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Tulsi (तुलसी)

परिचय :- प्राचीन समय से ही तुलसी एक पवित्र पोधा माना जाता है। जिसे हर घर में लगाकर पूजा आदि की जाती है तुलसी का आयुर्वेद में बहुत बड़ा स्थान है। तुलसी से बहुत सारे रोगों का उपचार किया जाता है। इसका प्रतिदिन सेवन करने से कई प्रकार के रोगों से राहत मिलती है।वर्तमान में इसे औषधीय खेती के रूप में किया जाने लगा है। यह पुरे भारत में पाया जाता है। इसकी कई प्रकार की प्रजातियां होती है जेसे:- ओसेसिम बेसिलिकम, ग्रेटीसिमम, सेकटम, मिनिमम, अमेरिकेनम।

Tulsi or Sacred basil (Ocimum sanctum L.) is a biennial shrub belonging to the family Lamiaceae. The plant has been revered by the people of India for its multivarious uses since vedic times. Even now, it is worshipped by many. The essential oil of sacred basil has about 71 per cent eugenol and is comparable to that of clove oil. Eugenol is widely used in perfumery, cosmetics, pharmaceuticals and confectionary industries. The juice of the leaves possesses antiseptic, diaphoretic, antiperiodic, stimulating, expectorant, anti-pyretic and memory improving properties. It is one among the few plants which purifies the atmosphere

विवरण :- तुलसी भारत के सभी राज्यों में पाया जाने वाला पौधा है। तुलसी का पौधा 1800 मीटर की ऊँचाई तक पाया जाता है। यह भारत में उत्तराखण्ड, जम्मू कश्मीर, उत्तर प्रदेश एवं पश्चिमी बंगाल राज्यों में इसकी व्यावसायिक खेती की जाती है। तुलसी मुख्य रूप से 3 तरह की होती है. पहली हरी पत्ती वाली, दूसरी काली पत्ती वाली और तीसरी कुछकुछ नीलीबैगनी रंग की पत्तियों वाली. खास बात यह है कि यह कम सिंचाई वाली और कम से कम रोगों व कीटों से प्रभावित होने वाली फसल होती है.

CLIMATE - The crop has a wide adaptability and can be grown successfully in tropical and sub-tropical climates. Long days with high temperature have been found favourable for plant growth and oil production.  

मिट्टी :- तुलसी की खेती आमतौर पर सामान्य मिट्टी में आसानी से हो जाती है. मोटेतौर पर कहें तो अच्छे जल निकास वाली भुरभुरी व समतल बलुई दोमट, क्षारीय और कम लवणीय मिट्टी में इस की खेती आसानी से की जा सकती है.

SOILS - The plant is sufficiently hardy and it can be grown on any type of soil except the ones with highly saline, alkaline or water logged conditions. However, sandy loam soil with good organic matter is considered ideal.

खेत की तैयारी :- सब से पहले गहरी जुताई वाले यंत्रों से 1 या 2 गहरी जुताई करने के बाद पाटा लगा कर खेत को समतल कर देना चाहिए. इस के बाद सिंचाई और जलनिकास की सही व्यवस्था करते हुए सही आकार की क्यारियां बना लेनी चाहिए.

बीज द्वारा:- तुलसी का प्रसारण बड़े पैमाने पर बीज द्वारा ही किया जाता है। जमीन की 15 – 20 सेमी. गहरी खुदाई कर के खरपतवार आदि निकाल तैयार करा लेना चाहिए। 15 टन प्रति हे. की दर से गोबर की सड़ी खाद  अच्छी तरह से मिला देना चाहिए। 1 मी. X 1 मी. आकार की जमीन सतह से उभरी हुई क्यारियां बना कर उचित मात्र में कंपोस्ट एवं उर्वरक मिला दिन चाहिए। 750 ग्रा. – 1 किग्रा. बीज एक हेक्टयेर के लिए पर्याप्त होता है। बीज की बुवाई 1:10 के अनुपात में रेत या बालू मिला कर 8-10 सेमी. की दूरी पर पक्तियां में करनी चाहिए। बीज की गहराई अधिक नहीं होनी चाहिए। जमाव के 15-20 दिन बाद 20 कि./ हे. की दर से नेत्रजन डालना उपयोगी होता है। पांच- छह सप्ताह में पौध रोपाई हेतु तैयार हो जाती है।

Nursery raising - For propagating basil through seeds, they are to be sown in the nursery beds. The nursery should be located preferably in partial shade with adequate irrigation facilities. Soil is worked upto a depth of about 30 cm. Well rotten farm yard manure (2 kg/sq.m) is applied to the soil and prepared to a fine tilth and seed beds of 4.5x1.0x0.2 m size are prepared. As the seeds are minute, the required quantity of seeds are mixed with sand in the ratio of 1:4 and sown in nursery bed, 2 months in advance of the onset of monsoon. They germinate in 8-12 days and seedlings are ready for transplanting in about 6 weeks time at 4-5 leaf stage.         

