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Arhar (अरहर)

Look at our Crops productivity, reports and much more.

Over 2500 years ago, Indian farmers had discovered and begun farming many spices and sugarcane. It was in India, between the sixth and fourth centuries BC, that the Persians, followed by the Greeks, discovered the famous “reeds that produce honey without bees? being grown.
kisan

Arhar (अरहर)

परिचय :- भारत विश्व में दलहनी फसलों के क्षेत्रफल एवं उत्पादन में प्रथम स्थान पर है । देश में दलहनी फसले 2 करोड़ 38 लाख हेक्टर भूमि में बोई जाती है, जिनकी उत्पादकता केवल 622 कि.ग्रा / हे. जो कि बहुत कम है। मध्यप्रदेश का स्थान दलहनी फसलों के क्षेत्र एवं उत्पादन में क्रमश: पहला व दूसरा है । मध्यप्रदेश में दलहनी फसलें 50.4 लाख हेक्टर भूमि में उगाई जाती है, जिससे सीधे नत्रजन ग्रहण कर पौधों को देती है, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति बनी रहती है। खरीफ की दलहनी फसलों में अरहर प्रमुख है । मध्य प्रदेश में अरहर को लगभग 4.75 लाख हेक्टर क्षेत्र में लिया जाता है जिससे औसतन 842 किलो ग्राम प्रति हेक्टर उत्पादन होता है । उन्नत तकनीक से अरहर का उत्पादन दो गुना किया जा सकता है। । महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक एवं आन्ध्र प्रदेश देश के प्रमुख अरहर उत्पादक राज्य हैं ।

Introduction :- Scientifically known as Cajanus Cajan, Pigeon Pea belongs to the widespread family of pulses. In India Pigeon Pea is more popular as Arhar or red gram.In India, split pigeon peas (toor dal) are one of the most popular pulses, being an important source of protein in a mostly vegetarian diet. In regions where it grows, fresh young pods are eaten as a vegetable. The split dried seeds are used as a lentil, in dishes such as sambar (lentil soup). Toor Dal is called in other languages as :- In English : Pigeon Peas , Red Gram, Yellow Lentils ,In Hindi: arhar, tuvar, toor, tur dal, In Tamil: tovarum paruppu,In Telugu: Kandi Pappu.

भूमि का चुनाव :- अरहर की फसल के लिए बलुई दोमट भूमि अच्द्दी होती है। उचित जल निकास तथा हल्के ढालू खेत अरहर के लिए सर्वोत्तम होते है। लवणीय तथा क्षारीय भूमि में इसकी खेती सफलतापूर्वक नही की जा सकती है।

बुआई का समय :- शीघ्र पकने वाली प्रजातियों की बुआई जून के प्रथम पखवाड़े तथा विधि में तथा मध्यम देर से पकने वाली प्रजातियों की बुआई जून के द्वितीय पखवाड़े में करना चाहिए। बुआई सीडडिरल या हल के पीछे चोंगा बॉंधकर पंक्तियों में हों।

खेत की तैयारी :- मिट्टी पलट हल से एक गहरी जुताई के उपरान्त 2-3 जुताई हल अथवा हैरो से करना उचित रहता है। प्रत्येक जुताई के बाद सिंचाई एवं जल निकास की पर्याप्त व्यवस्था हेतु पाटा देना आवश्यक है।

Soil requirement for Toor Dal Farming :- This crop grows well on all types of soils but loam to sandy loam soil is suitable. This crop also does well in slopy lands in the mid-hills.It can be grown successfully on neutral soils having a pH range of 6.5 to 7.5. Make sure there won’t be any water logging in the field.

उन्नतशील प्रजातियॉं :- भूमि का प्रकार, बोने का समय, जलवायु आदि के आधर पर अरहर की जातियों का चुनाव करना चाहिए। 

शीघ्र पकने वाली प्रजातियॉं :- उपास 120, पूसा 855, पूसा 33, पूसा अगेती, आजाद (के 91-25) जाग्रति (आईसीपीएल 151) , दुर्गा (आईसीपीएल-84031)ए प्रगति।

मध्यम समय में पकने वाली प्रजातियॉं :- टाइप 21, जवाहर अरहर 4, आईसीपीएल 87119, (आशा) ए वीएसीएमआर 583

