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Bajra (बाजरा )

Pearl millet (बाजरा) (Pennisetum glaucum) is the most widely grown type of millet. Bajra or pearl millet is an important coarse grain crop and considered to be the poor man’s staple nourishment. It is believed to be the native of Africa, from where it spread to India and other countries. It is one of the important crops of South Eastern Asia, China, India, Pakistan, Arabia, Sudan, Russia and Nigeria. In India, it is grown in Haryana, Gujarat, Maharashtra, Rajasthan and Uttar Pradesh. 

India has the largest area (varying between 9-10 million ha) under pearl millet which is at third rank after rice and wheat. Pearl millet is often grown on infertile soils and under water-limited conditions where no other cereal crop can be successfully grown. Its is valued for both grain and stover as its grain is the major source of dietary carbohydrates of human diet in western India and stover forms the basis of livestock ration during the dry period of year in north Indian states.

एक समय था जब ज्वार, बाजरा या मक्का जैसे अनाजों को मोटा व मामूली माना जाता था। गरीब परिवार के लोग ही ज्वार, बाजरा व मक्का जैसे अनाजों की रोटियां खाया करते थे। मगर अब इन अनाजों को खाना शान की बात समझा जाता है। बाजरे की खेती भारत में मुख्य रूप से अधिक तापमान और शुष्क वातावरण वाले लगभग सभी राज्यों में की जाती है। बाजरे (Millet) की फसल को बोते समय अधिक तापमान और आर्द्रता की आवश्यकता होती है, जबकि पकते समय शुष्क वतावरण की आवश्यकता होती है। बाजरे (Millet) की फसल भारत में सबसे ज्यादा राजस्थान में भारत के कुल क्षेत्रफल का 50 प्रतिशत उगाया जाता है, जिसका उत्पादन 1/3 भाग है।

 

बाजरे के लिए जलवायु और भूमि (Climate and Land for Millet)

बाजरा (Millet) की खेती शुष्क जलवायु अर्थात कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी सफलतापुर्वक की जा सकती है। इस फसल के लिए हल्की दोमट मिट्टी उपयुक्त रहती है। यह फसल बरसात की फसल है, लेकिन इस फसल को ज्यादा पानी की आवश्यकता नही है। बाजरे (Millet) की फसल में पानी नही खड़ा होना चाहिए उसकी निकासी अच्छी तरह करें, नही तो फसल खराब हो सकती है।

 

बाजरे की किस्में (Varieties of Millet)

बाजरे की परंपरागत किस्में इस प्रकार है, आईसीएम्बी. 155, डब्लूसीसी. 75, आईसीटीबी. 8203, एचएचबी. 67, पूसा कम्पोजिट 612, 443 और 383 इत्यादि किस्में बरानी क्षेत्रों के लिए है। बाजरे की संकर किस्मे इस प्रकार है, पूसा संकर 415, 605, 322 और 23, आईसीएमएच. 441 इत्यादि सरकार द्वारा प्रमाणित किस्में है जो सिंचित और बरानी दोनों क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है।

 

बाजरे के लिए खेत की तैयारी (Farm Preparations for Millet) 

बाजरे की फसल के लिए खेत की तैयारी पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए। और उसके बाद 2 से 3 जुताई हल या कल्टीवेटर से करनी चाहिए और पाटा लगा दे। ताकि मिट्टी भुरभुरी व हवा प्रभावी हो जाए। अच्छी पैदावार के लिए आखिरी जुताई मे 100 से 120 क्विंटल गोबर की गली खाद प्रति हेक्टेयर डालनी चाहिए और मिट्टी में अच्छी तरह मिलाना चाहिए।

 

बाजरे की बुआई और उपचार (Sowing and Treatment of Millet)

