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Onion (खरीफ प्याज)

kharif onion cultivation

खरीफ प्याज उत्पादन तकनीक 

सामान्यतः प्याज भारत में एक महत्वपूर्ण सब्जी एवं मसाला फसल है। इसमें प्रोटीन एवं कुछ विटामिन भी अल्प मात्रा में रहते हैं। प्याज में बहुत से औषधीय गुण पाये जाते हैं। प्याज का सूप, अचार एवं सलाद के रूप में उपयोग किया जाता है। सामान्यतः भारत के प्याज उत्पादक राज्यों में महाराष्ट्र, गुजरात, उ.प्र., उड़ीसा, कर्नाटक, तमिलनाडू, म.प्र.,आन्ध्रप्रदेश एवं बिहार प्रमुख हैं। मध्यप्रदेश भारत का सबसे बड़ा प्याज उत्पादक प्रदेश है। म.प्र. में प्याज की खेती खंण्डवा, शाजापुर, रतलाम छिंन्दवाड़ा, सागर एवं इन्दौर में मुख्य रूप से की जाती है। सामान्य रूप में सभी जिलों में प्याज की खेती की जाती है। भारत से प्याज का निर्यात मलेशिया, यू.ए.ई. कनाडा,जापान,लेबनान एवं कुवैत में निर्यात किया जाता है।

खरीफ प्याज

खरीफ :- खरीफ मौसम के लिए मर्इ-जून में बुवार्इ की जाती है तथा जुलार्इ-अगस्त में रोपार्इ की जाती है। प्याज अक्टूबर-नवम्बर में तैयार होता है। खरीफ मौसम में प्याज की खेती, प्याज के कुल क्षेत्रफल के 20 प्रतिशत क्षेत्र में होती है। महाराष्ट्र में खरीफ प्याज मुख्यत: सातारा जिले के फलटन, मान, दहिवडी, नासिक जिले के येवला, मनमाड, निफाड, व सिन्नर नगर के जिले के संगमनेर, राहुरी, पारनेर, श्रीगोंदा, पाथर्डी तथा नुदुरबार और धुलिया के कुछ भागें में ली जाती है।

जलवायु

यद्यपि प्याज ठण्डे मौसम की फसल है,लेकिन इसे खरीफ में भी उगाया जा सकता है। कंद निर्माण के पूर्व प्याज की फसल के लिए लगभग 210 से.ग्रे.तापक्रम उपयुक्त माना जाता है। जबकि शल्क कंदों में विकास के लिए 150 से.ग्रे. से 250 से.ग्रे.का तापक्रम उत्तम रहता है।

मृदा

प्याज की खेती विभिन्न प्रकार की मृदाओं में की जा सकती है। प्याज की खेती के लिए उचित जलनिकास एवं जीवांशयुक्त उपजाऊ दोमट तथा बालुई दोमट भूमि जिसका पी.एच.मान 6.5-7.5 के मध्य हो सर्वोत्तम होती है, प्याज को अधिक क्षारीय या दलदली मृदाओं में नही उगाना चाहिए।

खरीफ मौसम की किस्में 

एन-53 -भारत के सभी क्षेत्रों में उगाया जा सकता है, इसकी परिपक्वता अवधि 140 दिन, औसत उपज 250-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, इसे खरीफ प्याज (वर्षातकी प्याज) उगाने हेतु अनुशंसित किस्म हैं।

एन-43 :-  यह नासिक जिले की स्थानीय किस्म से विकसित की गयी है। इसके शल्ककंद गोलाकार, चपटे, बैंगनी लाल रंग के, तीखापन युक्त होते हैं। यह किस्म 100-120 दिनों में परिपô होती है तथा प्रति हेक्टेयर 20 से 25 टन उत्पादन देती है। 

बसवन्त-870 :- यह महात्मा फुल विश्वविधालय द्वारा स्थानीय किस्म से चयन द्वारा विकसित की गयी है। इसके प्याज गोलाकार तथा तने के पास शंôाकार होते हैं। इसका रंग आकर्षक लाल तथा भण्डारण क्षमता 3-4 माह होती है। इसमें दुफाड़ तथा तोर प्याज की मात्रा एन-43 से कम होती है। यह किस्म 100 से 120 दिनों में तैयार होती है तथा प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन 25 से 30 टन होती है। इसकी खेती थोड़ी देर से अर्थात अगस्त माह में करने से उपज में वृद्धि होती है।

