• English
  • Hindi
  • Sign Up
  • Contact Us
    Contact us
    INDIA OFFICE
    Connect with Farmers and the world around you on KisaanHelpLine
    Agriculture Technology
    & Updates
    Farmers can get FREE tips on various aspects of farming.
    Tel: (+91)-7415538151
    Skype: yash.ample
    Email: info@kisaanhelpline.com
  • Learn Agro
Android app on Google Play
24/7 HELPLINE +91-7415538151

Wheat (गेहूं)

Look at our Crops productivity, reports and much more.

Over 2500 years ago, Indian farmers had discovered and begun farming many spices and sugarcane. It was in India, between the sixth and fourth centuries BC, that the Persians, followed by the Greeks, discovered the famous “reeds that produce honey without bees? being grown.
kisan

Wheat (गेहूं)

गेहूं (Wheat ; वैज्ञानिक नाम : Triticum spp.) मध्य पूर्व के लेवांत क्षेत्र से आई एक घास है जिसकी खेती दुनिया भर में की जाती है। विश्व भर में, भोजन के लिए उगाई जाने वाली धान्य फसलों मे मक्का के बाद गेहूं दूसरी सबसे ज्यादा उगाई जाने वाले फसल है, गेहूँ की उपज लगातार बढ रही है। यह वृध्दि गेहूँ की उन्नत किस्मों तथा वैज्ञानिक विधियों से हो रही है। भारत गेहूं का दूसरा बड़ा उत्पादक देश है. केरल, मणिपुर व नागालैंड राज्यों को छोड़ कर अन्य सभी राज्यों में इस की खेती की जाती है. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व पंजाब सर्वाधिक रकबे में गेहूं की पैदावार करने वाले राज्य हैं. 

Introduction to Wheat:- Wheat is the main grain crop and is mainly a rabi (winter) season crop in India. India is the second largest producer of wheat in the country. Indian wheat is largely medium protein, soft / medium staple and white bread wheat. In Haryana, Punjab and Uttar Pradesh, there is a large increase in the productivity of wheat in the states. In recent years, there is information of high coverage area in Madhya Pradesh. 

Wheat (गेहूं) is a Rabi Crop. It is main food grain crop in India. It is sowing in October and November and Harvested in February and March. Temperature 20 to 30°C is best for wheat production. Frost at flowering and ripening time is very bad for its production.

Area of Cultivation:- Wheat is cultivated in United State (USA), India, China, Pakistan, Australia, Russia, Canada and many countries production. In India, it is cultivated in Madhya Pradesh (M.P.), Utter Pradesh (U.P.), Rajasthan, Haryana, Gujarat, Maharashtra and Punjab.

खेत की तैयारी:- गेहूं की बोआई से करीब 1 महीने पहले ही प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 4 से ले कर 10 टन तक गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद खेत में डाल देनी चाहिए. इस में 3 किलोग्राम कैलडर्मा व 10 किलोग्राम कैलबहार भी डालना बेहतर होता है. इस के बाद खेत की जुताई कर के पलेवा कर देना चाहिए. फिर हैरो व टिलर से जुताई कर के पाटा लगा कर खेत को पूरी तरह से समतल कर देना चाहिए. बोआई के वक्त खेत में थोड़ी नमी होना जरूरी है. मिट्टी भुरभुरी होनी चाहिए और खेत में खरपतवार नहीं होने चाहिए.

Land Preparation:- The wheat crop requires a well-pulverized but compact seed bed for good and uniform germination. Three or four ploughings in the summer, repeated harrowing in the rainy season, followed by three or four cultivations and planking immediately before sowing produce a good, firm seed bed for the dry crop on alluvial soils. 

बुआई का समय, तरीका एवं बीज की मात्रा :-

1. असिंचित(Unirrigated):- असिंचित गेहूँ ही बुआई का समय 15 अक्टूबर से 31 अक्टूबर है इस अवधि में बुआई तभी संभव है जब सितम्बर माह में पर्याप्त वर्षा हो जाती हैं। इससे भूमि में आवश्यक नमी बनी रहती हैं। यदि बोये जाने वाले बीज के हजार दानों (1000 दानों) का वजन 38 ग्राम है तो 100 किलो प्रति हेक्टेयर बीज प्रयोग करें। हजार दानों का वनज 38 ग्राम से अधिक होने पर प्रति ग्राम 2 किलो प्रति हेक्टेयर बीज की मात्रा बढ़ा दें।

