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Bajra (बाजरा )

Look at our Crops productivity, reports and much more.

Over 2500 years ago, Indian farmers had discovered and begun farming many spices and sugarcane. It was in India, between the sixth and fourth centuries BC, that the Persians, followed by the Greeks, discovered the famous “reeds that produce honey without bees? being grown.
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Bajra (बाजरा )

Pearl millet (बाजरा) (Pennisetum glaucum) is the most widely grown type of millet. Bajra or pearl millet is an important coarse grain crop and considered to be the poor man’s staple nourishment. It is believed to be the native of Africa, from where it spread to India and other countries. It is one of the important crops of South Eastern Asia, China, India, Pakistan, Arabia, Sudan, Russia and Nigeria. In India, it is grown in Haryana, Gujarat, Maharashtra, Rajasthan and Uttar Pradesh. 

India has the largest area (varying between 9-10 million ha) under pearl millet which is at third rank after rice and wheat. Pearl millet is often grown on infertile soils and under water-limited conditions where no other cereal crop can be successfully grown. Its is valued for both grain and stover as its grain is the major source of dietary carbohydrates of human diet in western India and stover forms the basis of livestock ration during the dry period of year in north Indian states.

 

बाजरा उत्पादन की वैज्ञानिक खेती  पद्धति

अनाज वाली फसलो में से बाजरा की फसल सूखा सहन करने की सर्वाधिक क्षमता रखती है बाजरा के गुण धर्म के कारण काम वर्षा वाले क्षेत्रो में इसकी खेती मुख्यतः दाने एवं पशु चारे के लिए की जाती है बाजरा की फसल के लिए शुष्क और गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है इसकी वृद्धि एवं विकास के लिए 28 से 32 C तापमान की आवश्यकता होती है

जलवायु एवं मिट्टी

बाजरा की फसल के लिए शुष्क और गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है बाजरा की खेती कई प्रकार की भूमि में की जाती है परंतु जल जमाव के प्रति इसकी संवेदनशीलता के कारण इसकी खेती के लिये बलुआही दोमट मिट्टी जिसमें जल निकास अच्छा हो, सर्वाधिक अनुकूल पायी गयी है. इसकी खेती गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में जहां 400-650 मिली मीटर वार्षिक वर्षापात हो, करना लाभदायक है.

उन्नत किस्मे :

संकर  (हाइब्रीड)एचएचबी - 6262 दिन मध्यम 30-32 किलोग्राम /हेक्टेयरसिंचित

एमबीएच - 11085 दिन मध्यम 35-40 किलोग्राम/हेक्टेयर सिंचित

बीडी-16385 दिन मध्यम 30-40 किलोग्राम/हेक्टेयर सिंचित

पीएचबी-216883 दिन 210 सेंटीमीटरी035-40 किलोग्राम/हेक्टेयर डाउनी मिल्ड्यु प्रतिरोधी

86 एम 84/86/8890 दिन लंबा प्रभेद 35-40 किलोग्राम /हेक्टेयर सिंचित/वर्षाधारित

स्ंकुल (कंपोजिट)पीसीबी - 16480 दिन 207 सेंटीमीटर 35-38 किलोग्राम/हेक्टेयर डाउनी मिल्डयू के लिए अत्यधिक प्रतिरोधी

भूमि की तैयारी

बाजरा की खेती कई प्रकार की भूमि में की जाती है गहरी जुताई के बाद दो हल्की जुताई एवं पाटा लगाना आवश्यक है. अच्छे अंकुरण के लिए खेतों में ढेला नहीं रहना चाहिए. भूमि समतिलकरण में ध्यान रहे कि भूमि में जल निकासी बाधित नहीं हो. अगर संभव हो तो अच्छे जलधारण क्षमता संर्वधन के लिए खेत तैयारी के 15 दिन पूर्व खेतों में दो ट्राली (ट्रैक्टर के) सड़ी गोबर की खाद प्रति एकड डालना चाहिए।

बीज एवं बोआई

बाजरा की बुआई जून से जुलाई माह में की जाती है 4-5 किलोग्राम/हेक्टेयर पौधा से पौधा 12-15 सेंटीमीटर तथा कतार से कतार 45-50 सेंटीमीटर. बीजों के बोने के लिए वर्षा का ज्ञान होना आवश्यक है. जहां कम वर्षा होती है वहां पर बोआई जुलाई के शुरूआत में करना उचित होगा. जहां थोड़ी ज्यादा वर्षा होती है वहां पर जुलाई के अंत में बोआई करने से मौनसूनी वर्षा के परागण पर होने वाले दुष्परिणाम फसल बची रहती है. सामान्यतौर पर बीजों की बोआई छिटकावां विधि से की जाती है. वैसी परिस्थिति में बोआई के तीन सप्ताह बाद पौधा से पौधा 15 सेंटीमीटर एवं कतारों के मध्य 45-50 सेंटीमीटर की दूरी रखकर पौधों की बछनी व छटाई कर देनी चाहिए. जहां पर जगह रिक्त हो वहां पर उखाड़े गये पौधों की रोपाई भी कर देनी चाहिए. वैसे अब बाजरा की बोआई के लिए बाजरा सीड ड्रील भी बनने लगे है. इनके प्रयोग से अच्छी बोआई संभव है.