एग्रीफांउड डार्क रेड :- यह नासिक सिथत बागवानी अनुसंधान तथा विकास प्रतिष्ठान द्वारा स्थानीय जाती से विकसित किस्म है। इसके शल्ककन्दों का आकार गोल तथा रंग लाल होता है। यह किस्म 100 दिन में तैयार होती है तथा इससे प्रति हेक्टेयर 25 से 27 टन तक उपज होती है। 

अर्का कल्याण :- यह किस्म बंगलोर सिथत भारतीय बागवानी अनुसंधान द्वारा विकसित की गयी है। इसके प्याज गोलाकार तथा गहरे लाल रंग के होते हैं। जो स्वाद में तीखें होते हैं। यह किस्म 90 से 100 दिन में तैयार होती है तथा औस उत्पादन प्रति हेक्टेयर 25 से 30 टन तक प्राप्त होता है।

 भीमा सुपर :- राष्ट्रीय प्याज व लहसून अनुसंधान केन्द्र ने बसवन्त-870 जाती में चुनाव विधि द्वारा विकसित की गर्इ है। इस किस्म में एक केेंन्द्रीय प्याज का प्रमाण 90 से 95 प्रतिशत तक प्राप्त होता है। प्याज आकार में एक समान होता है। बिक्री योग्य उत्पादन 75 से 80: या इससे भी अधिक प्राप्त होते हैं। इसे बाजार भाव अच्छा मिलता है, एवं हेक्टेयरी औसत उत्पादन 25 से 30 टन तक प्राप्त होता है। यह खरीफ व पछेती खरीफ के लिए उपयुक्त किस्म है।

भूमि की तैयारी

प्याज के सफल उत्पादन में भूमि की तैयारी का विशेष महत्व है। खेत की प्रथम जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करना चाहिए। इसके उपरान्त 2 से 3 जुताई कल्टीवेटर या हैरा से करें, प्रत्येक जुताई के पश्चात् पाटा अवश्य लगाएं जिससे नमी सुरक्षित रहे तथा साथ ही मिट्टी भुर-भुरी हो जाए। भूमि को सतह से 15 से.मी.उंचाई पर1.2 मीटर चौड़ी पट्टी पर रोपाई की जाती है अतः खेत को रेज्ड-बेड सिस्टम से तैयार किया जाना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक

प्याज की फसल को अधिक मात्रा में पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। प्याज की फसल में खाद एवं उर्वरक का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर ही करना चाहिए। गोबर की सड़ी खाद 20-25 टन/हेक्टेयर रोपाई से एक-दो माह पूर्व खेत में डालना चाहिए। इसके अतिरिक्त नत्रजन 100 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर, स्फुर 50 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर तथा पोटाश 50 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर देने की अनुसंशा की जाती हैं। इसके अतिरिक्त सल्फर 25 कि.ग्रा. एवं जिंक 5 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर प्याज की गुणवत्ता सुधारने के लिए आवश्यक होते हैं।

पौध तैयार करना

पौधशाला के लिए चुनी हुई जगह की पहले जुताई करें इसके पश्चात् उसमें पर्याप्त मात्रा में गोबर की सड़ी खाद या कम्पोस्ट डालना चाहिए। पौधशाला का आकार 3 मीटर*0.75 मीटर रखा जाता हैं और दो क्यारियों के बीच 60-70 सेमी. की दूरी रखी जाती हैं जिससे कृषि कार्य आसानी से किये जा सके। पौधशाला के लिए रेतीली दोमट भूमि उपयुक्त रहती है, पौध शैय्या लगभग 15 सेमी. जमीन से ऊँचाई पर बनाना चाहिए बुवाई के बाद शैय्या में बीजों को 2-3 सेमी. मोटी सतह जिसमें छनी हुई महीन मृदा एवं सड़ी गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद से ढंक देना चाहिए। बुवाई से पूर्व शैय्या को 250 गेज पालीथीन द्वारा सौर्यकरण उपचारित कर लें।