देर से पकने वाली प्रजातियॉं :- बहार, बीएमएएल 13, पूसा-9, 

हाईब्रिड प्रजातियॉं :- पीपीएच-4, आईसीपीएच 8, 

रबी बुवाई के लिए उपयुक्त प्रजातियॉं :- बहार, शरद (डीए 11) पूसा 9, डब्लूबी 20

राज्यों हेतु संस्तुत उन्नत प्रजातिया :-

हरियाणा - एच0 82-1 (पारस)

पंजाब - पी0पी0एच0-4 (हाइब्रिड), ए0एल0-201

उत्तर पद्रेश - उपास-120

उड़ीसा - उपास-120

तमिलनाडु -सी0ओ0पी0एच0-2

महाराष्ट्र - आई0सी0पी0एल0-87119 (आशा), वी0एस0एम0आर0-583

गुजरात - आई0सी0पी0एल0-87119 (आशा), जे0के0एम0-7

छत्तीसगढ़ - आई0सी0पी0एल0-87119 (आशा)

मध्य प्रदेश - आई0सी0पी0एल0-87119 (आशा), आई0सी0पी0एल0-87119 (आशा), ए0के0पी0जी0-4101, जी0टी0-100

कर्नाटक - आई0सी0पी0एल0-87119 (आशा)

आन्ध्र प्रदेश - आई0सी0पी0एल0-87119 (आशा)

बिहार - पूसा-9

पूर्वीउत्तर प्रदेश - बहार

बीज की मात्रा एवं बीजोपचार :- अरहर की फसल में उन्नत किस्मों का प्रमाणित बीज 10-12 किलोग्राम एकड़ प्रति एकड़ लगता है । बीज को बीजोपचार करने के बाद ही बोये । बीजोपचार ट्रायकोडर्मा बिरिडी 10 ग्राम/किलो या 2 ग्राम थाइरम/एक ग्राम बेबीस्टोन (2:1) में मिलाकर 3 ग्राम प्रति किलो की दर से बीजोपचार करने से फफूंद नष्ट हो जाती है । बीजोपचार के उपरांत अरहर का राइजोबियम कल्चर 5 ग्राम एवं पी.एस.बी. कल्चर 5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार करें । बीज को कल्चर से उपचार करने के बाद छाया में सुखाकर उसी दिन बोनी करें।

उर्वरक का प्रयोग :- बुवाई के समय 8 कि.ग्रा. नत्रजन, 20 कि.ग्रा. स्फुर, 8 कि.ग्रा. पोटाष व 20 कि.ग्रा. गंधक प्रति एकड़ कतारों में बीज के नीचे दिया जाना चाहिये। तीन वर्ष में एक बार 10 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट प्रति एकड़ आखिरी बखरीनी पूर्व भुरकाव करने से पैदावार में अच्छी बढ़ोतरी होती है। 

सिंचाई :- जहां सिंचाई की सुविधा हो वहां एक सिंचाई फूल आने पर व दूसरी फलियां बनने की अवस्था पर करने से पैदावार अच्छी होती है। 

खरपतवार नियंत्रण :- खरपतवार नियंत्रण के लिये 20-25 दिन में पहली निदाई तथा फूल आने से पूर्व दूसरी निदाई करें। 2-3 बार खेत में कोल्पा चलाने से निदाओं पर अच्छा नियंत्रण रहता है व मिट्टी में वायु संचार बना रहता है। पेंडीमेथीलिन 500 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति एकड़ बोनी के बाद प्रयोग करने से नींदा नियंत्रण होता है। निदानाषक प्रयोग के बाद एक निदाई लगभग 30 से 40 दिन की अवस्था पर करना चाहिये ।

पौध संरक्षण -अ. रोग

उकटा रोग :- इस रोग का प्रकोप अधिक होता है। यह फ्यूजेरियम नामक कवक से फैलता है। रोग के लक्षण साधारणता फसल में फूल लगने की अवस्था पर दिखाई देते हैं। नवम्बर से जनवरी महीनों के बीच में यह रोग देखा जा सकता है। पौधा पीला होकर सूख जाता है। इसमें जड़े सड़ कर गहरे रंग की हो जाती है तथा छाल हटाने पर जड़ से लेकर तने की उंचाई तक काले रंग की धारियां पाई जाती है। इस बीमारी से बचने के लिये रोग रोधी जातियां जैसे सी-11, जवाहर के.एम.-7, बी.एस.एम.आर.-853, आषा आदि बोयें। उन्नत जातियों का बीज बीजोपचार करके ही बोयें। गर्मी में खेत की गहरी जुताई व अरहर के साथ ज्वार की अंतरवर्तीय फसल लेने से इस रोग का संक्रमण कम होता है।