शाखाओं द्वारा :- तुलसी का प्रसारण शाखाओं को काटकर भी किया जा सकता है। 10-15 ऐसी लम्बी शाखायें काटकर उन्हें छाया में रखकर सुबह-शाम हजारे से पानी देते रहें। एक महीने में इन शाखाओं से जड़ें विकसित हो जाती हैं। और पत्तियाँ विकसित होने लगती हैं। जब शाखायें 5-10 सेमी की हो जायें तो इसके बाद इनकी रोपाई की जा सकती है।

Vegetative propagation - Vegetatively it can be propagated by terminal cuttings with about 90-100 per cent success during October-December months. For this purpose, cuttings with 8-10 nodes and 10-15 cm length are used. They are so prepared that except for the first 2-3 pairs of leaves the rest are trimmed off. Later, they are planted in the well prepared nursery beds or polythene bags. In about 4-6 weeks time the rooting is complete and they are ready for transplanting into the mainfield.  The plants are transplanted at a spacing of 40 cm between the row and 40 cm within the row.

रोपाई का तरीका :- 1 हेक्टेयर खेत के लिए लगभग 200-300 ग्राम बीजों से तैयार पौध सही होतेहैं. बीजों को नर्सरी में मिट्टी के 2 सेंटीमीटर नीचे बोना चाहिए. बीज अमूमन 8-12 दिनों में उग आते हैं. इस के बाद रोपाई के लिए 4-5 पत्तियों वाले पौधे लगभग 6 हफ्ते में तैयार हो जाते हैं. प्रति हेक्टेयर अधिक उपज और अच्छे तेल उत्पादन के लिए लाइन से लाइन की दूरी 45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 20-25 सेंटीमीटर जरूर रखनी चाहिए. तुलसी की रोपाई के लिए केवल स्वस्थ पौधे का चुनाव करना चाहिए | ताकि पैदावार अच्छी हो |

खाद और उर्वरक :- तुलसी के पौधे के तमाम भागों को ज्यादातर औषधीय इस्तेमाल में लिया जाता है, इसलिए बेहतर होगा कि रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल न करें या बहुत कम करें. 1 हेक्टेयर खेत में 10-15 टन खूब सड़ी हुई गोबर की खाद या 5 टन वर्मी कंपोस्ट सही रहती है. यदि रासायनिक उर्वरकों की जरूरत पड़ ही जाए तो मिट्टी की जांच के अनुसार ही इन का इस्तेमाल करना चाहिए. सिफारिश की गई फास्फोरस और पोटाश की मात्रा जुताई के समय व नाइट्रोजन की कुल मात्रा 3 भागों में बांट कर 3 बार में इस्तेमाल करनी चाहिए.

सिंचाई :- पहली सिंचाई रोपाई के तुरंत बाद करनी चहिए. उस के बाद मिट्टी की नमी के मुताबिक सिंचाई करनी चहिए. वैसे गरमियों में हर महीने 3 बार सिंचाई की जरूरत पड़ सकती है. बरसात के मौसम में यदि बरसात होती रहे, तो सिंचाई की कोई जरूरत नहीं पड़ती है.

IRRIGATION - After transplanting irrigation is provided twice a week till one month so that the plants establish themselves well. Later, it is given at weekly interval depending upon the rainfall and soil moisture status.

कटाई :- जब पौधों में पूरी तरह फूल आ जाएं तो रोपाई के 3 महीने बाद कटाई का सही समय होता है. ध्यान रहे कि तेल निकालने के लिए पौधे के 25-30 सेंटीमीटर ऊपरी शाकीय भाग की कटाई करनी चाहिए.

HARVESTING AND YIELD - The crop is harvested at full bloom stage by cutting the plants at 15 cm from ground level to ensure good regeneration for further harvests. The first harvest is done after 90 days of planting and subsequently it may be harvested at every 75 days interval. Harvest the crop on bright sunny days to get good yield and oil quality.  

पैदावार :- इसके फसल की औसत पैदावार 20 - 25 टन प्रति हेक्टेयर तथा तेल का पैदावार 80-100 किग्रा. हेक्टेयर तक होता है।

आय – व्यय विवरण

प्रति हेक्टेयर व्यय – रू. 10,500

तेल का पैदावार – 85 किलो प्रति हेक्टेयर

टेल की कीमत – 450 – रूपया प्रति किलो – 8/5 X  450 = 38,250

शुद्ध लाभ = रू. 38, 250 – 10,500 = 27,750

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