2. सिंचित:- सामयिक बोनी जिसमें नवम्बर का प्रथम पखवाड़ा उत्तम होता है, 15-25 नवम्बर तक सिंचित एवं समय वाली जातियों की बोनी आवश्यक कर लेना चाहिये। बीज को बोते समय 2-3 से.मी. की गहराई में बोना चाहिये जिससे अंकुरण के लिये पर्याप्त नमी मिलती रहे। कतारों से कतारें की दूरी 20 से.मी. रखना चाहिये । इस हेतु बीज की मात्रा औसतन 100 कि.ग्राम/हे. रखना चाहिये या बीज के आकार के हिसाब से उसकी मात्रा का निर्धारण करें तथा कतार से कतार की दूरी 18 से.मी. रखें।

3. सिंचित एवं देर से बोनी हेतु:- पिछैती बोनी जिसमें दिसम्बर का पखवाड़ा उत्तम हैं। 15 से 20 दिसम्बर तक पिछैती बोनी अवश्य पूरी कर लेना चाहिये | पिछैती बुवाई में औसतन 125 किलो बीज प्रति हे. के हिसाब से बोना उपयुक्त रहेगा (देर से बोनी के लिये हर किस्म के बीज की मात्रा 25 प्रतिशत बढ़ा दें) तथा कतार की दूरी 18 से.मी. रखें।

Sowing:- Wheat is sowing in beginning of winter such as October to November in well-drained soil. It is required 5 to 8 times water in full process form sowing to harvesting. Cooler atmosphere is best for its production.

किस्मों का चयन :- 1. असिंचित बुवाई के लिए:-  सी. 306, सुजाता, जे. डब्ल्यू 17, एच. डब्ल्यू 2004 (अमर), एच. आई 1500 (अमृता), जे.डब्ल्यू 3020, जे डब्ल्यू 3173, जे.डब्ल्यू 3211, जे.डब्ल्यू 3269, जे.डब्ल्यू 3288, एच.आई. 8627 (मालवकीर्ति), एच. आई 1531 (हर्षिता),  एच. डी. 4672 (मालवनत्न)

सिंचित एवं समय से बुवाई के लिए:-डब्ल्यू एच. 147, जी. डब्ल्यू 273, जी.डब्ल्यू 322, जे. डब्ल्यू 1142, एच.आई. 1479, (स्वर्णा), एच.आई. 8498 (मालशक्ति), एम.पी.ओ. 1106 (सुधा), जे.डब्ल्यू 1201, जी. डब्ल्यू 366 , जे.डब्ल्यू 1215, एच. आई. 1544   

सिंचित एवं पिछैती बुवाई के लिए:- लोक 1, जी डब्ल्यू 173, डी.एल. 788-2 (विदिशा), एच.आई.1454 (आभा), एच.आई. 1418 (नवीन चन्दौसी), जे.डब्ल्यू 4010, एच.डी. 2864, जे.डब्ल्यू 1202, जे.डब्ल्यू 1203, एच.डी. 2932, जे.डब्ल्यू 3336

खाद एवं उर्वरक:- खाद एवं उर्वरक की मात्रा गेहूँ की किस्म, सिंचाई की सुविधा, बोने की विधि आदि कारकों पर निर्भर करती है।अच्छी उपज लेने के लिए  भूमि में कम से कम 35-40 क्विंटल गोबर की अच्छे तरीके से सड़ी हुई खाद  50 किलो ग्राम नीम की खली और 50 किलो अरंडी की खली आदि इन सब खादों को अच्छी तरह मिलाकर खेत में बुवाई से पहले इस मिश्रण को समान मात्रा में बिखेर लें  इसके बाद खेत में अच्छी तरह से जुताई कर खेत को तैयार करें इसके उपरांत बुवाई करें 

 खेत में 10-15 टन प्रति हेक्टर की दर से सडी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट फैलाकर जुताई के समय बो आई पूर्व मिट्टी में मिला देना चाहिए । रासायनिक उर्वरको  में नाइट्रोजन, फास्फोरस , एवं पोटाश  मुख्य है । सिंचित गेहूँ में (बौनी किस्में) बोने के समय आधार मात्रा के रूप में 125 किलो नत्रजन, 50 किलो स्फुर व 40 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिये। देशी किस्मों में 60:30:30 किग्रा. प्रति हेक्टेयर के अनुपात में उर्वरक देना चाहिए। असिंचित गेहूँ की देशी किस्मों मे आधार मात्रा के रूप में 40 किलो नत्रजन, 30 किलो स्फुर व 20 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर बोआई के समय हल की तली में देना चाहिये। बौनी किस्मों में 60:40:30 किलों के अनुपात में नत्रजन, स्फुर व पोटाश बोआई के समय देना लाभप्रद पाया गया है

