिष्ट नमी में यह उगाई जा सकती है। 

बीजों की बुआई
अच्छी फसल के लिए उन्नत किस्मों के स्वस्थ बीजों को बुआई के लिए चुना जाना चाहिए। कुसुम में शाखाएं होती है। इसकी प्रति इकाई हैक्टर में इष्टतम पौधों की संख्या 1 लाख प्रति हैक्टर होनी चाहिए। परिस्थिति अनुसार बीज दर 7 से 20 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर हो सकती है। धान की कटाई के बाद ली जाने वाली कुसुम की खेती के लिए छत्तीसगढ़ में इसकी सामान्य बीज दर 10 से 15 कि.ग्रा. प्रति हेक्टर और ओडिशा में 20 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर अपनायी जाती है। सामान्यतः बुआई की दूरी 45 से 20 सें.मी. रखी जाती है। कर्नाटक में यह दूरी 60 से 30 सें.मी. एवं छत्तीसगढ़ में रखी जाती है। संरक्षित या अपशिष्ट नमी अथवा खरीफ की दर से होने वाली बारिश के आधार पर फसल को सितंबर के अंत से लेकर मध्य नवम्बर तक बोया जा सकता है। कर्नाटक में वर्षा आधारित क्षेत्रों में कुसुम की बुआई का शीर्ष समय सितंबर के दूसरे सप्ताह से सिंचित क्षेत्रों में मध्य सितंबर से लेकर नवम्बर के शुरुआत तक होता है।


खाद एवं उर्वरक 
आखिरी जुताई के समय रेतीली मिट्टी में 15 से 20 टन प्रति हैक्टर कम्पोस्ट या फार्म यार्ड मैन्योर डालने की जरूरत होती है उन क्षेत्रों में जहां सिंचाई संभव है, बुआई के समय 40 40 20 कि.ग्रा. प्रति हेक्टर नाइट्रोजन फॉस्फेट : पोटाश डालनी चाहिए। उर्वरकों को रोपण के समय बीज से 4-5 से.मी. दूर एवं 8-10 सें.मी. गहराई में लगाना चाहिए। 50 प्रतिशत नाइट्रोजन और 100 प्रतिशत फॉस्फेट बुआई के समय तथा 50 प्रतिशत नाइट्रोजन को बुआई के 30 दिनों बाद देना होता है। अच्छे अंकुरण के लिए कुसुम के बीजों को पीएसबी (फॉस्फेट सोल्यूबलाइजिंग बैक्टीरिया) से 200 ग्राम प्रति कि.ग्रा. की दर से बीजोपचार करने को सलाह दी जाती है। अधिक बीजोत्पादन और आय प्राप्ति के लिए कुसुम के बीजों को एजोटोबैक्टर और एजोस्पाइरिलम से 20 ग्राम प्रति कि.ग्रा. की दर से 12.5 कि.ग्रा. प्रति  हैक्टर नाइट्रोजन के साथ उपचारित करने की सलाह दी जाती है। 

सिंचाई
फसल को बिना सिंचाई के भी उगाया जा सकता है, किन्तु सिंचाई के साथ उच्च उपज प्राप्ति की संभावना बढ़ जाती है। फसल के लिए वर्षा का 250-300 मि.मी. का उपभोग दर्ज किया गया है। अधिक उपज के लिए कुसुम की खेती में मध्यम से हल्की मृदा में 3-5 सिंचाइयां देनी चाहिए। इस फसल के अक्टूबर) बीजों को बुआई के बाद 35 एवं 55 दिनों पर सिंचाई दी जानी चाहिए। यदि एक ही सिंचाई उपलब्ध है, तो वह बीजों को बुआई के 55 दिनों के उपरांत दी जानी चाहिए।

कुसुम की खेती की सुरक्षा के कुछ उपाय निम्नलिखित हैं:
जड़ों का सड़ना व मुरझाना 
कैप्टॉन 3 ग्राम प्रति कि.ग्रा. अथवा थीरम/ 3 ग्राम प्रति कि.ग्रा. जैविक फफूंदनाशक ट्राइकोडर्मा / 4 ग्राम प्रति कि.ग्रा. से बीजोपचार।

पर्णदाग
कैप्टॉन 3 ग्राम प्रति कि.ग्रा. अथवा थीरम 3 ग्राम प्रति कि.ग्रा. से बीजोपचार।
खेत में डाइऐयन डी-45 (25 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी में) से छिड़काव।

गुजिया (वीविल)
फोरेट 10जी 10 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर बुआई के समय क्लोरपाईरिफॉस 20 ईसी / 25 मि.ली. का पत्तियों पर छिड़काव।
आवश्यकतानुसार दूसरा छिड़काव पहले छिड़काव के 10 दिनों के बाद भी किया जा सकता है। 

अंतःसस्यन
कुसुम को चना अथवा अलसी के साथ 6:3 या 33 के अनुपात में लगाना लाभकर होता है।

एफिड से बचाव
फेनथियान 50 ईसी क्विनॉलफॉस 20 ई.सी. थीयोमेटॉन 25 ई.सी., मेलाथियान 50 का स्प्रे अथवा क्विनॉलफॉस 1.5 प्रतिशत या फाजोलेन के 4 प्रतिशत चूर्ण का प्रयोग।
शीघ्र बुआई ( 25 सितंबर से 10 अक्टूबर )
यदि एफिड की कॉलोनी पौधों में 30 प्रतिशत तक पहुंच जाये तो पौध सुरक्षा उपाय अपना लिए जाने चाहिए।

फसल कटाई
जब फसल की पत्तियां एवं अधिकांश सहपत्रिकाएं सूखकर भूरे रंग की हो जाती हैं, तो फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है। कटाई सुबह की बेला में करने से बीजों के बिखेरने की आशंका को कम किया जा सकता है। इस समय पौधे पर उपस्थित कांटे भी अपेक्षाकृत नरम होते हैं। पौधों को आधार से काटकर उनके छोटे-छोटे ढेर बनाकर उन्हें खेत में ही पूरी तरह सूखने के लिए छोड़ दें। इसके उपरांत डंडों से पीटकर या रोलर्स की मदद से बीजों को अलग कर लें। 

बीज की उपज
यदि सभी उन्नत कृषि उत्पादन और संभावित प्रौद्योगिकियों का पालन किया जाता है, तो लगभग 800 से 1200 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर कुसुम की पैदावार कम नमीयुक्त परिस्थितियों में तथा 1500-2000 कि.ग्रा. प्रति हेक्टर अनुकूल नमीयुक्त परिस्थितियों में प्राप्त की जा सकती है। सिचाई की उपलब्धता की अवस्था में कुसुम की पैदावार 2000- 2800 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर तक ली जा सकती है।