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Ginger (अदरक)

अदरक की खेती :- अदरक (ज़िन्जिबर ओफिसिनल) (समूह-जिन्जिबेरेसी) एक झाड़ीनुमा बहुवर्षीय पौधा है, जिसक प्रकन्द मसाले के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं । विश्व के कुल उत्पादन का 60% उत्पादन भारत में होता हैं । भारत में इस फसल की सबसे ज्यादा खेती केरल में की जाती हैं जहाँ भारत के कुल उत्पादन का 70% भाग यहाँ से उत्पादित किया जाता हैं इसके अतिरिक्त हिमाचलप्रदेश, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उड़ीसा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, आदि प्रांतो में भी इसकी खेती की जाती हैं । भारत की अन्य भाषाओं में अदरक को विभिन्न नामो से जाना जाता है जैसे- आदू (गुजराती), अले (मराठी), आदा (बंगाली), इल्लाम (तमिल), आल्लायु (तेलगू), अल्ला (कन्नड.) तथा अदरक (हिन्दी, पंजाबी) आदि ।

Ginger Farming Information Guide :- Ginger belongs to the family of Zingiberaceae. It is one of the important cash crops and spices grown in India. India is a major exporter of Ginger. It can be grown in Poly houses, net houses, open field, indoors & backyards. Ginger has many health benefits for human body

USES & By PRODUCTS :- Culinary & Pharmaceutical preparations, also uses as flavoring in soft drinks, beverages, pickle.

Ginger Producing States :- Kerala, Orissa, Andhra Pradesh, Himachal Pradesh, Meghalaya, Arunachal Pradesh, Assam, , Manipur, Mizoram, Nagaland and Tripura, Maharashtra and West Bengal.

भूमि एवं जलवायु :- अदरक की खेती बलुई दोमट जिसमें अधिक मात्रा में जीवाशं या कार्बनिक पदार्थ की मात्रा हो वो भूमि सबसे ज्यादा उपयुक्त रहती है । अदरक की खेती गर्म और नमीयुक्त जलवायु में अच्छी तरह की जा सकती है। इस की खेती समुद्र तट से 1500 मीटर तक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में की जा सकती है। अदरक की खेती वर्षा आधारित और सिंचाई करके भी की जा सकती है । इसकी खेती बालुई,चिकनी,लाल या लेटेराइट मिट्टी में उत्तम होती है।

भूमि कि तैयारी :- अप्रैल – मई में मिटटी पलटने वाले हल से जुताई करनी चाहिए और उसके उपरांत 4-5 जुताई हैरों या कल्टीवेटर से जुताई करे उसके उपरांत पाटा चलाये ऐसा करने से भूमि समतल और भुरभुरी हो जाती है , सूत्र क्रीमी से बचाव के लिए बोआई से पूर्व मिटटी में 10-15 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर 100 किलो माइक्रो नीम कि खाद अवश्य डाले और अदरख के बीज को केरासिन तेल से उपचारित कर बुवाई करे ।

अदरक की प्रजातियाँ :- भारत एवं विदेशों में फसल व गुणवत्ता कि दृष्टि से अदरक कि विभिन्न किस्मे उगाई जाती है | आई आई एस आर वरदा , सुप्रभा , सुरुची , सुरभी , हिमगिरी , आई आई एस आर महिमा , आई आई एस आर रजाता , रमोडिजनिरो , चाइना , नादिया , वरूआ सागर ,आदि ।

बुवाई के समय :- अदरक की बुबाई दक्षिण भारत में मानसून फसल के रूप में अप्रैल – मई में की जाती जो दिसम्बर में परिपक्क होती है । जबकि मध्य एवं उत्तर भारत में अदरक एक शुष्क क्षेत्र फसल है । जो अप्रैल से जून माह तक वुवाई योग्य समय हैं । सबसे उपयुक्त समय 15 मई से 30 मई हैं । 15 जून के बाद वुवाई करने पर कंद सड़ने लगते हैं और अंकुरण पर प्रभाव बुरा पड़ता हैं । केरल में अप्रैल के प्रथम समूह पर वुवाई करने पर उपज 200% तक अधिक पाई जाती हैं । वही सिचाई क्षेत्रों में वुवाई का सवसे अधिक उपज फरवरी के मध्य बोने से प्राप्त हुई है |

बुआई :- अदरक का बीज प्रकन्द होता है। अच्छी तरह परिरक्षित प्रकन्द को 2.5-5.0 से. मीटर लम्बाई के 20-25 ग्राम के टुकड़े करके बीज बनाया जाता है। बीजों की दर खेती के लिए अपनाये गए तरीके के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग-अलग होती है। केरल में बीजों की दर 1500 -1800 कि. ग्राम/ हेक्टेयर होती है।बीज प्रकन्द को 30 मिनट तक 0.3%(3ग्राम/लीटर पानी) मैनकोजेब से उपचारित करने के पश्चात 3-4 घंटे छायादार जगह में सुखाकर 20-25 से.मीटर की दूरी पर बोते हैं । पंक्तियों की आपस में बीच की दूरी 20-25 से.मीटर रखना चाहिए। बीज प्रकन्द के टुकड़ों को हल्के गढ्डे खोदकर उसमें रखकर तत्पश्चात् खाद (एफ वाई एम) तथा मिट्टी डालकर समान्तर करना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक :- बुआई के समय 25-30 टन/हेक्टेयर की दर से अच्छी तरह अपघटित गोबर खाद या कम्पोस्ट को बडों के ऊपर बिखेर कर अथवा बुआई के समय बड़ों में छोटे गढ्डे करके उसमें डाल देना चाहिए। बुआई के समय 2 टन/ हेक्टेयर की दर से नीम केक का उपयोग करने से प्रकांड गलन रोग तथा सूत्रकृमियों का प्रभाव कम होता है जिससे उपज बढ़ जाती है ।

Favorable Climate :- Sowing Climate – Drizzling of rainfall or even dried land with irrigation source Root growth & Flowering - Well-distributed rainfall to avoid stagnation of water Harvesting – Dry Weather before one month of harvest.