सिंचाई:-  भारत में लगभग 50 प्रतिशत क्षेत्र में गेहूँ की खेती असिंचित दशा में की जाती है। परन्तु बौनी किस्मों से अधिकतम उपज के लिए सिंचाई आवश्यक है। गेहूँ की बौनी किस्मों को 30-35 हेक्टर से.मी. और देशी किस्मों  को 15-20 हेक्टर से.मी. पानी की कुल आवश्यकता होती है। उपलब्ध जल के अनुसार गेहूँ में सिंचाई क्यारियाँ बनाकर करनी चाहिये। प्रथम सिंचाई में औसतन 5 सेमी. तथा बाद की सिंचाईयों में 7.5 सेमी. पानी देना चाहिए। सिंचाईयों की संख्या और पानी की मात्रा  मृदा के प्रकार, वायुमण्डल का तापक्रम तथा बोई गई किस्म पर निर्भर करती है। फसल अवधि की कुछ विशेष क्रान्तिक अवस्थाओं पर बौनी किस्मों में सिंचाई करना आवश्यक होता है।

Irrigation in Wheat farming:–

1st  irrigation should be given at 3 to 4 weeks after sowing.

2nd irrigation should be at 40 to 45 day after sowing.

3rd irrigation at 60 to 65 day after sowing.

4th irrigation at 80 to 85 day after sowing.

5th irrigation at 100 to 105 day after sowing.

6th irrigation at 15 to 120 day after sowing.

गेहूं की फसल को 6 बार सिंचाई की जरूरत होती है. पहली सिंचाई मुख्य जड़ निकलने के बाद के बाद, दूसरी सिंचाई गेहूं के कल्ले निकलने पर, तीसरी सिंचाई गेहूं में गांठ बनने पर, चौथी सिंचाई बालियां निकलते समय, पांचवी सिंचाई दानों में दूध पड़ने पर व छठी सिंचाई दानों में आटा बनने पर की जानी चाहिए. जब गेहूं की बालियां आनी शुरू हों, तो सिंचाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए. ऐसे में यदि खेत में नमी की कमी रह गई, तो बालियां परिपक्व नहीं हो सकेंगी और पैदावार गड़बड़ा सकती है.

खरपतवार:- गेहूँ में मजदूरों द्वारा निराई-गुडाई करके काफी हद तक खरपतवारों की रोकथाम की जा सकती है लेकिन आजकल अधिक मजदूरी तथा मजदूर न मिलने के कारण कठिनाई होती है। इसलिए खरपतवारनाशक दवाइयों से खरपतवारों को नष्ट किया जाता है। गेहूँ में चौडी पत्ती वाले खरपतवारों को नष्ट करने के लिए 2-4, डी 0.5 कि0ग्रा0 सक्रिय अवयव प्रति हैक्टर को 400-600 लीटर पानी में मिलाकर छिडकना चाहिए।

गेंहूँ के रोग एवं  नियंत्रण :- कैमोर के पठार एवं सतपुड़ा पहाड़ी क्षेत्रों में बोई जाने वाली गेहूँ की फसल में मुख्यतः गेरूआ (काला एवं भूरा) कंडुवा व स्तुआ का प्रकोप देखने को मिलता है इन रोगों का प्रकोप पूर्णतः मौसम के मिजाज पर निर्भर करता हैं।

1. ध्वज कंडुवा

यह रोग दाने के अन्दर रहने वाले कवक के द्वारा होता हैं। अतः यह आवश्यक है कि बीज को बोने के पहले उपचारित एवं शोभित कर लिया जाये। बीज को बीटावेक्स या बाविस्टीन नामक दवाई की 2.5 ग्राम मात्रा को एक कि. ग्राम बीज की दर से उपयोग में लाया जा सकता हैं। इसके अलावा बीज को सोलर ट्रीटमैंट भी देने से इस बीमारी से बचा जा सकता हैं। मई-जून के महीने के महीने में जब तेज धूप हो, बीज को सुबह 4 घंटे तक पानी में मिगोने के बाद धूप में अच्छी तरह सुखा लें। ऐसा करने से बीज के अंदर मौजूद कवक नष्ट हो जाता हैं।

