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Cilantro (धनिया)

Look at our Crops productivity, reports and much more.

Over 2500 years ago, Indian farmers had discovered and begun farming many spices and sugarcane. It was in India, between the sixth and fourth centuries BC, that the Persians, followed by the Greeks, discovered the famous “reeds that produce honey without bees? being grown.
kisan

Cilantro (धनिया)

धनिया उत्पादन की उन्नत तकनीक-
प्राचीन काल से ही विश्व में भारत देश को ‘‘मसालों की भूमि‘‘ के नाम से जाना जाता है। धनिया के बीज एवं पत्तियां भोजन को सुगंधित एवं स्वादिष्ट बनाने के काम आते है। । भारत धनिया का प्रमुख निर्यातक देश है । इसकी खेती पंजाब, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, बिहार, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कनार्टक तथा उत्तरप्रदेश में अधिक की जाती है। मारवाडी भाषा में इसे धोणा कहा जाता है।

Cilantro (Coriandrum sativum) is used in a great many different dishes, particularly Mexican and Asian dishes, but despite the growing popularity for this dish in cooking, you don’t see cilantro growing in the home garden as much as you do other popular herbs. This may be due to the fact that many people think that growing cilantro is difficult. This is not the case at all. If you follow these few tips for growing cilantro, you will find that you will be successfully growing cilantro in no time at all

भूमि एवं जलवायु -
धनिया की खेती के लिए दोमट मृदा सर्वोत्तम होती है। ऐसी मृदा जिसमें कार्बनिक पदार्थ की मात्रा ज्यादा हो एवं जल निकास की भी उचित व्यवस्था हो, इसकी खेती के लिए उचित होती है। बीजों के अंकुरण के लिय 25 से 26 से.ग्रे. तापमान अच्छा होता है । इसे खुली धुप की आवश्यकता होती है । धनिया की खेती आम तौर पर किसी भी मिट्टी में की जा सकती है, परन्तु धनिया की खेती के लिए उचित जल निकासी वाली रेतीली दोमट मिट्टी सर्वोत्तम माना गया है |

Land and climate -
Loam soil is best for cultivating coriander. Such soil which has high quantity of organic matter and proper drainage system, it is suitable for cultivation. For germination of seeds from 25 to 26. Gray The temperature is good. It requires open sunlight. Coriander can be cultivated generally in any soil, but proper drainage of sandy loam soil is considered best for cultivation of coriander.

भूमि की तैयारी-
खेत को भली प्रकार से जोतकर मिटटी को भुरभुरा बना लें और अंतिम जुताई के समय १५-२० टन गोबर या कम्पोस्ट की अच्छी सड़ी-गली खाद खेत में एक साथ मिला दें यदि खेत में नमी की कमी है तो पलेवा करना चाहिए ।

Preparation of land-
Plant the field properly and make the soil brownish and at the time of last plowing, add 15-20 tonnes of dung or compost to the good rust compost in the field, if the field lacks moisture, then it should be plated.

प्रजातियाँ -
भारत में धनिए की अनेक उन्नत किस्मे उपलब्ध है |
आर.सी.आर.४१ ,आर.सी.आर.२० ,,गुजरात धनिया २ (जी-२) ,पूसा चयन ३६०,स्वाति लाम चयन सी.एस.२ ,साधना,राजेन्द्र स्वाति,सी.एस. २८७ ,को.१ ,को.२ ,को.३ ,आर.सी.आर.६८४,आर.सी.आर.४३६
हिसार सुगंध,आर सी आर 41,कुंभराज,आर सी आर 435,आर सी आर 436,आर सी आर 446,जी सी 2(गुजरात धनिया 2), आरसीआर 684,पंत हरितमा,सिम्पो एस 33,जे डी-1 ,ए सी आर 1,सी एस 6,जे डी-1 ,आर सी आर 480,आर सी आर 728

Species -
There are many advanced varieties of coriander in India.
R.C.R.41, R.C.R. 20, Gujrat Coriander 2 (G2), Pusa Selection 360, Swati Lama Selection, CS2, Sadhana, Rajendra Swati, C.S. 287, Ko.1, Ko.2, Ko.3, r.c.r.684, r.c.r. 436, Hisar fragrance, RCR 41, Kumbharaaj, RCR435, RCR436, RCR 446, GC2 (Gujarat Coriander 2), RCR 684, Pant Haritima, Simpo S33, JD-1, A CR1, CS6, JD-1, RCR 480, RCR728

फसल बोने का समय और बीज की मात्रा-
धनिया की फसल के लिए 15 अक्टुंबर से 15 नवंबर तक बुवाई का उचित समय रहता है। बुवाई के समय अधिक तापमान रहने पर अंकुरण कम हो सकता है। अधिक उपज पाने के लिए 1 अक्टुंबर से 15 अक्टुंबर तक बीज बोना चाहिए।  बीज दर: सिंचित अवस्था में 15-20 कि.ग्रा./हे. बीज तथा असिंचित में 25-30 कि.ग्रा./हे. बीज की आवश्यकता होती है।

The time of harvesting and the quantity of seed-
For the harvest of coriander, it is appropriate time for sowing till 15th November to 15th November. Germination may be less when sowing at higher temperatures. To get more yield, sowing seeds should be done from 1st October to 15th of October. Seed rate: 15-20 kg / ha in irrigated condition. 25-30 kg / ha in seed and unincorporated Seeds are required.