खर-पतवार नियंत्रण

बोआई के तीन से पांच सप्ताह के बाद पतली खुरपी से खर-पतवार की निराई करना उचित रहता है. परन्तु कई बार श्रमिकों की कमी एवं खेत की नमी इस कार्य में बाधा पहुचाती है. अत: रसायनिक खर पतवार नियंत्रण एक अच्छा विकल्प है. इसके लिए एट्राजीन (50 डब्लयूपी) का 500 ग्राम (हल्की मिट्टी) एवं 750 ग्राम (दोमट अथवा भारी मिटी) को 250-300 लीटर पानी में घोलकर बाजरा बोआई के दो-तीन दिनों के अंदर खेतो में छिड़काव करें. इससे चौड़ी व सकरी दोनों तरह की खर-पतवार का प्रभावी नियंत्रण होता हैं.

सिंचाई एवं जल प्रबंधन

सामान्य तौर पर यह वर्षाधारित फसल है. परन्तु विशेष परिस्थिती में इसे दो सिंचाई दी जा सकती है. पौधों के विकास की अवस्था में इसका विशेष महत्व है. इसे जल जमाव बर्दाश्त नहीं होता है. अत: ज्यादा वर्षा होने पर इसमें से कुछ घंटों के अंदर ही जल निकास सुनिश्चित कर देना चाहिए.

कीट एवं व्याधि नियंत्रण के उपाय

दीमक-सूखे इलाके का महत्वपूर्ण कीट है. फसल बुआई के समय काबरेफ्यूरान (तीन जी) का 10 किग्रा या कॉरटाप हाइड्राक्लोराइड (चार जी) का 7.5 किग्रा/एकड़ प्रयोग करना चाहिए . इसके अतिरिक्त क्लोरपाइरीफॅास (20 ईसी) का 1.25 लीटर प्रति एकड वालू (20-25 ) में मिलाकर खेत में प्रयोग करना चाहिए.

जड़ में लगनेवाला गीडार-पौधे की प्रारंभीक अवस्था में क्षति पहुंचाता है . बचाव दीमक के समान. टीड्डा/वाली कीट-इमीडाक्लोरपीड (17.8 एसएल) का 125 मिली प्रति हेक्टेयर अथवा 50 मिली/एकड़ छिड़काव करें।

बाजरे में लगने वाले रोग

हरा वाली या डाउनी मिल्डयू-स्केलेरोस्पोरा जर्मीनीकोल नामक फॅफूद के कारण पतों पर पीली, उजली, लंबी धारियॉ बनती है जो वाद में भूरी होकर टूट जाती है. बाली मुड़ी हुई पत्तियों के रूप में  दिखाई देती है. बचाव के लिए बीजोपचार, संक्रमित पौधो को उखाड़ कर जला देना तथा प्रतिरोधी किस्मों का प्रयोग श्रेयस्कर रहता है.

इरगोट बिमारी

क्लेभिसेप्स फ्यूजोफॉरमींस नामक फफूंद के संक्रमण के कारण बाजरा की बालियों से शहद की तरह गीला श्रव होता है. जो बाद में बाली पर चिपक जाता है. यह क्षारीय प्रवृति का होता है तथा मानव स्वास्थ्य के लिए काफी नुकसान देह होता है. बचाव के लिए पीछात बोआई से बचना चाहिए. इस प्रकार के पौधों को उखाड़कर जला देना चाहिए. बीजोपच्चार के साथ ही गर्भावस्था में मैंकोजेब का 600-800 ग्राम/एकड़ 10 दिनों के अंतराल पर दो बार छिड़काव करें. इस रोग से ग्रसित पौधों के बालियां तनो का प्रयोग पशु आहार में न करें.

कलिका रोग

टालीपोस्पोरियम पेनिसिलारिया फफूंद के संक्रमण से बाजरा बालियों में दाने सामान्य से बड़े एवं हरे रंग के दिखाई देते हैं. बचाव के लिए तीन वर्षिय फसल चक्र, गहरी जुताई, बीजोपच्चार एवं इरगोट के समान मैण्कोजेब 600-800 ग्राम/एकड़ 10 दिनों के अंतराल पर दो-तीन छिड़काव करें.

खाद एवं उर्वरक-स्थानीय प्रभेदों के भोजन की आपूर्ति 10-15 टन प्रति हेक्टेयर सड़ी गोबर की खाद से हो जाती है. पर अधिक उपज वाली प्रभेदों के लिए मिट्टी जांच के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करना ज्यादा लाभदायक होगा. सामान्य तौर पर सिंचित अवस्था में 100-120 किग्रा0 नेत्रजन, 40-60 किलोग्राम फास्फोरस, 30-40 किग्रापोटाश की आवश्यकता होती है. वर्षाधारित खेती में उपर की खाद की लगभग आधी मात्र की आवश्यकता होती है. अर्थात सिंचित खेती में 70 किलोग्राम यूरिया, 55 किग्रा डीएपी अथवा 90 किग्राम यूरिया, 150 किग्रा0 सिगल सूपर फॉस्फेट प्रति एकड आवश्यक है . इसमें आवश्यकतानुसार पोटाश का प्रयोग किया जा सकता है नेत्रजन की आधी मात्र एवं फास्फेट तथा पोटाश की पूरी मात्र खेत तैयारी में प्रयोग करें. बाद एवं पुन: बालियों के निर्माण की अवस्था में उपरिवेशन करें.

Bajra (बाजरा ) Crop Types

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