2. आल्टरनेरिया झुलसा रोग

यह रोग पत्तियों पर फैलता है, जिससे सभी पत्तियां सूखी हुई दिखाई देती हैं। प्रायः यह रोग पुरानी पत्तियों से होकर नये पत्तियों की तरफ अग्रसर होता हैं। इसकी रोकथाम के लिये आवश्यक है कि नई अनुशंसित जातियों का ही चुनाव करें एवं रोग के रोकथाम के लिए मैकोजब या डायथेन एम-45 या इन्डोफिल एम-45 नामक दवा की 2 कि.ग्रा. मात्रा 800-1000 ली. पानी में अथवा प्रोपीकोनाजोल टिल्ट 0.25 प्रतिशत क्रियाशील तत्व की 500 मि.ली. मात्रा का 800-1000 लीटर पानी के साथ प्रति हे. छिड़काव करें।

3. भ्रूर्ण पर काली चित्ती (ब्लैक प्वाइंट)

इसकी पहचान यह है कि यदि गेहूँ के दानों के भ्रूण तल में भूरे या काले चित्ते दिखाई दें, तो यह फफूंद द्वारा फैलता है जो बीज की अंकुरण क्षमता को घटाता हैं जिससे खेत में उचित पौध संख्या की कमी हो जाती है तथा उपज कम प्राप्त होती हैं। इसकी रोकथाम हेतु बोनी के पूर्व बीजोपचार आवश्यक हैं।

कटाई-गहाई:- जब गेहूँ के दाने पक कर सख्त हो जाय और उनमें नमी का अंश 20-25 प्रतिशत तक आ जाये, फसल की कटाई करनी चाहिये। कटाई हँसिये से की जाती है। बोनी किस्म के गेहूँ को पकने के बाद खेत में नहीं छोडऩा चाहिये, कटाई में देरी करने से, दाने झडऩे लगते है और पक्षियों  द्वारा नुकसान होने की संभावना रहती है। कटाई के पश्चात् फसल को 2-3 दिन खलिहान में सुखाकर मड़ाई  शक्ति चालित थ्रेशर से की जाती है। कम्बाइन हारवेस्टर का प्रयोग करने से कटाई, मड़ाई तथा ओसाई  एक साथ हो जाती है परन्तु कम्बाइन हारवेस्टर से कटाई करने के लिए, दानों  में 20 प्रतिशत से अधिक नमी नहीं होनी चाहिए, क्योकि दानो  में ज्यादा नमी रहने पर मड़ाई या गहाई ठीक से नहीं होंगे।

Harvesting:- The rain-fed crop reaches the harvest stage much earlier than the irrigated crop. The crop is harvested when the grains become hard and the straw becomes dry and brittle.The harvesting is mostly done by sickle. The crop is threshed by treading with cattle on the threshing-flour or by power driven thresher.

उपज एवं भंडारण:-  उन्नत तकनीक से खेती करने पर सिंचित अवस्था में गेहूँ की बौनी  किस्मो से लगभग 50-60 क्विंटल  दाना के अलावा 80-90 क्विंटल  भूसा/हेक्टेयर प्राप्त होता है। जबकि देशी लम्बी किस्मों से इसकी लगभग आधी उपज प्राप्त होती है। देशी  किस्मो से असिंचित अवस्था में 15-20 क्विंटल  प्रति/हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है। सुरक्षित भंडारण हेतु दानों में 10-12% से अधिक नमी नहीं होना चाहिए। भंडारण के पूर्ण क¨ठियों तथा कमरो को साफ कर लें और दीवालों व फर्श पर मैलाथियान 50% के घोल  को 3 लीटर प्रति 100 वर्गमीटर की दर से छिड़कें। अनाज को बुखारी, कोठिलों  या कमरे में रखने के बाद एल्युमिनियम फास्फाइड 3 ग्राम की दो गोली प्रति टन की दर से रखकर बंद कर देना चाहिए।

Yield:- The national average yield of wheat grain is about 12 to 13.8 quintals per hectare.

Storage:- The grains should be thoroughly dried before storage. The storage life of the grain is closely related to its moisture content. Grains with less than 10 percent moisture store well. The storage pits, bins or godowns should be moisture-proof and should be fumigated to keep down the stored – grain pests including rats. Zinc phosphide is very effective against rats.

Wheat (गेहूं) Crop Types

© 2013 Kisaan Helpline by Kisan Help Desk, all rights reserved.