बांझपन विषाणु रोग :- यह रोग विषाणु से फैलता है। इसके लक्षण पौधे के उपरी शाखाओं में पत्तियां छोटी, हल्के रंग की तथा अधिक लगती है और फूल-फली नहीं लगती है। ग्रसित पौधों में पत्तियां अधिक लगती है। यह रोग, मकड़ी के द्वारा फैलता है। इसकी रोकथाम हेतु रोग रोधी किस्मों को लगाना चाहिये। खेत में उग आये बेमौसम अरहर के पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिये। मकड़ी का नियंत्रण करना चाहिये।

फायटोपथोरा झुलसा रोग :- रोग ग्रसित पौधा पीला होकर सूख जाता है। इसकी रोकथाम हेतु 3 ग्राम मेटेलाक्सील फफूंदनाशक दवा प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें। बुवाई पाल (रिज) पर करना चाहिये और मूंग की फसल साथ में लगायें।   

ब. कीट

फली मक्खी :- यह फली पर छोटा सा गोल छेद बनाती है। इल्ली अपना जीवनकाल फली के भीतर दानों को खाकर पूरा करती है एवं बाद में प्रौढ़ बनकर बाहर आती है। दानों का सामान्य विकास रुक जाता है। मादा छोटे व काले रंग की होती है जो वृध्दिरत फलियों में अंडे रोपण करती है। अंडों से मेगट बाहर आते हैं और दानों को खाने लगते हैं। फली के अंदर ही मेगट शंखी में बदल जाती है। जिसके कारण दानों पर तिरछी सुरंग बन जाती है और दानों का आकार छोटा रह जाता है। तीन सप्ताह में एक जीवन चक्र पूर्ण करती है।

फली छेदक इल्ली :- छोटी इल्लियां फलियों के हरे उत्तकों को खाती है व बड़े होने पर कलियों, फूलों, फलियों व बीजों पर नुकसान करती है। इल्लिया फलियों पर टेढ़े-मेढ़े छेद बनाती है। इस की कीट की मादा छोटे सफेद रंग के अंडे देती है। इल्लियां पीली, हरी, काली रंग की होती है तथा इनके शरीर पर हल्की गहरी पट्टियां होती है। अनुकूल परिस्थितियों में चार सप्ताह में एक जीवन चक्र पूर्ण करती है।

फल्ली का मत्कुण :- मादा प्राय: फल्लियों पर गुच्छों में अंडे देती है। अंडे कत्थई रंग के होते हैं। इस कीट के षिषु एवं वयस्क दोनों ही फली एवं दानों का रस चूसते हैं, जिससे फली आड़ी-तिरछी हो जाती है एवं दानें सिकुड़ जाते हैं। एक जीवन चक्र लगभग चार सप्ताह में पूरा करते हैं।

प्लू माथ :- इस कीट की इल्ली फली पर छोटा सा गोल छेद बनाती है। प्रकोपित दानों के पास ही इसकी विष्टा देखी जा सकती है। कुछ समय बाद प्रकोपित दाने के आसपास लाल रंग की फफूंद आ जाती है। मादा गहरे रंग के अंडे एक-एक करके कलियों व फली पर देती है। इसकी इल्लियां हरी तथा छोटै-छोटे काटों से आच्छादित रहती है। इल्लियां फलियों पर ही शंखी में परिवर्तित हो जाती है। एक जीवन चक्र लगभग चार सप्ताह में पूरा करती है।

 ब्रिस्टल बीटल :- ये भृंग कलियो, फूलों तथा कोमल फलियों को खाती है जिससे उत्पादन में काफी कमी आती है। यह कीट अरहर, मूंग, उड़द, तथा अन्य दलहनी फसलों पर भी नुकसान पहुंचाता है। भृंग को पकड़कर नष्ट कर देने से प्रभावी नियंत्रण हो जाता है।

कीट प्रंबधन  :- कीटों के प्रभावी नियंत्रण हेतु समन्वित प्रणाली अपनाना आवष्यक है

कृषि कार्य द्वारा :