खाद एवं उर्वरक -
असिंचित धनिया की अच्छी पैदावार लेने के लिए गोबर खाद 20 टन/हे. के साथ 40 कि.ग्रा. नत्रजन, 30 कि.ग्रा. स्फुर, 20 कि.ग्रा. पोटाश तथा 20 कि.ग्रा. सल्फर प्रति हेक्टेयर की दर से तथा 60 कि.ग्रा. नत्रजन, 40 कि.ग्रा. स्फुर, 20 कि.ग्रा. पोटाश तथा 20 कि.ग्रा. सल्फर प्रति हेक्टेयर की दर से सिंचित फसल के लिये उपयोग करें|

Manure and fertilizer -
To get good yield of uninfected coriander, dung manure is 20 tons / ha. With 40 kg Nitrogen, 30 kg Phosphorus, 20 kg Potash and 20 kg At the rate of sulfur per hectare and 60 kg Nitrogen, 40 kg Phosphorus, 20 kg Potash and 20 kg Use sulfur for irrigated crop at a rate of hectare.

खरपतवार-
खरपतवारों के नियंत्रण के लिए दो बार निराई गुड़ाई करनी चाहिए पहली बुवाई से ३०-४५ दिन बाद और दूसरी निराई गुड़ाई के ६०-७० दिन बाद जहाँ पौधे अधिक उगे हों वहां पहली निराई गुड़ाई के समय अनावश्यक पौधों को हटाकर पौधों की आपसी दुरी १०-१२ से.मी.कर देनी चाहिए ।

Weed-
For control of weeds, weeding should be done twice, after 30-45 days after the first sowing and after 60-70 days of second weeding, where the plants are more grown, during the first weeding, removal of unnecessary plants, 12 cm should be given.


सिंचाई-
किस्म, मृदा की जलधारण क्षमता एवं वातावरणानुसार 4-5 सिंचाई 30-35 दिन, 60-70 दिन 80-90 दिन 10-105 एवं 110-150 बुआई के बाद क्रमशः आवश्यकतानुसार करना चाहिए।

Irrigation-
Various varieties should be done according to the storage capacity of soil and 4-5 irrigation 30-35 days, 60-70 days 80-90 days 10-105 and 110-150 after sowing respectively.

रोग एवं नियंत्रण-
उकठा (म्लानि) रोग- इस रोग से प्रभावित होने पर पौधे का शीर्ष भाग मुरझाकर सूखने के साथ साथ पौधा भी सूखने लगता है एवं बाद में पौधा मर जाता है। जड़ो का रंग भूरा हो जाता है।
नियंत्रण- बीजोपचार 1.5 ग्राम कार्बेन्डाजिम + 1.5 ग्राम थाइरम (1:1) किग्रा. बीज की दर से बुवाई पूर्व उपचारित कर बोए।

चूर्णी फफूंदी रोग- यह रोग एरिसाइफी पोली गोनाई नामक फफूंद से फैलता है। यह रोग फरवरी एवं मार्च महीने में अधिक नुकसान पहुंचाता है।
नियंत्रण- गंधक चूर्ण 20-25 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकें या फिर घुलनशील गंधक चूर्ण 2 ग्राम या डायनोकेप 48% ई.सी. 1 मि.ली. प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। या केलिक्जिन 1 मि.ली. प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें। आवश्यकता होने पर 15 दिन के अंतराल पुनः छिड़काव करें।
झुलसा रोग- इस रोग के प्रभाव से पौधे की पत्तियों और तनों पर गहरे भूरे रंग के या फिर झुलसने की तरह के धब्बे बन जाते है और पौधा नष्ट हो जाता है।

नियंत्रण- मेंकोजेब 2 ग्राम या ट्रायडिमेफोन 1 ग्राम दवा/लीटर पानी की दर से या सीस्थेन 400 मि.ग्रा./लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। आवश्यक हो तो दूसरा छिड़काव दोहराए।

स्टेम गाल (तनापिटिका रोग) - रोग ग्रसित पौधों में पतियों में व तनों में फफोले के आकार बन जाते है तथा बीजों का आकर भी बदलकर लॉन्ग की तरह हो जाता है। इसलिए इसे लोंगिया रोग भी कहते है
नियंत्रण- बीज उपचार के साथ-साथ केलिक्जिन 1% का घोल बनाकर बुवाई के 30-45 दिन पश्चात छिड़काव करने पर रोग की तीव्रता को रोका जा सकता है।

Disease and control-
Boiling (Mildine) Disease- When affected by this disease, the plant gets dried and after drying the top part of the plant, the plant starts drying up and later the plant dies. The color of the root becomes brown.
Control- Seed treatment 1.5 gm carbendazim + 1.5gm thyrm (1: 1) kg Sowing seeds at the rate of sowing before sowing.