SOWING TIME :- May to June (Growing Duration: 9-10 Months )

CULTIVATION :- Sowing is done by making beds of 15 cm height, 1 m width & 60 cm spacing between the beds

Some Variety of Ginger :- Suprabha, Nedumangad, Maran, Kuruppampady, Suruchi, Surari and more 

SOWING RATE :- 1500 kgs of root cutting per hectare

सिंचाई :- वर्षा ऋतु में प्रायः सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है क्योकि समय-समय पर वर्षा होती रहती है। यदि समय पर वर्षा नहीं होती है तो आवश्यकतानुसार सिंचाई कर देनी चाहिए। सर्दियों में फसल की स्थिति के अनुसार 10-15 दिनों में सिंचाई कर देनी चाहिए।

रोग, कीट व उपचार -

कन्द का सड़ना :- यह रोग मुख्य रूप से फुजेरियम आक्सीस्पोरम के कारण होता हैं। इसमें निचे की पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं। बाद में सम्पूर्ण पौधा पीला पढ़कर मुरझा जाता हैं। भूमि के पास का भाग पनीला व् मुलायम हो जाता हैं। पौधों को सींचने पर वह कन्द के जुड़े स्थान से आसानी से टूट जाता हैं बाद में सम्पूर्ण कन्द सड़ जाते हैं।

रोकथाम

1. रोगग्रस्त भूमि से बीज नहीं लेना चाहिए।

2. बीज को बुवाई से पूर्व डाइथेन एम-45 दवा की (2.5 ग्राम /लीटर पानी ) के घोल से एक घंटे तक उपचारित करने के बाद छाया में अच्छी तरह सूखा लेना चाहिए।

3. खेत में पौधों की पत्तियाँ पीली पड़ने पर तुरंत डाइथेन एम-45 दवा की 2.5 ग्राम /लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए।

कीट -

तना छेदक :- यह कीट तने को छेदकर उसका रस चूसता है। जिससे पौधा कमजोर पद जाता है और अंत में सुख जाता है।

रोकथाम :- इस कीट के रोकथाम के लिए रोगोर नामक कीटनाशक दवा का 0.1 प्रतिशत का घोल 2 माह के अंतराल पर छिड़काव करने से नियंत्रित किया जा सकता है।

खुदाई :- बुआई के आठ महीने बाद जब पत्ते पीले रंग के हो जाये और धीरे-धीरे सूखने लगे तब फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है। पौधों को सावधानीपूर्वक फावड़े या कुदाल की सहायता से उखड़ कर प्रकंदों को जड़ और मिट्टी से अलग कर लेते हैं । अदरक को सब्जी के रूप में उपयोग करने के लिए उसे छठवें महीने में ही खुदाई करके निकाल लेना चाहिए । प्रकन्दों को अच्छी तरह धो कर सूर्य के प्रकाश में कम से कम एक दिन सुखा कर उपयोग करना चाहिए ।

भण्डारण :- अच्छा बीज करने के लिए प्रकन्द को छायादार जगहों पर बने गढ़ड़ों में भण्डारण करते हैं। जब फसल 6-8 महीने की हरी अवस्था में हो तो खेत में स्वस्थ्य पौधों का चयन कर लेते हैं। बीज प्रकन्द को 0.075% क्विनाल्फोस तथा 0.3% मैन्कोजेब के घोल में 30 मिनट उपचार करके छायादार जगह में सुखा लेते हैं। बीज प्रकंदों को सुविधानुसार गढ्डे बनाकर भंडारण करते हैं। इन गढ्डे की दीवारे को गोबर से लेप देते हैं। गढ्डों में एक परत प्रकन्द फिर 2 से.मीटर रेत /बुरादा की परत में रखते हैं। पर्याप्त वायु मिलने के लिए गढ्डों के अन्दर पर्याप्त जगह छोड़ देते हैं। इन गढ्डों को लकड़ी के तख्ते से ढक देते हैं। इन तख्तों को हवादार बनाने के लिए इनमें एक या दो छेद करते हैं।बीज प्रकन्द को लगभग 21 दिनों के अन्तराल पर देखना चाहिए मुझाये या रोग बाधित प्रकन्द को निकाल कर नष्ट कर देना चाहिए।

Water Requirement :- 20 Irrigation required with a intervals of 10 days approx which varies according to different soil and climatic conditions.

Drip Irrigation is preferred for higher yielding

Manure & Fertilizers :- Nitrogen, Neem Cake, Super Potassium Humate, Sulphur, Fulvic & Neam oil as per the land & climatic condition required.

Post Harvest :- After fully maturity, the leaves color turn yellowish and start drying up 

Harvesting :- The yielding would be approx 15-20 tons/hectare

Cleaning & Drying :- After removing all sand particles, cleaning is done by hands usually and Dry it for 1 day to absorb sunlight.

Storage :- Dry green leaves are used to protect the ginger from sunlight & rain.  

 

Seeds Sale & Buy

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Ginger (अदरक) Crop Types

सुप्रभा
Crops Season : Kharif Season Name of Variety : Suprabha Released
सुरुचि
Crops Season : Kharif Season Name of Variety : Suruchi Released f
सुरभि
Crops Season : Kharif Season Name of Variety : Suravi Released fr

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