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फसल अवशेषो का यथा-स्थान प्रबंधन का महत्व, जानिए फसल के अवशेषों को जलाने से नुकसान
फसल अवशेषो का यथा-स्थान प्रबंधन का महत्व, जानिए फसल के अवशेषों को जलाने से नुकसान

मुख्य उद्देश्य
  • वायु प्रदूषण से पर्यावरण की रक्षा करना और फसल अवशेषों को जलाने के कारण मिट्टी से सूक्ष्म पोषक तत्वों और सूक्ष्म जीवों के नुकसान से रोकना। 
  • उपयुक्त मशीनीकरण इनपुट के उपयोग के माध्यम से मिट्टी में प्रतिधारण और निगमन द्वारा फसल अवशेष के स्व-स्थान प्रबंधन को बढ़ावा देना। 
  • फसल अवशेष के प्रभावी उपयोग और प्रबंधन के लिए प्रदर्शन, क्षमता निर्माण गतिविधियों और विभेदित सूचना, शिक्षा और संचार रणनीतियों के माध्यम से हितधारकों के बीच जागरूकता पैदा करना।

धान की फसल के अवशेष प्रबंधन से लाभ
  • चावल की फसल कार्बनिक खाद का मुख्य स्रोत है। जब धान की फसल पकने की अवधि में होती है तो उसके वानस्पतिक भाग मे 40% नाइट्रोजन, 30-35% फास्फोरस, 80-85% पोटेशियम और 40-45% सल्फर उपस्थित होती है। जिसको भूमि मे मिलाने से उसकी उर्वरता शक्ति बढ़ा सकते हैं। 
  • हम फसल अवशेषों का प्रयोग करके वर्मी कम्पोस्ट यूनिट के द्वारा वर्मी खाद बनाकर हमारी खेत की उर्वरता क्षमता को बढ़ा सकते है जिससे हम कम रासायनिकों का प्रयोग करके जैविक उत्पादन ले सकते है। 
  • फसलों के अवशेषों का पशुओं चारा उत्पाद के रूप या जिस जगह चारे की मात्रा कम हो वहाँ पर बेच कर अपनी आय बढ़ा सकते हैं।
  • धान की फसल के अवशेषों को कागज बनाने, ईट बनाने वाली औद्योगिक फैक्ट्री में बेचकर अपनी आय बढ़ा सकते है।
  • हम फसल के अवशेषों से व्हाइट बटन मशरूम (Agaricus Bisporus) और स्ट्रॉ मशरूम (Volvriella Volvacea) के उत्पादन में काम ले सकते जिससे हमारी अधिक आमदनी हो सकती है।

फसल के अवशेषों को जलाने से नुकसान
  • हम धान की फसल के एक टन (10 कुंटल) अवशेषो को जलाकर भूमि से 5.5 किलोग्राम नाइट्रोजन, 2.5 किलोग्राम फास्फोरस, 25 किलोग्राम पोटेशियम, 1.2 kg सल्फर, 50-70% सूक्ष्म पोषक तत्व का निष्कासन और 400 किलोग्राम जैविक कार्बनिक को नष्ट कर देते हैं।
  • जब हम धान के अवशेषों को जलाते है तो एक किलोग्राम के धान के अवशेष 0.7-4.1 ग्राम मिथेन (CH4) व 0.019 - 0.057 ग्राम नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) का निष्कासन होता है जिसका सीधा प्रभाव ग्रीनहाउस गैस पर होता है जिसके कारण जलवायु परिवर्तन, तापमान में बढ़ोतरी वर्षा का नही होना या अयनिमितता से होना और फसल पकने की अवधि में अंतर आदि कारण है एवम् इसके अलावा सल्फर डाइ ऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, हाइड्रोजन क्लोराइड और डाइ ऑक्साइन्स आदि गैसे को वातावरण पर सीधा असर करती जो भविष्य में हमे खेती करना मुश्किल हो जायेगा | 
  • धान की फसल को जलाने पर उससे निकलने वाली गैस बहुत ही विषैली एवं हानिकारक होती है, जिससे सांस लेने में तकलीफ और कई बीमारियाँ होने का खतरा रहता है।
"फसल के अवशेषों को हम ना जलायंगे ना ही किसी को जलाने देंगे इन अवशेषो को भूमि में मिलाकर अपनी मिट्टी की उसकी उर्वरता क्षमता बढ़ायेंगे"