Churni Fungal Disease - This disease spreads through the fungus called Ariisaifei Poli Gonai. This disease causes more damage in February and March.
Control- Sulfur Powder 20-25 kg Flow at a rate of hectare or soluble sulfur powder 2 grams or dinocap 48% E.C. 1 ml Sprinkle in water per liter. Or kelikin 1 ml Sprinkle per liter of water. Repeat the gap of 15 days if required.
Acne Disease: With the effect of this disease, the leaves and stems of the plant become dark brown or scorched like spots and the plant gets destroyed.
Control- Spray the mekogenb 2 gram or triamediemphon at 1 gram drug / liters water or in seisthen 400 mg / liters of water. If necessary, repeat the second spraying.


Stem cheeks (Tanapitika disease) - In the diseased plants, husbands and stems become the size of the blisters and the size of the seeds also changes to become like a long. Therefore it is also called Longia disease.

Control-seed treatment, along with calcium solution of 1%, can be stopped after 30-45 days after sowing, the intensity of the disease can be stopped.

कटाई-
फसल की कटाई उपयुक्त समय पर करनी चाहिए । धनिया दाना दबाने पर मध्यम कठोर तथा पत्तिया पीली पड़ने लगे , धनिया डोड़ी का रंग हरे से चमकीला भूरा/पीला होने पर तथा दानों मंे 18 प्रतिशत नमी रहने पर कटाई करना चाहिए ।

Harvesting
Harvesting should be done at the appropriate time. When pressing coriander seeds, the leaves become moderately rigid and yellowish, and the coriander should be cut from green to bright brown / yellow and 18% moisture in the grains.

गहाई-
धनिये की फसल प्रजातियों के अनुसार लगभग 120-140 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं। फसल पकने की अवस्था में दानों का रंग हल्का पीलापन लेने लगता हैं। पीलापन शुरू होते ही कटाई शुरू करें तथा खेत में ढेरियों को उल्टा रखें अर्थात बीज निचे की और तथा जड़ें ऊपर की और ताकि धुप में दानों का रंग खराब न हो। संभव हो सके तो छायादार स्थान पर सुखाएं जब दानों में नमी 10% तक हो तब भंडारण करें अन्यथा बोरो में भरते समय अधिक नमी की वजह से दानें खराब हो सकते हैं।

Threshing -
Coriander crops are prepared in about 120-140 days according to the species. The color of granules starts to take light yellowness in the crop rotation stage. Start harvesting as soon as the yellowing starts and keep the stackers in the field below, that is, the seed is low and the root is above and so that the color of the granules in the sun does not worsen. If possible, dry on a shady place, when the moisture content in the grains is up to 10%, otherwise the grains may be damaged due to excess moisture while filling in the boro.

उपज
धनिया के बीज की औसत उत्पादन क्षमता 6-10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है। हरी पत्तियों की दृष्टि से इसकी उत्पादन क्षमता 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है।


Yield -
The average production capacity of coriander seeds is 6-10 q / ha. It has a production capacity of 100 quintals per hectare in terms of green leaves.

भण्डारण-
भण्डारण के समय धनिया बीज में 9-10 प्रतिशत नमी रहना चाहिए । धनिया बीज का भण्डारण पतले जूट के बोरों में करना चाहिए । बोरों को जमीन पर तथा दिवार से सटे हुए नही रखना चाहिए । जमीन पर लकड़ी के गट्टों पर बोरों को रखना चाहिए। बीज के 4-5 बोरों से ज्याद एक के ऊपर नही रखना चाहिए । बीज के बोरों को ऊंचाई से नही फटकना चाहिए । बीज के बोरें न सीधे जमीन पर रखें और न ही दीवार पर सटाकर रखें । बोरियों मे भरकर रखा जा सकता है ।

Storage-
During storage, coriander seeds should be 9-10 percent moisture. Coriander seeds should be stored in thin jute bags. Broons should not be adjacent to the ground and to the wall. Sacks should be placed on wooden planks on the ground. 4-5 seeds of seeds should not be kept above one. The seeds of seed should not be touched by height. Do not place seeds of seed directly on the floor or keep it on the wall. Sacks can be filled up.

Cilantro (धनिया) Crop Types

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