1. गर्मी में खेत की गहरी जुताई करें  

2. शुध्द अरहर न बोयें 

3. फसल चक्र अपनाये

4. क्षेत्र में एक ही समय पर बोनी करना चाहिये 

5. रासायनिक खाद की अनुषंसित मात्रा का प्रयोग करें। 

6. अरहर में अंतरवर्तीय फसलें जैसे ज्वार, मक्का या मूंगफली को लेना चाहिये।

यांत्रिकी विधि द्वारा :

1. प्रकाष प्रपंच लगाना चाहिये 

2. फेरोमेन प्रपंच लगायेä 

3. पौधों को हिलाकर इल्लियां को गिरायें एवं उनकी इकट्ठा करके नष्ट करें। 

4. खेत में चिड़ियाओं के बैठने की व्यवस्था करें।

जैविक नियंत्रण द्वारा :-  

1. एन.पी.वी. 200 एल.ई. प्रति एकड़ / यू.वी. रिटारडेंट 0.1 प्रतिषत / गुड़ 0.5 प्रतिशत मिश्रण को शाम के समय छिड़काव करें। बेसिलस थूरेंजियन्सीस 400 ग्राम प्रति एकड़ / टिनोपाल 0.1 प्रतिषत / गुड 0.5 प्रतिषत का छिड़काव करें।

जैव-पौध पदार्थों के छिड़काव द्वारा : 

1. निंबोली सत 5 प्रतिषत का छिड़काव करें।

2. नीम तेल या करंज तेल 10-15 मि.ली. / 1 मि.ली. चिपचिपा पदार्थ (जैसे सेडोविट, टिपाल) प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

3. निम्बेसिडिन 0.2 प्रतिषत या अचूक 0.5 प्रतिषत का छिड़काव करें।

रासायनिक नियंत्रण द्वारा : 

1. आवश्यकता पड़ने पर ही कीटनाषक दवाओं का छिड़काव या भुरकाव करना चाहिये। 

2. फली मक्खी नियंत्रण हेतु संर्वागीण कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करें जैसे डायमिथोएट 30 ई.सी. 0.03 प्रतिशत,मोनोक्रोटोफॉस 36 ई.सी. 0.04 प्रतिषत आदि।

3. फली छेदक इल्लियां के नियंत्रण हेतु- फेनवलरेट 0.4 प्रतिषत चूर्ण या क्वीनालफास 1.5 प्रतिषत चूर्ण या इंडोसल्फान 4 प्रतिषत चूर्ण का 8 से 10 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से भुरकाव करें या इंडोसल्फान 35 ईसी 0.7 प्रतिशत या क्वीनालफास 25 ईसी 0.05 प्रतिशत या क्लोरोपायरीफास 20 ईसी 0.6 प्रतिषत या फेन्वेलरेट 20 ईसी 0.02 प्रतिशत या एसीफेट 75 डब्ल्यू.पी. 0.0075 प्रतिशत या ऐलेनिकाब 30 ई.सी 200 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति एकड़ है, या प्राफेनोफॉस 50 ईसी 400 मि.ली. प्रति एकड़ का छिड़काव करें। दोनों कीटों के नियंत्रण हेतु प्रथम छिड़काव सर्वांगीण कीटनाशक दवाई का करें तथा 10 दिन के अंतराल से स्पर्ष या सर्वांगीण कीटनाशक का छिड़काव करें। कीटनाशक के 3 छिड़काव या भुरकाव पहला फूल बनने पर, दूसरा 50 प्रतिषत फूल बनने पर और तीसरा फली बनने की अवस्था पर करना चाहिये।

कटाई एवं मड़ाई :- 80 प्रतिशत फलियों के पक जाने पर फसल की कटाई गड़ासे या हॅंसिया से 10 से0मी0 की उॅंचाई पर करना चाहिए। तत्पश्चात फसल को सूखने के लिए बण्डल बनाकर फसल को खलिहान में ले आते हैं। फिर चार से पॉच दिन सुखाने के पश्चात पुलमैन थ्रेशर द्वारा या लकड़ी के लठ्ठे पर पिटाई करके दानो को भूसे से अलग कर लेते हैं।

उपज :- उन्नत विधि से खेती करने पर 15-20 कुन्तल प्रति हे0 दाना एवं 50-60 कुन्तल लकड़ी प्राप्त होती है।

भण्डारण :- भण्डारण हेतु नमी का प्रतिशत 10-11 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। भण्डारण में कीटों से सुरक्षा हेतु अल्यूमीनियम फास्फाइड की 2 गोली प्रति टन प्रयोग करे।

 

Arhar (अरहर) Crop Types

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