बीजों को हमेशा पंक्तियों में बोना चाहिए। खरीफ मौसम की फसल के लिए 5-7 सेमी. लाइन से लाइन की दूरी रखते हैं। इसके पश्चात् क्यारियों पर कम्पोस्ट, सूखी घास की पलवार(मल्चिंग) बिछा देते हैं जिससे भूमि में नमी संरक्षण हो सके। पौधशाला में अंकुरण हो जाने के बाद पलवार हटा देना चाहिए। इस बात का ध्यान रखा जाये कि पौधशाला की सिंचाई पहले फब्बारे से करना चाहिए। पौधों को अधिक वर्षा से बचाने के लिए पौधशाला या रोपणी को पॉलीटेनल में उगाना उपयुक्त होगा।

बीज की मात्रा

खरीफ मौसम के लिए 15-20 किग्रा. प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती हैं।

पौधशाला शैय्या पर बीज की बुआई एवं रोपाई का समय

खरीफ मौसम हेतु पौधशाला शैय्या पर बीजों की पंक्तियों में बुवाई 1-15 जून तक कर देना चाहिए, जब पौध 45 दिन की हो जाएं तो उसकी रोपाई कर देना उत्तम माना जाता है।

पौध की रोपाई कूड़ शैय्या पद्धति से तैयार खेतों पर करना चाहिए, इसमें 1.2 मीटर चौड़ी शैय्या एवं लगभग 30 से.मी. चौड़ी नाली तैयार की जाती हैं।

खरपतवार नियंत्रण

फसल को खरपतवारों से मुक्त रखने के लिए कुल 3 से 4 निराई-गुड़ाई की आवश्यकता होती है। प्याज के पौधे एक-दूसरे के नजदीक लगाये जाते है तथा इनकी जड़ें भी उथली रहती है अतः खरपतवार नष्ट करने के लिए रासायनिक पदार्थों का उपयोग किया जाना उचित होता है। इसके लिए पैन्डीमैथेलिन 2.5 से 3.5 लीटर/हेक्टेयर अथवा ऑक्सीफ्लोरोफेन 600-1000 मिली/हेक्टेयर खरपतवार नाशक पौध की रोपाई के 3 दिन पश्चात 750 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना बहुत प्रभावी और उपयुक्त पाया गया है।

सिंचाई एवं जल निकास

खरीफ मौसम की फसल में रोपण के तुरन्त बाद सिंचाई करना चाहिए अन्यथा सिंचाई में देरी से पौधे मरने की संभावना बढ़ जाती हैं। खरीफ मौसम में उगाई जाने वाली प्याज की फसल को जब मानसून चला जाता है उस समय सिंचाईयाँ आवश्यकतानुसार करना चाहिएं। इस बात का ध्यान रखा जाए कि शल्ककंद निर्माण के समय पानी की कमी नहीं होना चाहिए क्योंकि यह प्याज फसल की क्रान्तिक अवस्था होती है क्योंकि इस अवस्था में पानी की कमी के कारण उपज में भारी कमी हो जाती है, जबकि अधिक मात्रा में पानी बैंगनी धब्बा(पर्पिल ब्लाच) रोग को आमंत्रित करता है। काफी लम्बे समय तक खेत को सूखा नहीं रखना चाहिए अन्यथा शल्ककंद फट जाएंगे एवं फसल जल्दी आ जाएगी, परिणामस्वरूप उत्पादन कम प्राप्त होगा। अतः आवश्यकतानुसार 8-10 दिन के अंतराल से हल्की सिंचाई करना चाहिए।

यदि अधिक वर्षा या अन्य कारण से खेत में पानी रूक जाए तो उसे शीघ्र निकालने की व्यवस्था करना चाहिए अन्यथा फसल में फफूंदी जनित रोग लगने की संभावना बढ़ जाती हैं।

फसल सुरक्षा

1. थ्रिप्स

ये कीट पत्तियों का रस चूसते हैं जिसके कारण पत्तियों पर चमकीली चांदी जैसी धारियां या भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं। ये बहुत छोटे पीले या सफेद रंग के कीट होते हैं जो मुख्य रूप से पत्तियों के आधार या पत्तियों के मध्य में घूमते हैं।