बाजरे की फसल के लिए बीज की मात्रा 4 से 5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पड़ता है, यदि बीज उपचारित नही है तो प्रति किलो बीज को 3 ग्राम थीरम से उपचारित करना चाहिए। बाजरे (Millet) की बुवाई जुलाई से मध्य अगस्त तक कर देनी चाहिए, 55 सेंटीमीटर लाइन से लाइनों की दुरी, 15 से 25 सेंटीमीटर पौधे से पौधे की दुरी और 4 से 5 सेंटीमीटर की गहराई पर करनी चाहिए। बुवाई हल या कल्टीवेटर दोनों से कर सकते है।

 

बाजरे में उर्वरक का प्रयोग (Use of Fertilizer in Millet) 

बाजरे की संकर किस्मों के लिए उर्वरको का उपयोग इस प्रकार होना चाहिए 60 से 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर होना चाहिए। देशी या परंपरागत किस्मों के लिए 45 से 55 किलोग्राम नाइट्रोजन, 25 किलोग्राम फास्फोरस और 25 किलोग्राम पोटाश का प्रति हेक्टेयर उपयोग करना चाहिए। फास्फोरस और पोटाश की पूरी व नाइट्रोजन की आधी मात्र बुआई से पहले करे और नाइट्रोजन की आदि मात्र 30 से 35 दिन बाद खड़ी फसल में उपयोग करें।

 

बाजरे में सिंचाई (Irrigation of Millet)

वैसे तो बाजरे की फसल वर्षा ऋतू की फसल है और बारिश पर ही निर्भर होती है। लेकिन यदि बरसात नही हो तो फल या फुल के समय एक या दो सिंचाई कर देनी चाहिए लेकिन जल निकासी अति आवश्यक है।

 

बाजरे में खरपतवार प्रबंध (Weed Management in Millet)

बाजरा (Millet) की फसल के लिए निराई गुड़ाई बहुत महत्व रखती है। पहली निराई गुड़ाई बुआई की 15 से 20 दिन बाद और दूसरी 30 से 40 दिन के बाद आवश्यकतानुसार करनी चाहिए। रोगी और गहरे पोधों को निराई गुड़ाई के समय खेत से निकाल देना चाहिए। यदि खरपतवार अधिक है तो 5 लिटर एलाक्लोर प्रति हक्टेयर छिड़काव करना चाहिए।

 

बाजरे में रोग व किट प्रबंधन (Disease and Pest Management in Millet)

बाजरे मे कई तरह के कीटों का आक्रमण हो सकता है जैसे तन छेदक, परोह मख्खी, पत्ती लपेटक और माहू इत्यादि रोग हो सकते है। इसके उपचार के लिए क्यूनालफास 25 ईसी. 2 लिटर प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करना चाहिए, और पुरानी फसल के अवशेषों को जला देना चाहिए। बाजरे (Millet) की फसल के लिए मुख्य रोग इस प्रकार है, जैसे अर्गट, कण्डुआ और हरित बाली रोग इत्यादि इनके उपचार के लिए फसल चक्कर का प्रयोग करे और बीज को अच्छे से उपचारित कर के बुआई करे। रोगग्रस्त बालियों को खेत से निकाल दे और जीरम 80 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से प्रयोग करना चाहिए।

 

बाजरे की कटाई और पैदावार (Seedling and Yield of Millet)

बाजरे (Millet) के फसल की कटाई और मुडाई पूर्ण पकने के बाद ही करें। इसकी दो तरह से कटाई की जाती है, एक तो आप शुरू में ही नीचें से कटाई कर के बाले काटते है और दूसरा खड़ी फसल की बाले काट कर फिर कटाई करते है। दोनों ही सुरत में बालें धुप में सुखा कर दानों को अलग करें। जैसा की आप को पहले ही पता चल गया होगा की बारे की दो प्रकार की किस्में होती है, एक परंपरागत जिसकी पैदावार 17 से 20 क्विंटल और दूसरी संकर जिसकी पैदावार 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होनी चाहिए।  

किसान भाई उपरोक्त प्रक्रिया के तहत बाजरे की फसल बुआई निराई गुड़ाई और कटाई कर के अच्छी पैदावार ले सकता है।

Bajra (बाजरा ) Crop Types

BAJARA 11 (बाजरा 11)
The bajra (बाजरा) yields, under irrigated conditions, t

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