इसके नियंत्रण हेतु नीम तेल आधारित कीटनाशियों का छिड़काव करें या इमीडाक्लोप्रि कीटनाशी 17.8 एस.एल. दवा की मात्रा 125 मिली./हे. 500-600 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

2. माइट

इस कीट के प्रकोप के कारण पत्तियों पर धब्बों का निर्माण हो जाता हैं और पौधे बौने रह जाते हैं। इसके नियंत्रण हेतु 0.05: डाइमेथोएट दवा का छिड़काव करें।

 

यह एक फफूंदी जनित रोग है, इस रोग का प्रकोप दो परिस्थितियों में अधिक होता है पहला अधिक वर्षा के कारण दूसरा पौधों को अधिक समीप रोपने से पत्तियों पर बैंगनी रंग के धब्बे बन जाते हैं। परिणामस्वरूप पौधों की बढ़वार एवं विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

3. बैंगनी धब्बा(परपल ब्लॉच)

इसके लक्षण दिखाई देने पर मेनकोजेब (2.5 ग्रा./ली. पानी) का 10 दिन के अन्तराल से छिड़काव करें। इन फफूंदनाशी दवाओं में चिपकने वाले पदार्थ जैसे सैन्उो विट, ट्राइटोन या साधारण गोंद अवश्य मिला दें जिससे घोल पत्तियों पर प्रभावी नियंत्रण हेतु चिपक सके।

उपज

खरीफ प्याज की प्रति हेक्टेयर उपज 250-300 क्विंटल तक मिल जाती है

प्याज का भण्डारण 

 भारतीय लोगों के दैनिक आहार में प्याज का एक आवश्यक भाग है। अन्य सबिजयाँ और फल मौसम के अनुसार उपलब्ध होते हैं तो भी चलता है परन्तु प्याज को किसी न किसी सब्जी के साथ उपयोग में लाया जाता है। इस कारण वर्षभर इसकी उपलब्धता आवश्यक है। प्याज सितम्बर-अक्टूबर (20:), फरवीर-मार्च (20:), अपै्रल-मर्इ (60:) में निकाला जाता है। इस प्रकार अक्टूबर से मर्इ तक देश में कहीं न कहीं प्याज निकाला जाता है। इसलिए इसकी उपलब्धता सहज तथा भाव कत होते हैं। जून से सितम्बर तक प्याज नहीं निकाला जाता है। खरीफ मौसम का प्याज बाजार में अक्टूबर में ही आ पाता है। यदि खरीफ की फसल खराब हो तो फरवरी में ही पछेती खरीफ फसल का प्याज आ पाता है। इस प्रकार जून से अक्टूबर और कभी-कभी फरवरी में पछेती ख्रीफ फसल आने तक प्याज की माँग की पूर्ति के लिए प्याज के भण्डारण की आवश्यकता होती है। महाराष्ट्र राज्य में 5 लाख टन से अधिक प्याज का भण्डारण किया जाता है। निरन्तर बढ़ती माँग तथा निर्यात को ध्यान में रखते हुए अगले 3-4 वषोर्ं में भण्डारण क्षमता 10 से 12 लाख टन तक बढ़ाना आवश्यक है। खरीफ मौसम का प्याज निकालने के तुरन्त बाद बिक जाते हैं। साथ ही साथ प्याज सुखाने योग्य मौसम तथा परिसिथती नहीं मिलने के कारण खरीफ के प्याज का भण्डारण भी नहीं किया जाता है। पछेती खरीफ में प्याज सुखाने योग्य परिसिथती मिलने के कारण भण्डारित किया जाता है जो कि रबी प्याज निकालने अर्थात अप्रैल-मर्इ तक ही लाभदायक है। मुख्य तौर पर रबी मौसम का प्याज ही भण्डारित किया जाता है। बदलते समयपर्यावरणीय दशाओं में खरीफ मौसम में प्याज की फसल अनिशिचत होने लगी है। ऐसी परिसिथतियों में रबी मौसम में तैयार तथा भण्डारित किये गये प्याज पर अधिक भरोसा किया जा सकता है। इसके अलावा स्थानीय बाजार में मूल्य सिथरता तथा निर्यात के लिए पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता के लिए अधिक से  अधिक मात्रा में प्याज का भण्डारण आवश्यकत है। 

 

Onion (खरीफ प्याज) Crop Types

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